बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
२७४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
समाहृत्यातिसरलात्काचकंकुरयोगतः ।
प्रादक्षण्ये क्रमाद् याने धूमोद्गमपुरो भुवि ॥२१४॥
स्थितभुज्युकलोहस्य नालान्तर्गततन्त्रिभिः ।
सन्धाय विधिवत् पश्चात् प्रतिधूमोद्गमान्तरे ॥२१५॥
पूर्वोक्त काचावरणनाली लोहनालके तारोंसे शक्तिपूरकपात्रसे शक्तिको यथाविधि लेकर पात्रस्थ द्रवपात्रों
में क्रम से भली भांति भरने को एक एक नाल में संशोधित चार तारें काचचक्रमूख से सम्यक् जोडकर
पूर्वोक्त पात्रों में अन्दर रखे कांचपात्रों में द्रावक में भरकर फिर उस पात्रमूल से दो तारे क्रम से शक्ति
को खीचने के लिये कीलों से बाहिर लगादे फिर उन दोनों कीलों से उन दोनों तारों को सरल लेकर
अतिसरल कांचकङ्कुरयोग से—कांच घुण्डीवाले योग से घूमाकर यान में धूम को निकालने वाले यन्त्र
के सामने भूमि में स्थित भुज्यु लोहे की नालों के अन्दरवाले तारों से विधिवत् जोडकर प्रत्येक धूम को
निकालने वाले यन्त्र के अन्दर—॥ २०६-२१५ ॥
स्थितविद्युद्घर्षकमणिकीलकेषु यथाक्रमम् ।
शक्तिं संयोजयेत् ताभ्यां सप्रमाणं यथोचितम् ॥२१६॥
एव धूमोद्गमनालस्तम्भस्थे च यथाविधि ।
उक्तविद्युद्घर्षकमणिकीलके स्तन्नियोजयेत् ॥२१७॥
एतेन सर्वत्र विद्युद्व्याप्तिस्स्याद् व्योमयानके ।
तस्माद् विद्युद्यन्त्रमेव कृत्वा शास्त्रानुसारतः ॥२१८॥
वामभागे विमानस्य स्थापयेत् सुदृढ यथा । इत्यादि
—स्थित हुए विद्युद्घर्षणमणि की कीलों में यथाक्रम शक्ति को उन दो तारों से यथोचित युक्त
करे, इस प्रकार धूमोद्गमनाल के स्तम्भ में भी यथाविधि उक्त विद्युद्घर्षकमणि की कीलों से संयुक्त करे
जोड दे । इससे व्योमयान में सर्वत्र विद्युत् की व्याप्ति होजावे, अतः शास्त्रानुसार ही विद्युद्यन्त्र करके
विमान के वामभाग में सुदृढ स्थापित करे ॥२१६-२१८॥
अथ वातप्रसारणयन्त्रनिर्णयः—अब वातप्रसारणयन्त्र का निर्णय है—
उक्तं हि क्रियासारे—कहा ही है क्रियासर ग्रन्थ या प्रकरण में—
विमानोत्क्षेपणार्याय खपथे शास्त्रत क्रमात् ।
वातप्रसारणं नाम यन्त्र शास्त्रेषु वर्णितम् ॥२१६॥
इत्युक्तत्वाद् यन्त्रमद्य सग्रहेण निरूप्यते ।
एतद्यन्त्र वातमित्रलोहादेव प्रकल्पयेत् ॥२२०॥
अन्यथा यदि कुर्वीत तत्क्षणात्नाशमेधते ॥२२१॥
आकाशमार्ग में विमान को ऊपर उठाने के लिये शास्त्रानुसार क्रम से वातप्रसारण नाम का
यन्त्र शास्त्रों में कहा है । ऐसा कहे जाने से अब यन्त्र संक्षेप में कहा जाता है, यह यन्त्र वातमित्र लोहे
से ही बनावे अन्यथा करेगा तो नाश को प्राप्त हो जावेगा ॥२१६—२२१॥
सुन्दरविमान ] [ २७५
वातमित्रलोहमुक्तं लोहतन्त्रे- वातमित्रलोह कहा है लोहतन्त्र में-
रसाञ्जनिकभागाशास्त्रयोदश तथैव हि ।
प्रभञ्जनस्य भोगास्तु सप्तविंशदितीरिता ॥२२२॥
पराङ्कुशस्य भागास्सप्तत्रिंशदिति कीर्तिताः ।
एतानि सर्पास्यमूषाया तत्तद्भागानुसारत ॥२२३॥
सम्पूर्य विधिवच्चक्रमूलकुण्डे यथाविधि ।
संस्थाप्य पश्चाद् वारणास्यभस्त्राद् वेगेन शास्त्रत ॥२२४॥
धमनेत् षोडशोत्तरद्विशतकक्ष्योष्णमानत ।
समीकरणयन्त्रेथ तद्रसं परिपूरयेत् ॥२२५॥
एव कृते वातमित्रलोह भवति नान्यथा ।
एतेनैव हि लोहेन कुर्याद् यन्त्राणि शास्त्रत ॥२२६॥
रसाञ्जनिक-रसोत १३ भाग तथा प्रभञ्जन ? के २७ भाग पराङ्कुश ? के ३७ भाग कहे ।
इनको सर्पास्यमूषा-कृत्रिमबोतल में उनके भागानुसार भरकर विधिवत् चक्रमूलकुण्ड में यथाविधि स्थापित
करके पश्चात् वारुणास्त्र हाथीमुख जैसी भस्त्रा-धौंकनी से २१६ दर्जे की उष्णता से धोंक समीकरण
यन्त्र में पिंघले द्रवको भरदे ऐसा करने पर वातमित्रलोह होजाता है अन्यथा नहीं यन्त्र ऐसे लोहे से
