बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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तथैवोष्णहनोत्पत्तौ त्रिवर्गेषु यथाक्रमम् ।
द्विपञ्चनवलोहभागान् षट्त्रिसप्तकन् ॥२७॥
अब ऊष्मप लोहों के उत्पत्तिक्रम निर्णय में सब बीज लोहों का शास्त्रोक्त विधान
से लोहानुसार उनकी भागसंख्या विधान की जाती है। ऊष्मपों में ऊष्मम्भरनामक लोहे की उत्पत्ति-
क्रियाविधि के निमित्त सौम सौडाल मौक्तिक तीनों लोहवर्गों में क्रम से १, ३, ७ लोहांशों को ३ अंश-
टङ्कण-सुहागा मिले हुओं को मूषा-मिट्टी आदि से बनी बोतल में युक्त करके १०, ५, ८ संख्यावालों को
ऊष्मपों के उत्पत्ति विधान में शास्त्र से क्रम से ४, १, ८ लोहांशों को तीन वर्गों में सुहागा कम से
३, ५, ७ भाग संख्या वालों को मूषा-बोतल में बुद्धिमान् मिलादे इसी प्रकार उष्णघातक की उत्पत्ति
में तीन वर्गों में यथाक्रम २, ५, ६ लोहांशों को तथा ६, ३, ७ भागों में- ॥ २२-२७ ॥
टङ्कणेन सुसंयोज्य मूषायां मेलयेत् ततः ।
राजाख्योष्मपलोहोत्पत्त्यर्थं शास्त्रविधानतः ॥ २८ ॥
त्र्यष्टद्विलोहभागान् टङ्कणेन समन्वितान् ।
मूषायां पूरयेत् पश्चात् त्रिवर्गेष्वपि पूर्ववत् ॥ २९ ॥
तथैवाम्लूट्टुत्पत्तावूष्मपेषु यथाक्रमम् ।
नवमसर्जकलोहान् त्रिवर्गेषु सटङ्कणान् ॥ ३० ॥
दशसप्तष्टसंख्याकान् मूषायां सन्नियोजयेत् ।
तथैव वीरहाख्योष्मपलोहोत्पत्तिनिर्णये ॥ ३१ ॥
षट्चतुःपञ्चलोहान् त्रिवर्गेषु सटङ्कणान् ।
तारबाणार्कसंख्याकान् मूषायां सम्प्रपूरयेत् ॥ ३२ ॥
-टङ्कण-सुहागे से युक्त कर मूषा-बनी बोतल में मिलादे, राजाख्योष्मप लोहे की उत्पत्ति के अर्थ
शास्त्रविधान से सुहागे सहित ३, ८, २ लोहे भागों को मूषा में भर दे पश्चात् तीनों वर्गों में भी
पूर्व की भांति तथैव अम्लूट्टु ? -घोलद्राव को पी लेने वाली शक्ति की उत्पत्ति में ऊष्मप लोहों में यथा-
क्रम ६, ७, १ लोहांशों को तीन वर्गों में तथा सुहागा १०, ७, ८ संख्या में मूषा में डाल दे, तथा वीरहा-
नामक ऊष्म लोहे की उत्पत्ति के निर्णय में ६, ४, ५ लोहांशों को तीन वर्गों में ५, ५, १२ भाग संख्या
सुहागे को मूषा में भर दे ॥ २८-३२ ॥
पञ्चघ्नाख्योष्मपोत्पत्तौ त्रिवर्गेष्वपि पूर्ववत् ।
अष्टषट्चत्वारिलोहभागान् टङ्कणान्वितान् ॥ ३३ ॥
विशाष्टादशषड्विंशन्मूषायां सन्नियोजयेत् ।
ऊष्मपेष्वग्निकृद् सृष्ट्या त्रिवर्गेषु यथाक्रमम् ॥ ३४ ॥
पञ्चद्विदशलोहाशान् त्रिंशद्दिशदशान्वितान् ।
मूषायां मेलयत् सम्यक् टङ्कणेन समाकुलान् ॥ ३५ ॥
एव भारहनोत्पत्तौ चोष्मपेषु यथाक्रमम् ।
सप्तैकादशषड्लोहभागान् टङ्कणान्वितान् ॥३६॥