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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 76, कुल 368 में से

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पृष्ठ 76

भस्त्रिकाधिकरण ] [ ५३
एवमुक्त्वा व्यासटिका यथाशास्त्र समासतः ।
अथेदानीं तद्भस्त्रिकाजातिनिर्णयमुच्यते ॥ ८४ ॥
चौरस या गोल कूर्माकार—कछुवे के आकार वाला यथाविधि भूमि में १० बालिश्त सुन्दर
कुण्ड बनावे भस्त्रिकास्थापन के लिये, उसके सामने वाले भाग में कूर्माङ्गी पांच मुख वाला एक पीठ
बनावे, उस कुण्ड के भीतरी भाग में गोलमूषा कुण्ड बना कर कुण्ड के बाहिरी भाग में दो आवरण
बना कर अङ्गारे भरने को यथाशास्त्र करे, उसके दोनों पाश्र्वों में गलाये हुए लोहे के पिघले रस को
भरने के लिए यन्त्रस्थान बनावे । इस प्रकार महर्षियों ने कूर्मकुण्ड की रचना विधि कही । इस प्रकार
यथाशास्त्र संक्षेप से व्यासटिका को कह कर अब उसकी भस्त्रिका जाति का निर्णय कहा जाता
है ॥ ७६—८४ ॥
अथ भस्त्रिकाधिकरणम्
अब भस्त्रिका का अधिकरण कहते हैं ।
स्याद् भस्त्रिकाष्टमे षोडशी ॥ अ० २ सू० ५ (अ० १ । सू० १२ ॥?)
बो० वृ०
कूर्मव्यासटिकामुक्त्वा पूर्वसूत्रे यथाविधि ।
भस्त्रिकानिर्णयार्थं सूत्रोय प्रकीर्तित ॥ ८५ ॥
भस्त्राप्रबोधकपदान्यस्मिन् सूत्रे चतु *क्रमात् ।
तेष्वादिमपदात् तत्र क्रियार्थस्सन्निरूपित ॥ ८६ ॥
द्वितीयपदनो भस्त्रालक्षण सूचित भवेत् ।
तथैव तद्वर्गमख्या तृतीयपदतस्स्मृता ॥ ८७ ॥
एव भस्त्रिकसख्या च चतुर्थपदत क्रमात् ।
पदार्थमेव कथित विशेषाथोधुनोच्यते ॥ ८८ ॥
द्वात्रिंशदुत्तरपञ्चशतभस्त्रा प्रकीर्तिता ।
कूर्मभस्त्रा तेषु मुख्या बीजलोहविगालने ॥ ८९ ॥
पूर्वसूत्र में कूर्म व्यासटिका को यथाविधि कहकर भस्त्रिका निर्णयार्थ यह सूत्र कहा है । इस
सूत्र मे भस्त्राप्रबोधक चार पद हैं, उनमें आदिम पद से क्रियार्थ का निरूपण किया है, दूसरे पद से
भस्त्रा का लक्षण सूचित किया, वैसे ही उसकी वर्गसंख्या तीसरे पद से कही है । इस प्रकार भस्त्रिका
संख्या चौथे पद से बतलाई । इस प्रकार पदों का अर्थ कह दिया, विशेष अर्थ अब कहा जाता है । ५३२
भस्त्रिकाएं कही हैं उनमें कूर्मभस्त्रा बीज लोहों के गलाने में मुख्य है—प्रमुख है ॥ ८५—८९ ॥
तदुक्तं भस्त्रिकानिबन्धने—वह कहा है भस्त्रिकानिबन्धन में—
यावन्त्य कुण्डिका प्रोक्तास्तावन्त्येव हि भस्त्रिका ।
कूर्मभस्त्रा तासु कूर्मकुण्डिकाया प्रकीर्तिता ॥ ९० ॥
जितनी कुण्डिकाएं —व्यासटिकाए कही हैं उतनी ही भस्त्रिकाएं भी हैं । उनमें कूर्म भस्त्रिका
कूर्मकुण्डिका—कूर्म व्यासटिका की कही है ॥ ९० ॥

  • 'चतु' अविभक्तिकनिर्देशश्छान्दस प्रार्षो वा ।