शास्त्रानुसार करे ॥२२२-२२६॥
आदौ पीठस्ततो नालस्तम्भयन्त्रस्तथैव च ।
वातपूरकचक्रकीलकानि तत परम् ॥२२७॥
वाताकर्षणभस्त्रिकामुखयन्त्रमतस्तथा ।
मुखसङ्कोचविकासनकीलकौ तदनन्तरम् ॥२२८॥
सकीलकयातायातनालश्चैव तथैव हि ।
यन्त्राणा कवच तद्वदातस्तम्भास्तथैव हि ॥२२६।
वातोद्गमाख्यनालश्च भस्त्रिकोन्मुखमेव च ।
तथैव वातपूरककीलकानि तत परम् ॥२३०॥
वातनिर्सनपङ्कूकीलकानीति द्वादश ।
एतानि यन्त्रस्याङ्गानीति यथाक्रमम् ॥२३१॥
प्रथम पीठ बनावे फिर नालस्तम्भयन्त्र उसके पश्चात् वातप्रपूरकचक्रकीलें पुन वाताकर्षण
भस्त्रिकामुखयन्त्र तथा उसके पीछे मुख के सङ्कोच विकास करने वाली दो कीलें फिर कीलोंसहित याता-
यात नाल, यन्त्रों का कवच, उसी प्रकार वातस्तम्भ भी, वातोद्गमाख्यनाल भस्त्रिकोन्मुख भी उसी प्रकार
वातपूरककीलें पुन' वातनिर्सनपङ्कू-अरापत्तचक्र की कीलें । ये यन्त्र के अङ्ग यथाक्रम वर्णित किए
हैं ॥ २२७-२३१ ॥
अथ पीठनिर्णयः-अब पीठ का निर्णय करते हैं-
२७६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
षड्वितस्त्यायामकं च गात्रमेकवितस्तिकम् ।
चतुरश्रं वर्तुलं वा पीठं कुर्याद् यथाविधि ॥ २३२ ॥
त्रिचक्रनालस्तम्भसंस्थापनार्थं यथाविधि ।
कुर्यात्केन्द्रद्वयं पीठे दक्षिणोत्तरयोः क्रमात् ॥ २३३ ॥
६ बालिश्त लम्बा १ बालिश्त मोटा चौकोर या गोल पीठ यथाविधि बनाना चाहिए त्रिचक्र-
नालस्तम्भ के संस्थापनार्थ दो केन्द्र पीठ में दक्षिण उत्तर में क्रम से करे ॥ २३२-२३३ ॥
त्रिचक्रनालस्तम्भयुक्तं यानबिन्दौ-त्रिचक्रनालस्तम्भ यानबिन्दु में कहा है-
वितस्तित्रयमायामो वितस्त्यष्टकमुन्नतौ ।
नालस्तम्भो कल्पयित्वा केन्द्रयोरुभयोः क्रमात् ॥ २३४ ॥
संस्थापयेत् ततो नालस्तम्भयो मूलत क्रमात् ।
कल्पयेदावृत्तकीलरन्ध्राणि त्रीण्यथाविधि ॥ २३५ ॥
तेषु सन्धारयेत् पश्चात् क्रमात् तत्कीलकान् दृढम् ।
३ बालिश्त लम्बे-चौड़े ८ बालिश्त ऊँचे दो नालस्तम्भ बनाकर (पीठ के) दोनों केन्द्रोंमें संस्थापित
करके लगादे फिर दोनों नालस्तम्भों के मूल से क्रमशः तीन घूमनेवाली या गोल कीलों के छिद्र उन छिद्रों
में उन कीलों को जोड दे (फिट् कर दे) ॥ २३४-२३५ ॥
तदुक्तं यानबिन्दौ-वह यह यानबिन्दु में कहा है-
वितस्त्यैकायामयुक्तं वितस्तिद्वयमुन्नतम् ॥ २३६ ॥
सीत्कारीनालवत्कृत्वा योजयेत् स्तम्भरन्ध्रके ।
चक्राणि कारयेत् त्रीणि वितस्त्यायामतस्ततः ॥२३७॥
दन्तैः क्रकचवत् सम्यग्युक्तानि सुदृढान्यथा ।
अनुलोमविलोमाभ्यामूर्ध्वाधोगमनं यथा ॥ २३८ ॥
तथा नालान्तरे सम्यग्योजयेत् कीलकैस्सह ।
वातपूरकनालं तु चक्रमध्ये निवेशयेत् ॥ २३६ ॥
कीलचङ्क्रमणाच्चक्रभ्रमणं भवति स्वतः ।
वातपूरकनालस्य तेन सञ्चालनं भवेत् ॥ २४० ॥
१ बालिश्त लम्बा चौड़ा २ बालिश्त उठा हुआ-ऊँचा सीत्कारीनाल-वायु को खींचती हुई सीत्
करनेवाली नाल जैसी बनाकर स्तम्भ के छिद्र में लगावे, तीन चक्र १ बालिश्त लम्बे सुदृढ बनावे दान्तों
से युक्त आरे की भांति, जिससे अनुलोम विलोम से ऊपर नीचे गमन हो। नालों के अन्दर भली प्रकार
कीलों से युक्त करदे और वातपूरक नाल को चक्रों के मध्य में लगादे कीलों के घूमने से चक्रों का घूमना
स्वतः होगा इससे वातपूरक नाल का चलना होगा ।
ऊर्ध्वाधोगमनान्नालो वेगाद् वायुं प्रकर्षति ।
स्तम्भद्वयस्य मूलाग्रात् पूर्वपश्चिमपार्श्वयोः ॥२४१॥
सुन्दरविमान ] [ २७७
वातपूरकचक्रकीलकान्येवं नियोजयेत् ।
वाताकर्षणभस्त्रिकामुख्ययन्त्रान्यत् परम् ॥२४२॥
वातपूरकचक्रकीलकेभ्यस्सन्धारयेत् क्रमात् ।
ऊपर नीचे नाल के चलने से नालवेग से वायु को खींचता है, दोनों स्तम्भों मूलाम से पूर्व
