बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम रजिस्टर कापी संख्या २ वस्तुतः कापी संख्या ४—
तृतीयाध्यायप्रारम्भः†
दर्पणाधिकरणम्
दर्पणाधिकरण प्रस्तुत है ।
दर्पणाश्च ॥ अध्याय ३ । सूत्रम् १ ॥
बोधानन्दवृत्तिव्याख्याश्लोकाः ॥
पूर्वाध्याये भस्त्रिकान्तमुक्तंवा सूत्रैर्यथाक्रमम् ।
अथ तृ (द्वि?)तीयाध्यायेस्मिन्नुच्यन्ते यानदर्पणाः ॥ १ ॥
पदद्वयं भवेदस्मिन् सूत्रे दर्पणबोधकम् ।
तत्रादिमपदात् सम्यग्दर्पणास्सूचितास्तथा ॥ २ ॥
तद्विशेषप्रभेदाद्याश्चकारात् सन्निदर्शिताः ।
पदार्थमेवं कथितं विशेषार्थोधुनोच्यते ॥ ३ ॥
वैमानिकाङ्गमुकुरास्सप्तोक्ताश्शास्त्रत क्रमात् ।
तेषां नामानि वक्ष्यामि लल्लोक्तानि यथाक्रमम् ॥ ४ ॥
पूर्वाध्याय में सूत्रों से भस्त्रिकापर्यन्त विषय कहकर अब इस द्वितीय अध्याय में विमान के
दर्पण कहे जाते हैं । इस सूत्र में दो पद दर्पण बोधक हैं । उनमें आदिम पद से सम्यक् दर्पण सूचित
किये हैं, उसके विशेष भेदादि 'च' से दिखलाये हैं । पदों का अर्थ इस प्रकार कह दिया, विशेष अर्थ
अब कहा जाता है । विमान के अङ्ग मुकुर—दर्पण शास्त्र से सात कहे हैं उनके नाम लल्ल के कहे हुए
यथाक्रम कहूंगा ॥ १–४ ॥
उक्तं हि मुकुरकल्पे—मुकुरकल्प में कहा है—
विश्वक्रियादर्पणोथ शक्त्याकर्षणदर्पणः ।
वैरुप्यदर्पणस्तद्वत्कुण्टिणीदर्पणस्तथा ॥ ५ ॥
† पूना फोटो के अनुसार यह कापी २ होने से द्वितीयाध्याय दिया है परन्तु पूर्व की दक्षिण कापी होने से
तृतीयाध्याय है ।