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सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 75

५२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
५३२ कुण्ड क्रम से प्राय. शास्त्र में कुण्डखननकुशल जनों द्वारा कहे गए हैं । सब बीज लोहों
के गलाने में शास्त्रवेत्ताओं ने उनमें कूर्मव्यासटिका को अच्छा कहा है ॥ ७१–७२ ॥
तदुक्त कुण्डकल्पे—वह कहा है कुण्डकल्प में—
सर्वेषां बीजलोहानां गालनार्थं यथाविधि ॥ ७३ ॥
द्वात्रिंशदुत्तरपञ्चशतव्यासटिकास्स्मृता ।
तासां वर्गविभागस्तु सप्तधा वर्णितो (त ?) बुधै ॥७४॥
तेष्वेकेकवर्गस्थितकुण्डाऽष्टसप्तति स्मृता ।
तेषु सप्तमवर्गीयकुण्डेषु यथाक्रमम् ॥ ७५ ॥
नवमी कुण्डिका या स्यात् कूर्मव्यासटिकति हि ।
संबोच्यते बीजलोहगालने शस्त्रवित्तमै ॥ ७६ ॥ इति
सब बीजलोहों के गलाने के लिये यथाविधि ५३२ व्यासटिकाएं-कुण्डिया-भट्टिया कही हैं उनमें वर्ग-
विभाग तो ७ प्रकार का विद्वानों ने कहा है। उनमें एक एक वर्ग में स्थित ७६ कही हैं उनमें ७वें वर्ग के
कुण्डों में यथाक्रम नौवीं कुण्डिका-भट्टी जो है वह कूर्म व्यासटिका बीज लोहों के गलाने में शास्त्रवेत्ताओं
ने कही है ॥ ७४-७६ ॥
नारायणोपि--नारायण ने भी कहा है--
उक्तेषु सर्वकुण्डेषु कूर्मव्यासटिका विना ।
सर्वेषां बीजलोहाना गालनं न कदाचन ॥ ७७ ॥
कूर्मव्यासटिकामेवमुक्त्वा शास्त्रानुसारत ।
तत्स्वरूपपरिज्ञानार्थमाकार सम्प्रचक्षते ॥ ७८ ॥
उक्त सब कुण्डों में कूर्मव्यासटिका के बिना सब बीज लोहों का गलाना कभी नहीं होता।
शास्त्रानुसार इस प्रकार कूर्मव्यासटिका कहकर उसके स्वरूप ज्ञानार्थ आकार को कहते हैं ॥ ७७-७८ ॥
उक्तं हि कुण्डनिर्णये—कुण्डनिर्णय में कहा है—
चतुरस्रं वर्त्तुलं वा कूर्माकारं यथाविधि ।
वित्तिस्तदशकं कुण्ड कारयेद् भुवि शोभनम् ॥ ७९ ॥
भस्त्रिकास्थापनाय तत्पुरोभागतस्स्फुटम् ।
कूर्माङ्गवत्पञ्चमुखं पीठमेकं प्रकल्पयेत् ॥ ८० ॥
तत्कुण्डस्यान्तराले तु मूषाकुण्डं च वर्त्तुलम् ।
कल्पयित्वा बहिर्भागे कुण्डस्यावरणद्वयम् ॥ ८१ ॥
इङ्गालपूरणार्थाय यथाशास्त्रं प्रकारयेत् ।
पार्श्वयोरुभयोस्तस्य यन्त्रस्थापनं प्रकल्पयेत् ॥ ८२ ॥
सम्यग्गालितलोहाद्वा रससम्पूर्णे सुधीः ।
रचनां कूर्मकुण्डस्य उक्तमेवं महर्षिभिः ॥ ८३ ॥