और पश्चिम में वातपूरक चक्र की कीलों को इस प्रकार करे, इससे आगे वाताकर्षण भस्त्रिकामुख्ययन्त्रों
को वातपूरक चक्र की कीलों से जोडदे ॥२४१-२४२॥
भस्त्रिकामुख्ययन्त्रमुक्तं बुडिलेन—भस्त्रिकामुख्ययन्त्र कहा है बुडिल आचार्य ने—
चक्रकण्ठमृगचर्म समाहृत्य यथाविधि ॥२४३॥
संशोध्य पुत्रजीविकातैलेनाथ यथाक्रमम् ।
पाचयेत् त्रिदिन पश्चात् क्षालयेच्छुद्धवारिणा ॥२४४॥
गजदन्तिकतैलेन लेपयित्वा मुहुर्मुहुः ।
आतपे स्थापयेत् पञ्चवासराणि तत परम् ॥२४५॥
षड्वितस्तिप्रमाणेण पश्चाद् यन्त्र प्रकल्पयेत् ।
यन्त्रमूलस्य विस्तारो वितस्तित्रयमुच्यते ॥२४६॥
तन्मध्यदेशविस्तारो वितस्तीना चतुर्भवेत् ।
तमन्त्ये देशविस्तारो वितस्त्यैकमितीरितम् ॥२४७॥
भस्त्रिकामुखदेशेथ सङ्कोचनविकासकम् ।
अनुलोमविलोमाभ्या स्थापयेत् कीलकद्वयम् ॥२४८॥
कीलकद्वयभ्रामण्याद् यातायात यथा भवेत् ।
संस्थापयेदेकदण्डमेतन्मध्ये तथा क्रमात् ॥२४६॥
वेगात्सञ्चालन तद्वत्स्तम्भन च तथैव हि ।
यथाभवेत् तथा कर्तुं स्थापयेत् कीलकद्वयम् ॥२५०॥
चक्रकण्ठमृग--चक्रदंष्ट्रमृग--वराह--सुवर ? का चर्म लेकर यथाविधि पुत्रजीवक-
जीयापोता के तैल से यथाक्रम तीन दिन तक पकावे फिर शुद्ध जल से प्रक्षालित कर-
गजदन्तिका ओषधि के तैल का पुन पुन लेप करके पांच दिन तक धूप में रखे फिर ६ बालिश्त यन्त्र
बनावे यन्त्र के मूल का विस्तार ३ बालिश्त उसके मध्यदेश का विस्तार ४ बालिश्त अन्तवाले देश का
विस्तार १ बालिश्त कहा है । भस्त्रिका के मुखदेश में सङ्कोच विकास के साधन दो कीलों अनुलोमविलोम
रीति से स्थापित करे, दोनों कीलों के घुमाने से जिस प्रकार यातायात हो सके इस प्रकार उनके मध्य
में एक दण्ड लगावे फिर वेग से चालन और स्तम्भन हो सके ऐसा करने को दो कीलें स्थापित करे ॥
२४३-२५०॥
कीलकभ्रमणाद् यातायातदण्डप्रचालनम् ।
भवेत्तद्वेगस्सम्यग्भस्त्रिकामुखचालनम् ॥२५१॥
२७८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
वाताकर्षणनालस्य यातायातमपि क्रमात् ।
भस्त्रिकामुखवाताकर्षणनालप्रकर्षणात् ॥२५२॥
प्रभवेद् वेगत्तो वाताकर्षणं तन्मुखान्तरात् ।
एव त्रिचक्रनालस्तम्भेषु वातापकर्षणम् ॥२५३॥
यथा भवेत् तथा सर्वकीलकानि यथाक्रमम् ।
सन्धारयेद् विशेषेण तत्तत्स्थानेषु शास्त्रतः ॥२५४॥
विंशत्कक्ष्योष्णवेगेन कीलकानां परिभ्रमः ।
त्रिचक्रनालस्तम्भेषु यथा भवति तत्क्षणात् ॥२५५॥
क्रमात् सञ्जायते वायुरन्तर्नालस्तस्वभावतः ।
शतप्रेङ्खणमानेन तथैव हि विशेषतः ॥२५६॥
भस्त्रिकामुखयन्त्रेभ्यश्चापि वायुस्स्वभावतः ।
जायते द्विसहस्रप्रेङ्खणमानेन निर्मलः ॥२५७॥
क्रमादेतद्वायुवेगादपि यानं प्रधावति ।
तस्मात् प्रकल्प्य विधिद्वद् यन्त्राणि द्वादश क्रमात् ॥२५८॥
कीलों के भ्रमण से यातायात दण्ड का प्रचालन हो जावे उसके वेग से भस्त्रिकामुख का
चालन हो जाता है वाताकर्षणनाल का भी यातायात क्रम से भस्त्रिकामुखवाताकर्षणनाल को खींचने से
वाताकर्षण उस नाल के मुख में से होने लगे, इस प्रकार तीन चक्रों के नालस्तम्भों में वात का खींचना
जैसे हो वैसे सारी कीलों को उन उन स्थानों में शास्त्र से, २० दर्जे की उष्णतावेग से कीलों का घूमना
तीन चक्रों के नालस्तम्भों में तत्क्षण क्रम से हो जाता है, वायु नाल के अन्दर से स्वभावत सौ प्रेङ्खण-
भूल-वेग-अश्ववेग-अश्वगति के मान से प्रकट हो जाता है, भस्त्रिकामुख यन्त्रों से भी स्वभावत वायु
दो सहस्र अश्वगति मान से निर्मल वायु चलता है । इस वायु-वेग से भी यान दौड़ता है अतः १२
यन्त्रों को विधिविधान् बनाकर- ॥२५१-२५८॥
विमानस्य चतुर्दिक्षु वातोद्गमपुरो भुवि ।
एकैकपार्श्वे यन्त्राणि त्रीणि नियोजयेत् ॥२५६॥
कुर्यादावरणं तेषां तत्तन्मानानुसारतः ।
