बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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उत्तम मध्यम अधम 'लोहादि' अपभ्रंशों के गलाने की विधि में ४०७ भेद से मूषाएं कही
गई हैं। उनके १२ वर्ग जाति निर्णय से हैं, लोहों में जो बीज लोहे हैं उनके गलाने कर्म में द्वितीय वर्ग
में कही मूषाएं श्रेष्ठ हैं ऐसा कहा है ॥ ४५-५५ ॥
लल्लोपि-लल्ल ने भी कहा है-
कृतकापभ्रंशकाश्च स्थलजा खनिजास्तया ।
जलजा धातुजास्तद्वदोषधीवर्गजापि* च ॥५६॥
क्रिमिमासक्षारबालाण्डजलोहा इति क्रमात् ।
उक्त द्वादशधा शास्त्रे लोहतत्त्वविदा वरे ॥५०॥
एतेषा गलने मूषा प्रत्येकं वर्गतस्स्मृताः ।
तेषु द्वितीयवर्गस्थमूषाभेदा महर्षिभि ॥५८॥
चत्वारिंशदिति प्रोक्ता मूषाकल्पा यथाक्रमम् ।
तासु या पञ्चमीत्युक्ता मूषान्तर्मुखनामिका ॥५९॥
गलने बीजलोहाना सुप्रशस्ता इतीरिता ॥६०॥ इत्यादि
कृतक, अपभ्रंशक, स्थलज, खनिज, जलज, धातुज, ओषधिवर्गज, कृमिज, मांसज, क्षारज,
बालज, अण्डज १२ लोहे क्रम से शास्त्र में लोहतत्त्व को जानने वालों ने कहे हैं। इनके गलाने के
निमित्त मूषाएं प्रत्येक वर्ग से कही हैं, उनमें द्वितीयवर्गस्थ मूषा के भेद मूषाकल्प के यथाक्रम से
महर्षियों ने ४० कहे हैं। उनमें जो पञ्चमी अन्तर्मुखनामवाली मूषा कही है वह बीज लोहों के गलाने में
सुप्रशस्त कही है ॥ ५६-६० ॥
तदुक्तं मूषाकल्पे-वह कहा है मूषाकल्प में-
पिष्टाष्टक किट्टचतुष्टय च लोहत्रय लाङ्गुलिकत्रय च ।
निर्याषषट्क रुरुद्वय च क्षारत्रयमोषधिपञ्चक तथा ॥६१॥
इङ्गालषट्क सूणिकाण्डपञ्चक शालीतुषाभस्मचतुष्टय च ।
शिलाद्वय नागमुखद्वय च वरोलिकाटङ्गणपञ्चक तथा ॥६२॥
बालद्वय पञ्चरस तथैव गुञ्जाद्वय फेनचतुष्टय क्रमात् ।
संयोज्य चैतानथ पेषणीमुले कुर्यात् सुसूक्ष्म मृदुशुद्धपिष्टम् ॥ ६३ ॥
निर्यासमृत्पञ्चकधूसर ततस्तस्मिन् समाश सुनियोज्य पश्चात् ।
नियम्य तत्पाचकयन्त्रत क्रमाच्छिद्वारितैलात्प्रहरत्रय पचेत् ॥६४॥
सवीक्ष्य पाक विधिवत् सुपक्व मूषामुले नालमुखात् प्रपूरयेत् ।
एव कृतेन्तर्मुखनाममूषा दृढातिशुद्धा भवति स्वभावत ॥६५॥ इत्यादि ।
पिष्ट-तिल की खल या उडद् की दाल की पिट्ठी ? ८ भाग, किट्ट-लोहमल-मण्डूर ४
भाग, लोह ३ भाग, लाङ्गुलिक-जाङ्गुल-शालिचावल ? या लाङ्गुलिक-कौंच के बीज ३ भाग,
- वर्गजा अपि, बहुवचने सन्धिरैकादेश आर्षः ।