बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंफोटो कापी ( पूना ) संख्या १ वस्तुतः कापी सख्या ३—
अथोष्मपोत्पत्तिनिर्णयः —अब ऊष्मप लोहों की उत्पत्ति का निर्णय देते हैं—
ऊष्मपास्त्रिलोहमयाः ॥ अ० २ । सू० १ ॥
बो० वृ०
ऊष्मपा इति ये प्रोक्ता पूर्वं*यानक्रियाविधौ ।
तेषा स्वरूपं निर्णेतुं सूत्रेऽद्य परिकीर्तित ॥ १ ॥
पदद्वय भवेदस्मिन्नूष्मलोहप्रबोधकम् ।
तत्रादिमपदाद् यानलोहास्सूचिता क्रमात् ॥ २ ॥
द्वितीयपदतस्तेषा स्वरूपार्थास्तथैव हि ।
ऊष्मनामोष्णमित्याहुरादित्यकिरणोद्भवम् ॥ ३ ॥
ये पिबन्ति स्वभावेन ते प्रोक्ता ऊष्मपा इति ।
सोमतौण्डालमौर्त्विकास्त्रिलोहेत्यत्र‡ वर्णिता ॥ ४ ॥
तेषा लोहत्रयाणा तु समाहारोत्र वर्णित ।
तल्लोहयोगजन्यत्वाद् विकारार्थे मयट् स्मृत ॥ ५ ॥
ऊष्मप जो पूर्व विमान यान क्रियाविधि में कहे हैं उनका स्वरूप निर्णय करने को यह सूत्र
कहा है । इसमें ऊष्म लोहे के प्रबोधक दो पद हैं, उनमें आदिम पद से विमान यान के लोहे सूचित
किये हैं द्वितीय पद से उनके स्वरूप आदि कहे हैं । ऊष्म नाम सूर्य किरणों से उत्पन्न उष्ण—उष्णत्व
को कहते हैं उसे जो स्वभाव से पीते हैं ऊष्मपा कहे गये हैं । सोम, सौण्डाल, मौर्त्विक ये तीन लोहे
यहां कहे हैं । उन तीनों लोहों का यहां समाहार वर्णित किया है, उन लोहों से उत्पन्न होने वाला - बनने
वाला होने से विकारार्थ में मयट् प्रत्यय कहा गया है ॥ १-५ ॥
यस्मात् त्रिलोहवर्गीयलोहसयोगत क्रमात् ।
प्रभवन्त्यूष्मपास्तस्मात् तन्मया इति कीर्तिता ॥ ६ ॥
- 'पूर्वं' शब्दः प्रथमाध्याय मपेक्ष्यात्र द्वितीयाध्याय सूचयति ।
‡ लोहा इत्यत्र=लोहेत्यत्र एकादेश आर्षः ।