वितस्तित्रयमायामं वितस्तिद्वादशोन्नतम् ॥२६०॥
यथाभवेत् तथानालस्तम्भान् द्वादश कल्पयेत् ।
पूर्वोक्तयन्त्रावरणोर्ध्वप्रदेशे पृथक् पृथक् ॥२६१॥
वेगाद् वातोत्क्षेपणात्थं स्तम्भान् संस्थापयेद् दृढम् ।
षट्शतोत्तरद्विसहस्रप्रेङ्खणप्रमाणतः ॥२६२॥
एकैकस्तम्भतो वायुरूध्वं गच्छति वेगतः ।
कालानुसारतो वायुर्यावदपेक्षितं भवेत् ॥२६३॥
सुन्दरविमान ] [ २७६
तावदेव गृहीत स्यात् प्रतियन्त्रमुखान्तरात् ।
तस्मात् पृथक् पृथग्यन्त्राणीति शास्त्रे वर्णितम् ॥२६४॥
विमानस्योर्ध्वगमनमेतेनापि भविष्यति ।
वायुत्पत्तिक्रम व्यष्ट्या मन्त्रै रेव निरूपितम् ॥२६५॥
विमान की चारों दिशाओं में वातोद्गमयन्त्र के सम्मुख भूमि की ओर एक एक पार्श्वभाग में
तीन यन्त्र लगावे, उनका आवरण भी उस उसके मान से करे । ३ बालिश्त लम्बा चौड़ा १२ बालिश्त
ऊंचे जैसे हो ऐसे १२ नाल स्तम्भों को बनावे पूर्वोक्त यन्त्रावरण के उपरि प्रदेश में पृथक् पृथक् ।
वेग से वात के ऊपर फेंकने के लिये स्तम्भों को दृढ संस्थापित करे २६०० अश्वगति के मान से । एक
एक स्तम्भ से वायु वेग से ऊपर जाता है कालानुसार जितना वायु अपेक्षित होना चाहिए उतना ही
प्रत्येक यन्त्रमुख में से लिया जावे । अतः पृथक् पृथक् यन्त्र है यह शास्त्र में वर्णित है । विमान की
ऊर्ध्वगमन—ऊपर जाना इससे भी हो जायगा, वायु की उत्पत्ति का क्रम व्यष्टिरूप से यन्त्रोंद्वारा ऐसे
निरूपित किया है ॥२६४—२६५॥
समष्ट्या वातमाहर्तुं बृहत्स्तम्भ प्रचक्षते ।
चतुर्बितस्त्यायाम त्रिंशद्वितस्त्युन्नत तथा ॥२६६॥
वातोद्गमनालस्तम्भ कृत्वा पश्चात् यथाविधि ।
यन्त्राणा मध्यकेन्द्रेऽथ स्थापयेत्सुदृढ यथा ॥२६७॥
भस्त्रिकोन्मुखयन्त्राणि स्तम्भमूले नियोजयेत् ।
यन्त्राणा वातमाकृष्य स्तम्भे पूरयितु क्रमात् ॥२६८॥
यन्त्रादिस्तम्भमूलान्तं तत्तद्रेखानुसारत ।
वाताकर्षणनालानि समाहृत्य यथाविधि ॥२६६॥
स्तम्भमूलान्तरे सम्यक् सन्धार्याथ यथाक्रमम् ।
वातपूरककीलानि तत्तन्नालमुखान्तरे ॥२७०॥
समष्टिरूप से वायु को आहरण करने के लिये बृहत्स्तम्भ चक्र कहते हैं वह ४० बालिश्त लम्बा
चौड़ा ३० बालिश्त ऊंचा वातोद्गमनालस्तम्भ करके—बनाकर पश्चात् यथाविधि यन्त्रों के मध्यकेन्द्र में
सुदृढ़ स्थापित करे । यन्त्रों के वायु को आकर्षित कर—खींचकर स्तम्भ में भरने को क्रम से भस्त्रिको-
न्मुखयन्त्रों को स्तम्भ के मूल में लगावे यन्त्रों से लेकर स्तम्भमूल तक उस उसकी रेखा के अनुसार
वाताकर्षणनालों को यथाविधि लेकर स्तम्भमूल के अन्दर सम्यक् यथाक्रम जोडकर वातपूरक कीलों को
उस उस नालमुख के अन्दर—
संयोज्य विधिवत् पश्चान्नालस्तम्भमुखान्तरे ।
अष्टाङ्गुलायाममुखविलं कृत्वा यथाविधि ॥२७१॥
तस्योपरि यथाशास्त्रं वितस्त्यैकोन्नत तथा ।
वितस्तित्रयमायाम मुख्ययन्त्र नियोजयेत् ॥२७२॥
२४० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
एतत्पात्राद् बहिर्याति वातस्तम्भान्तरे स्थित. ।
वायुवेगाद् विशेषेण तरङ्गाकारवत् स्वत ॥२७३॥
पश्चाद् धूमोद्गमयन्त्रस्थितधूमप्रसारणम् ।
वातप्रसारण यन्त्र स्तत्तदेव यथाविधि ॥२७४॥
तद्यन्त्रस्थितवातस्य क्रमाद् धूमोद्गमे यथा ।
भवेत् प्रवेशस्सरलात् तथा शास्त्रविधानत. ॥२७५॥
विधिवत् युक्त करके फिर नालस्तम्भमुख के अन्दर ८ अंगुल बडा मुख छिद्र उसके ऊपर
यथाशास्त्र १ बालिश्त ऊंचा ३ बालिश्त लम्बा चौड़ा मुखपात्र—ढक्कन लगावे बातस्तम्भ के अन्दर
स्थित वायु इस पात्र से वेग से तरङ्गाकार की भांति स्वत. बाहिर जाता है । पश्चात् धूमोद्गमयन्त्रस्थित
धूम का प्रसारण यन्त्रों से उसी भांति होता है, उस यन्त्र में स्थित वात का धूमोद्गम में जैसे
