बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमूषाधिकरण ] [ ४६
एवमुक्त्वा बीजलोहमेलनादीन्यथाक्रमम् ।
अथेदानों गालनार्थं मूषालक्षणमुच्यते ॥४६॥
इस प्रकार आम्लहन लोह की उत्पत्ति में ऊष्मप लोहों में यथाविधि ११, ८, ४, लोहभागों
की तीन वर्गों में से सुहागा २०, १२, ३६ भागों को मूषा-बोतल में भली प्रकार भर दे यहां शास्त्रनिर्णय
है, तथा विश्वम्भर की उत्पत्ति में ५, ७, ८ ऊष्म लोहांशों को तीन वर्गों में सुहागा १६, ८, १० भाग
मिला दे । विशल्यकृत् लोह की सृष्टि-उत्पत्ति में ऊष्मप लोहों में ३, ५, ११ लोह भाग और २८, १२, ६
भाग सुहागासहित मूषा में भरे । द्विजमित्र की उत्पत्तिविधि में ऊष्मप लोहों में ८, ३, ६ लोहांशों को
तीन वर्गों में से यथाक्रम ५, ८, १० (सुहागा) मूषा में बुद्धिमान् मिलावे । तथा वातमित्र नामक
ऊष्मप लोहे की उत्पत्ति क्रियाविधिमें तीन वर्गों में ८, ६, ५ लोहांशों को २२, ८, १० भाग सुहागा मूषा-
बोतल में मिलावे। इस प्रकार बीज लोहों के मेल यथाक्रम कहकर अब गलाने के लिये मूषा-
बोतल का लक्षण करते हैं ॥४१-४६ ॥
अथ मूषाधिकरणम् ।
अथ मूषा का अधिकरण प्रस्तुत करते हैं।
पञ्चमाद् द्वितीये ॥ अ० २ सू० ३ ॥
बो० सू०
मूषास्वरूपं निर्णोतुं सूत्रोय परिकीर्तित ।
पदद्वय भवेदस्मिन् मूषानिर्णयबोधकम् ॥५०॥
तत्रादिमपदान्मूषा सङ्ख्या तस्सन्निरूपिता ।
तथैव तद्वर्गसंख्या द्वितीयपदनस्स्फुटम् ॥५१॥
पदार्थमेव कथित विशेषार्थोधुनोच्यते ।
षोडशोष्मलोहानामुत्पत्तौ गालनक्रम ॥५२॥
पूर्वोक्तबीजलोहानामेतस्यामेव दर्शितम् ।
मूषास्वरूप के निर्णय करने को यह सूत्र कहा है, इसमें दो पद मूषानिर्णय के बोधक हैं ।
उनमें आदि पद से मूषा को सख्या से निरूपित किया है, तथा द्वितीय पद से उसकी वर्गसंख्या को
स्पष्ट किया है । पदों का अर्थ इस प्रकार कह दिया अब विशेष अर्थ कहा जाता है । सोलह ऊष्मप लोहों
को उत्पत्ति में गलाने का क्रम पूर्वोक्त बीज लोहों का इसी में कहा गया है ॥ ५०-५३ ॥
तदुक्तं निर्णयाधिकारे—वह कहा है निर्णय अधिकार में—
उत्तमाधममध्यापञ्च शाना गालनविधौ ।
मूषास्सप्तोत्तरचतुश्शतभेदा इतीरिता. ॥५४॥
तासा द्वादशवर्गास्स्युर्जातिनिर्णायत क्रमात् ।
लोहेषु ये बीजलोहास्तेषा गालनकर्मणि ॥५५॥
द्वितीयवर्गोक्तमूषा एव श्रेष्ठा इतीरिता । इत्यादि