बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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पिञ्जलादर्पणश्चैव गुहागर्भव्यदर्पणः ।
रौद्रीदर्पण इत्येते(इत्येतत् ?)सप्तोक्ता यानदर्पणा ॥६॥
तेषु विश्वक्रियादर्श इति यत्सम्प्रकीर्तित ।
तद्यानपीठोर्ध्वमुखस्थाने आवर्तनक्रमात् ॥ ७ ॥
प्रपञ्चे प्राणिभिस्सर्वैर्यत्कर्म कृत भवेत् ।
तत्साक्षाद् वीक्षणार्थ यद् यन्त्रेणा स्थापितो भवेत् ॥८॥
विश्वक्रियादर्श इति तमेवाहुर्मनीषिण ।
विश्वक्रियादर्पण, शक्त्याकर्षणदर्पण, वैरुथ्यदर्पण, कुण्टिणीदर्पण, पिञ्जलादर्पण, गुहागर्भदर्पण,
रौद्रीदर्पण ये सात विमान के दर्पण कहे हैं। उनमें विश्वक्रियादर्श जो कहा है उसे विमान के पीठस्थान
के उपस्थान में आवर्तन क्रम से मनुष्यों द्वारा प्रपञ्च—सहार के निमित्त जो जो कार्य किया गया हो उसे
साक्षात् देखने के लिए चालकों की ओर से स्थापित किया जाना चाहिए, इसे विश्वक्रियादर्श मनीषियों
ने कहा है ॥ १-८ ॥
तदुक्तं क्रियासारे—यह क्रियासार ग्रन्थ में कहा है—
सत्त्वद्वय शुण्डिलकद्वय च गृध्रास्थिमेक वरपारपञ्चकम् ।
सिङ्घोरणीपादनखद्वय तथा शुद्धाभ्रषट्क वरशोणपञ्चकम् ॥ ९ ॥
मुक्ताष्टक सौम्यमीननेत्रमष्टादशाङ्गारकसत्त्वमेकम् ।
सर्पत्वगञ्जनिकत्रयं तथा मातृणषट्क वरशर्करा दश ॥ १० ॥
क्षाराष्टक नागचतुष्टय च फेनद्वय गारुडवल्कलत्रयम् ।
वैणव्यक सप्त तथा सुशोधित वैराजश्वेतोदुम्बरपञ्चक च ॥ ११ ॥
एतानि संशोध्य यथाविधि क्रमात् सन्तोप्य चञ्चुपुटमूषिकायाम् ।
सम्पूर्य चण्डोदरकुण्डमध्ये विन्यस्य कव्याष्टशतोष्णवेगत ॥ १२ ॥
सङ्गालयित्वा करदर्पणास्ययन्त्रोर्ध्वनालस्य मुले प्रपूरयेत् ।
एव कृते विश्वक्रियारूपदर्पणो भवेत् सुशुद्धो दृढसूक्ष्मरूप ॥१३॥
सत्त्व ?—क्षार—सज्जीखार ? २ भाग, शुण्डिलक ?—हाथीशुण्डावृत्त २ भाग ?, गृध्रास्थि—
गिद्ध की हड्डी १ भाग, वरपार—शुद्धपारा ५ भाग, सिङ्घोरणी ? के पैर का नाखून २ भाग, शुद्ध अभ्रक
६ भाग, वरशोण—अच्छा सिन्दूर ५ भाग, मोती ८ भाग, सौम्यक मीन नेत्र ? १८ भाग, अङ्गार का
सत्त्व १ भाग, सर्पत्वक्—केंचुली ८ भाग, आञ्जनिक—सुरमा ३ भाग, मातृण ?—काणतृण ?—गन्ध-
तृण ? ६ भाग, अच्छा पाषाण चूरा १० भाग, क्षार—सुहागा ८ भाग, नाग—सीसा ४ भाग, फेन—
समुद्रफेन २ भाग, गरुड वल्कल ?—गरुड़शालि का वल्कल—छिलके ? ३ भाग, वैणव्यकं—वंशलोचन ७
भाग, शोधितवैराज श्वेत उदुम्बर का दूध या गोंद या क्षार ? ५ भाग, इन्हें क्रम से यथाविधि शोध कर
तोल कर चञ्चुपुट मूषिका—बोतल में भर कर चण्डोदर कुण्ड के मध्य रख कर ८ दर्जे की उष्णता के
वेग से गला कर बड़े दर्पण के मुख्ययन्त्र के उपरिनाल के मुख में भर दे। ऐसा करने पर विश्वक्रियादर्पण
सुशुद्ध दृढ़ सूक्ष्म हो जावे ॥ ६-१३ ॥