सरलता से प्रवेश हो उस प्रकार शास्त्रविधान से—
त्रिचक्रनालकोलांश्च सन्धार्याय यथाक्रमम् ।
तत्कीलकंर्यथाकाम धूम वा वायुमेव वा ॥२७६॥
समाकृष्याय विधिवत् तत्तत्कालानुसारत ।
उपयोक्तु भवेत् सम्यग्यथेष्ट सप्रमाणत. ॥२७७॥
एतद्यन्त्रस्य विधिवच्चतुर्दिक्षु यथाक्रमम् ।
वातनिरसनपङ्गुचक्राणि स्थापयेदथ ॥ २७८ ॥
एतच्चक्राणि वेगेन भ्रामयेद् यदि कीलकै. ।
वायु निराकृत्य पश्चाद् व्योमयान. प्रधावति ॥ २७६ ॥
तेन सर्वत्र वेगेन निरातङ्क यथा तथा ।
तीन चक्रों की नालकोलों को यथाक्रम लगाकर उन कीलों से यथेच्छ धूएं को या वायु को
खींचकर विधिवत् कालानुसार यथेष्ट मात्रा में भलीभांति उपभोग कर सके । इस यन्त्र की चारों दिशाओं
में यथाक्रम बातनिरसनपङ्गु—वायु निकलने के चपटे असंख्यक्त चक्रों या पेंचचक्रों को स्थापित करे,
इन चक्रों को यदि कीलों से वेग से घुमावे तो व्योमयान वायु को निकाल कर उस वेग से निरातङ्क
निर्भय सर्वत्र दौडता है ॥ १७६-१७६ ॥
अथ विमानावरणनिर्णयः—अब विमान के आवरण का निर्णय करते हैं—
आवृत्य धूमोद्गमयन्त्राणि कुड्यान्यथाविधि ॥ २८० ॥
विमानावरणं कर्तुं कुर्याच्छकुनवक्रमात् ।
सुन्दराख्यविमानस्यावरणं च यथाविधि ॥ २८१ ॥
राजलोहेनैव कुर्यादन्यथा निष्फलं भवेत् ।
पश्चादावरण यावद्गृहसंख्या विधीयते ॥ २८२ ॥
तावत्संख्यानुसारेण विभज्याथ यथाक्रमम् ।
सुन्दरविमान ] [ २८१
कुर्याद् गृहाणि विधिवत्पूर्वोक्तशकुने यथा ॥ २८३ ॥
द्वात्रिंशदङ्गयन्त्राणां स्थानानि च यथाक्रमम् ।
चातुर्मुखोष्ण्यकयन्त्रस्थापनार्थं यथाविधि ॥२८४॥
तद्गृहाणां मध्यदेशे चतुरश्राकृतिर्यथा ।
त्रिंशद्वितस्त्यायामप्राङ्ग (ङ्क ?) ण परिकल्पयेत् ॥ २८५ ॥
अत्रैव स्थापयेत्सम्यक् चातुर्मुखोष्ण्ययन्त्रकम् ।
धूमोद्गमयन्त्रों को ढक कर विमान का आवरण—आच्छादन करने को शकुनविमान की
भांति कुड्य—दीवारें बनावें सुन्दर विमान का आवरण भी यथाविधि राजलोह से ही करे अन्यथा
निष्फल हो जावे । फिर घरों–कमरों की जितनी संख्या कही हो उतनी संख्या में आवरण यथाक्रम
विभागशः करे उतनी संख्या में घर भी शकुनविमान की भांति ३२ अङ्गयन्त्रों के स्थान भी यथाक्रम करे,
चारमुखवाला यथाविधि औष्ण्य यन्त्र स्थापनार्थ उन घरों के मध्य देश में चोकोर ३० बालिश्त लम्बा
चौडा प्राङ्गण—आङ्गन स्थल–फर्श बनावे यहां ही चातुर्मुखोष्ण्ययन्त्र स्थापित करे ॥ २८०-२८५ ॥
एतदुक्तं यन्त्रसर्वस्वे—यह यन्त्रसर्वस्व में कहा है—
चातुर्मुखोष्ण्ययन्त्ररचना कुण्डोदरेण हि ॥ २८६ ॥
कर्तव्यमिति शास्त्रेषु प्रवदन्ति मनीषिणः ।
चातुर्मुखोष्ण्ययन्त्ररचना कुण्डोदर लोहे से करनी चाहिए ऐसा शास्त्रों में मनीषीजन
कहते हैं ॥२८६॥
कुण्डोदरलोहमुक्तं लोहसर्वस्वे—कुण्डोदर लोहा कहा है लोहसर्वस्व ग्रन्थ में—
सोमकञ्चुकशुण्डाललोहान्* शुद्धान् यथाविधि ॥ २८७ ॥
क्रमात्त्रिंशत्पञ्चचत्वारिंशद्विशांशतः क्रमात् ।
सम्पूर्य पदममूषाया कुण्डे छत्रमुखाभिधे ॥ २८८ ॥
संस्थाप्य वासुकी भस्त्रात्सम्यग्वेगाद् यथाविधि ।
षोडशोत्तरसप्तशतोष्णाकक्ष्यप्रमाणतः ॥ २८६ ॥
भ्रानेत्रान्तं गालयित्वा यन्त्रे सम्पूरयेच्छनं ।
एवकृते नीलवर्णं सुसूक्ष्मं भारवर्जितम् ॥ २९० ॥
द्विसहस्रकक्ष्योष्णवेगसहं सुरुचं दृढम् ।
सहस्रघिनशतघ्नीभिरुच्छेद्यं चातिशीतलम् ॥ २९१ ॥
भवेत् कुण्डोदर नामलोहं कृतवंगजम् ।
एतल्लोहेन विधिवत् कुर्यात् यन्त्रं मनोहरम् ॥ २९२ ॥
एतदौष्ण्ययन्त्राणां रचनादौ विनिश्चितम् ।
- 'पूनाफोटो पाठ. परन्तु कुण्टार्कलोहश्च विशोधितम्' हस्तलेखपाठ ।
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Let's see: रवप्रसारणकीलनाल (च?) तथैव हि ॥ २६६ ॥ or रवप्रसारणकीलनाल.(च?)तथैव हि ॥ २६६ ॥.
