बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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त्रयस्त्रिंशद्बीजलोहा एवं वर्गत्रयास्स्मृता ।
पूर्वोक्तलोहत्रयशक्तय एव स्वभावत' ॥ १७ ॥
तन्मयत्वात् त्रयस्त्रिंशद्बीजलोहेष्वपीरिता ।
एवमुक्त्वा बीजलोहस्वरूप शास्त्रत स्फुटम् ॥ १८ ॥
अथ तेषा गालनार्थ मेलनक्रममुच्यते ।
श्च्विङ्क, लध्विक, ये ११ नाम पूर्ववत् मौर्विक वर्ग लोहों के यथाक्रम यहा कहे हैं । ३३ बीज
लोहे के हैं इस प्रकार तीन वर्ग कहे गए । पूर्वोक्त तीन लोहों की शक्तिया स्वभावत तन्मय—त्रिलोह-
मय होने से ३३ बीज लोहों में भी कही गई है । इस प्रकार बीज लोहों का स्वरूप शास्त्र से स्फुट है,
अब उनके गलाने के लिए मेल का क्रम कहते हैं ॥ १६–१८ ॥
मेलनात् ॥ अ० २ सू० २ ॥
बो० वृ०
पूर्वोक्तबीजलोहाना तत्तद्भागाशत क्रमात् ॥ १९ ॥
संयोजनक्रम वक्तुं सूत्रोय परिकीर्तित ।
त्रिवर्गेष्वेकैकलीह तत्तत्संख्यानुसारत ॥ २० ॥
ऊष्मलोहोत्पत्तिविधौ मूषाया योजयेदिति ।
सङ्कीर्त्यतॆत्र तत्तद्भागसंख्याविधिनिर्णयं ॥ २१ ॥
पूर्वोक्त बीज लोहों के उस उम भागाश से क्रम से सयोग कम - मेलक्रम कहने को यह सूत्र
कहा है । तीन वर्गों मे से एक एक लोहे को उस उसकी संख्या के अनुमार ऊष्म लोहे की उत्पत्तिविधि
के अर्थ उसे मूषा-कृत्रिमविशेष बोतल में डालदे इस विषय में उस उस भाग की सख्याविधि का निर्णय
यहा कहा जाता है ॥ १६–२१ ।
तदुक्त लोहतन्त्रे—वह कहा है लोहतन्त्र में—
अथेदानोमूष्मपानामुत्पत्तिक्रमनिर्णये ।
सर्वेषा बीजलोहाना शास्त्रोक्तविधानात् ॥ २२ ॥
लोहानुसारतस्तेषा भागसंख्या विधीयते ।
ऊष्मपेष्मम्भराख्यलोहोत्पत्तिक्रियाविधौ ॥ २३ ॥
सौमसौण्डालमौर्विकलोहवर्गत्रये क्रमात् ।
एकत्रिसप्तलोहाशान् त्रद्य षट्चूर्णमिश्रितान् ॥ २४ ॥
मूषाया योजयेत् सम्यग् दशपञ्चाष्टसख्यकान् ।
ऊष्मपेष्मोत्पत्तिविधाने शास्त्रत क्रमात् ॥ २५ ॥
चतुरैकाष्टलोहाशान् त्रिवर्गेषु सटङ्कणान् ।
त्रिपञ्चसप्तसख्याकान् मूषाया मेलयेत् सुधी. ॥ २६ ॥