Wait, in L16, there is no space, it's कीलनाल.(च?)तथैव. A dot might just be a period or broken type. But कीलनाल.(च?)तथैव or कीलनाल (च?) तथैव? Putting (च?) is clear. Let's look at whether there's a space or dot:
रवप्रसारणकीलनाल.(च?)तथैव हि ॥ २६६ ॥
Let's check line breaks and markers:
२८२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
सोम, कञ्चुक, शुण्डाल लोहों को यथाविधि शुद्ध करके क्रम से ३०, ४५, २० अंशों में ले
पद्ममूषा यन्त्र में छत्रमुखनामककुण्ड में रखकर वासुकी-सर्परूप लम्बी भस्त्रिका से ७१६ दर्जे की
उष्णता से नेत्रपर्यन्त गलाकर धीरे से यन्त्र में भर दे ऐसा करने पर नीले रंग का भाररहित अति सूक्ष्म
दो सहस्र दर्जे की उष्णता वेग सहने तक सुन्दर चमक वाला शतघ्नि सहस्रघ्नी तोपों से अच्छेद्य
शीतल हो आ
-> wait,क्रमात् ।Let's re-read the first word of line 17:भ स्मे गा ल प ना र्थंWait, is itभस्मेगालपनार्थं? Let's check the letters: भ स्मे गा ल प ना र्थंWait, could it beभस्मेगालनार्थं? Look between लandना: Is there a प? Look at ल: लis composed of two loops and a downstroke. Then next to it is:प! Wait, is it प? Wait! Look at भस्मगालतार्थंorभस्मगालनार्थं? Wait! Look at the letter between गाandनार्थं: Is it ल+प? Wait, look at लinसमीकृत्य(line 8) -लinप्रकल्पयेत्(line 9). Inप्रकल्पयेत्, ल्पhasलconnected toप. Does line 17 have ल्प? भस्मेगाल्प...? No! Wait, look at: भ, स्मे, गा, ल`,
२८४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
संयोजयेत् कीलकाद्यैरनुलोमविलोमत ।
कीलसञ्चालनाच्चक्रभ्रमणं स्याद् यथा तथा ॥ ३१२ ॥
अग्नि ज्वालोन्मुखं कर्तुं प्रथमचक्रमीरितम् ।
मन्दमध्यमगाढज्वालाप्रकाशार्थमेव हि ॥ ३१३ ॥
द्वितीयचक्रमित्याहुस्तृतीयं तु यथाक्रमम् ।
समीकरणकार्यार्थं स्थापितं स्याद् यथाक्रमम् ॥ ३१४ ॥
अग्निकोशोपरि पुनः नालमेकं दृढं यथा ।
स्थापयेत् पट्टिकामध्ये ततो नालान्तरे क्रमात् ॥ ३१५ ॥
अग्नि जलने के कुण्डपर्यन्त प्रवेश में यथाविधि आदि मध्य तथा अन्त में तीन चक्र यथाक्रम
संयुक्त करे कील आदियों से अनुलोम विलोम रीति से जिससे कि कील के सञ्चालन से चक्रों का भ्रमण
हो सके । अग्नि को ज्वलनोन्मुख करने को प्रथमचक्र कहा है, मन्द मध्य तीव्र ज्वाला प्रकाशार्थ ही द्वितीय
चक्र को कहा है, तृतीय चक्र को यथाक्रम समीकरण कार्यार्थ—शान्त करणार्थ यथाक्रम स्थापित किया
है । फिर अग्निकोश के ऊपर एक नाल दृढ स्थापित करे फिर पट्टिका के मध्य नाल के अन्दर क्रम
से—॥ ३११-३१५ ॥
प्रदक्षिणावृत्तवक्रतन्त्रीस्सन्धारयेत् ततः ।
नालवत् पट्टिका तस्योपर्याच्छाद्य प्रमाणतः ॥ ३१६ ॥
धूमाकर्षणनालं च कल्पयित्वा ततः परम् ।
अग्निकोशान्तभागे संस्थापयित्वा यथाविधि ॥ ३१७ ॥
पूर्वोक्तवक्रतन्त्रीमुखप्रदेशे नियोजयेत् ।
अग्नेर्धूमं समाहृत्य जलकोशे नियच्छति ॥ ३१८ ॥
अग्निकोशाज्ज्वलकोशावरणान्तं यथाविधि ।
जलनालानि सर्वत्र योजयेत् सप्तसङ्ख्यया ॥ ३१९ ॥
जलकोशावरणदेशे सर्वत्रात्यन्तवेगतः ।
पञ्चसहस्रलिङ्गोष्णाव्याप्तिरेतैर्भवेत् क्रमात् ॥ ३२० ॥
—घूमने वाली टेढी तारों को लगावे, नाल की भांति पट्टिका को उसके ऊपर प्रमाण से ढककर
धूमाकर्षण नाल भी बना कर अग्निकोश पर्यन्त भाग में यथाविधि संस्थापित करके पूर्वोक्त टेढी तारों के
मुख प्रदेश में जोड दे । अग्नि के धुएं को लेकर जल कोश में नियन्त्रित करता है अग्निकोश से जल-
कोश पर्यन्त यथाविधि सात जलनालों को सर्वत्र लगावे, जलकोश के आवरण प्रदेश में सर्वत्र अत्यन्त वेग
से इनसे पांच सहस्र लिङ्ग-डिग्री की उष्णता व्याप्ति हो जावे ॥ ३१६-३२० ॥
तेन तप्तं जलं पश्चादौष्म्यं धूमाकृतिं लभेत् ।
जलकोशप्रमाणं तु वितस्त्यष्टकमुच्यते ॥ ३२१ ॥
त्रिचक्रकीलनालानि जलकोशे यथाक्रमम् ।
सुन्दरविमान ] [ २८५
त्रीणि सन्धारेयेत्साम्यात् सुदृढं सरलं यथा ॥ ३२२ ॥
जलोष्ण्यधूमबन्धनार्थं प्रथमं चक्रकीलकम् ।
धूमराशिं कल्पयितुं द्वितीयं चक्रमीरितम् ॥ ३२३ ॥
तत्पुरोभागस्थधूमकुण्डकोशेतिवेगतः ।
पूरणार्थं धूमराशेस्तृतीयं चक्रमीरितम् ॥ ३२४ ॥
धूमपूरककोषष्ड्वितस्त्यायामसम्र्म्मितम् ।
चतुर्वितस्त्युन्नत स्यादिति शास्त्रविनिर्णय ॥ ३२५ ॥
उससे तप्त हुआ जल औष्ण्य धूम—गरम धूंआं रूप हो जावे, जलकोश ८ बालिश्त कहा जाता
है, तीन चक्रकील की तीन नालें जलकोश में समान सरल लगा दे । जलोष्ण्य धूम के रोकने को प्रथम
चक्रकील है, धूमराशि को समर्थ करने को दूसरा चक्र कहा है, उसके सामने वाले भाग के धूमकुण्ड कोश
में अतिवेग से धूमराशि के पूरणार्थ तृतीय चक्र कहा है। धूमपूरक कोश ६ बालिश्त लम्बा ४ बालिश्त
ऊंचा यह शास्त्र का निर्णय है ॥ ३२१-३२५ ॥
औष्ण्यधूमं पूरयितुं धूमकोशे यथाविधि ।
चक्रकीलकान् विशेषेण स्थापयेत् सप्रमाणतः ॥ ३२६ ॥
जलकोशोपरि ततो गोपुराकारतः क्रमात् ।
कुर्यादावरणं सम्यक् सुदृढं सरलं यथा ॥ ३२७ ॥
एतदावरणस्योद्घाटने सम्बन्धनेपि च ।
यथा स्यात् सरलं तद्वत् कीलकानि नियोजयेत् ॥ ३२८ ॥
धूमपूरककोशस्य पुरोभागे यथाविधि ।
यथेष्टं धूमसञ्चोदनार्थं तद्वन्धनार्थं च ॥ ३२६ ॥
सरन्ध्रं पट्टिकाचक्रद्वयं तत्र नियोजयेत् ।
एतच्चक्रभ्रमणार्थं सरलं स्याद् यथा तथा ॥ ३३० ॥
धूमकोश में औष्ण्य धूम—गरम धूंआं भरने को यथाविधि चक्रकीलों को सप्रमाण विशेषरूप से
स्थापित करे फिर जलकोश के ऊपर गोपुर-गवाक्ष आवरण—ढक्कन सरल दृढ कर दे, इस आवरण के
खोलने और बन्द करने में सरलता हो इस प्रकार कीलें नियुक्त करे, धूमपूरक कोश के सामने वाले
भाग में यथाविधि यथेष्ट धूम को धकेलने और बन्द करने को छिद्रसहित दो पट्टिका चक्र नियुक्त करे,
इस चक्र के भ्रमणार्थ जैसे सरलता हो वैसे—॥ ३२६-३३० ॥
सन्धारयेद् भ्रमशिककीलकान्सुदृढान् क्रमात् ।
धूमपूरककुण्डस्य पूर्वभागे तत परम् ॥ ३३१ ॥
वातायनशलाकानष्टाङ्गुलान् मानतस्ततः ।
एकैकमेकाङ्गुलप्रदेशे सस्थापयेद् दृढम् ॥ ३३२ ॥
२८६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
ततो यन्त्रपुरोभागे मध्ये चोर्ध्वप्यध क्रमात् ।
पार्श्वयोरुभयोश्चैव यथाकालानुसारतः ॥ ३३३ ॥
सर्वत्र धूमोद्गम च स्तम्भन च यथा भवेत् ।
पद्मचक्राकारकीलान् तत्तत्स्थानेषु शास्त्रतः ।। ३३४।।
द्वौ द्वौ सन्धारयेत्सम्यक् पश्चात् तत्पृष्ठभागत ।
काष्ठप्रक्षेपणार्याय इङ्गालान् वा यथोचितम् ।। ३३५।।
घुमानेवाली कीलों को क्रम से सुदृढ युक्त करे फिर धूमपूरक कुण्ड के सामनेवाले भाग में
८ अङ्गुल मापवाली वातायनशलाकाएं एक एक को एक एक अङ्गुल प्रदेश में दृढ स्थापित करे फिर यन्त्र
के सामनेवाले भाग में मध्य भाग में और ऊर्ध्व भाग में नीचे भाग में भी क्रम से स्थापित करे तथा दोनों
पार्श्वों में समयानुसार करे । सर्वत्र धूएं का निकलना और रोक देना जिससे बन जावे । पद्मचक्र के
आकारवाली कीलों को उन उन स्थानों में शास्त्र से दो दो कीलें लगावे फिर पृष्ठभाग में काष्ठ फेंकने
के लिये या अंगारों—कोयलों को यथोचित डालने के लिये—॥३३१-३३५॥
सार्धवितस्त्यायामेन विल कुर्याद् यथाविधि ।
कवाटोद्घाटनार्थाय बिलद्वारस्य शास्त्रत ॥३३६॥
यथा स्यात्सरल तद्वत्कीलकान् सन्नियोजयेत् ।
उष्णप्रमापक यन्त्र तथा वेगप्रमापकम् ।। ३३७।।
दक्षिणोत्तरयो पश्चात् तत्कीलस्य यथाक्रमम् ।
मनुष्यवत्प्रवचन कुर्वन्त सुस्फुट क्रमात् ।। ३३८।।
कालप्रमापक यन्त्र तथा तस्योर्ध्वभागके ।
सस्थापयेद् दृढ पश्चाद् दक्षभागे तथैव हि ।। ३३६।।
द्वादशोत्तरद्विशतयुतसहस्रसख्यका ।
यथा शब्दरवतरङ्गोत्पत्तिर्वेगत् क्रमात् ।। ३४०।।
—डेढ बालिश्त लम्बा चौडा छिद्र यथाविधि करे, बिलद्वार के किवाडों को खोलने के अर्थ
शास्त्रानुसार जैसे सरलता हो वैसी कीलें—पेंच लगावें । उष्णता का मापनेवाला वेग का मापनेवाला यन्त्र
दक्षिण और उत्तर में लगावे, मनुष्य की भाँति सुस्फुट बोलते हुए यन्त्र, कालमापक यन्त्र को उसके ऊपर
भागमें लगावे पश्चात् दक्षिण भाग में १२१२ संख्या में शब्द की गूंज तरङ्ग की उत्पत्ति वेग से हो
जावे ॥ ३३६-३४० ॥
छोटिकावच्छिन्नकाले बहिर्याति तथास्थितम् ।
रवप्रसारण नाम कीलनाल नियोजयेत् ।।३४१।।
विमानस्य प्रसरणे स्तम्भने च तथैव हि ।
वेगातिवेगापायेषु एतत्साङ्केतकद्भवेत् ।।३४२।।
स्तम्भनादीन् पञ्चसङ्केतान् निदर्शयितुं पुनः ।
Here is the accurate line-by-line transcript in original Devanagari script:
सुन्दरविमान ] [ २८७
सकीलकानी विविधन्मुखरन्ध्राणि पञ्चधा ॥३४३॥
रवप्रसारणे कृत्वा स्थापयेत् कीलकानि हि ।
एकैककीलभ्रमणादेकैकमुखरन्ध्रक ॥३४४॥
एकैकसाङ्केतरवो वेगान्निस्सरति क्रमात् ।
साङ्केतकस्वररवश्रवणादेव तत्क्षणात् ॥३४५॥
—चुटकी बजाने जितने समय में वैसा स्थित बाहिर निकल जाता है, शब्दप्रसारण कील को भी
नियुक्त करवे, इसी प्रकार विमान के चलाने रोकने में भी कील लगावे । वेग अतिवेग और उनके कम
करने को भी यह संकेत करनेवाली हो । स्तम्भन आदि पांच संकेतों को प्रदर्शित करने के लिये कीलों-
सहित पांच प्रकार के मुखछिद्र शब्द प्रसारणयन्त्र में करके कीलें स्थापित करे, एक एक कील के भ्रमण
से एक एक मुख छिद्र एक एक संकेतवाले स्वर शब्द श्रवण से तत्क्षण—॥३४१-३४५॥
पूर्वोक्तपञ्चसङ्के तान् स्तम्भनालाद् यान् यथाक्रमम् ।
विजायन्ते विशेषेण रवभेदात् पृथक् पृथक् ॥३४६॥
एतद्यन्त्रस्य विधिवत्पार्श्वयोरुभयो क्रमात् ।
षडङ्गुलायामयुतमुन्नते तु यथाविधि ॥३४७॥
षड्विंशतिवितस्तीना प्रमाणेन विनिर्मितौ ।
आघातनालो सुदृढौ पश्चात् सन्धारयेत् ततः ॥३४८॥
पञ्चाङ्गुलायामलोहदण्डो नालद्वयान्तरे ।
मन्धारयेद् यथाशास्त्र नालमानानुसारत ॥३४६॥
आदिमध्यावसानेषु नालयोरुभयो क्रमात् ।
परिभ्रमणचक्रकीलकान्यथ यथाक्रमात् ॥३५०॥
पूर्वोक्त पांच जिन संकेत स्तम्भनाल से यथाक्रम विशेषरूप से शब्दभेद पृथक् पृथक् जाने
जाते हैं, इस यन्त्र के दोनों पाश्र्वों में क्रम से ६ अङ्गल लम्बाई से युक्त ऊंचाई यथाविधि २६ बालिश्त
प्रमाण से बनाये दो आघातनाल सुदृढ पश्चात् लगावे, पांच अङ्गुल लम्बे दा लोहदण्ड दोनों नालों के
नालमापानुसार अन्दर लगावे । आदि में मध्य में और अन्त में दोनों नालों की भ्रमण चक्रकीलें भी ॥
३४६-३५०॥
सन्धारयेद् दृढं तेषा परिभ्रमणत क्रमात् ।
नालद्वयान्तरे सम्यग्दण्डाघातो भविष्यति ॥३५१॥
एतेनापि व्योमयानगमन वेगतो भवेत् ।
सकीलबातभस्त्रिकाश्च बाताहताय हि ॥३५२॥
पूर्वोक्तनालमुखयोस्सम्यक् सन्धारयेद् दृढम् ।
तेन नालान्तरे बाताघातश्चाप्यतिवेगत ॥३५३॥
‡ "सुपां सुपो भवन्तीति जस् स्थाने शस्" विभक्तिव्यत्यय प्रथमा स्थाने द्वितीया ।
२८८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
भवेत् तेन व्योमयानवेग स्याद् द्विगुणं क्रमात् ।
पश्चादौष्ण्यधूमकोशचतुष्पार्श्वेष्वपि क्रमात् ।।३५४।।
यथा वातोद्गमयन्त्रे शुण्डालासम्प्रतिष्ठिता.।
तथैवावृत्त चक्रकीलकं संसंस्थापयेद् दृढम् ।।३५५।।
—लगादे, उनके परिभ्रमण—घूमने से दो नालों के अन्दर वाले दण्ड को आघात होगा इससे
भी व्योमयान वेग से चलता है । कीलसहित वायु की भस्त्रिकाएं वात को धकेलने के लिये पूर्वोक्त
दो नालमुखों में सम्यक् लगावे इससे नालके अन्दर बातका आघात अतिवेग से होगा, इससे भी व्योम-
यान का वेग द्विगुण हो जावे पश्चात् औष्ण्य धूमकोश चारों पाश्र्वों में भी क्रम से जैसे वातोद्गमयन्त्र में
शुण्डाल रखे हैं वैसे ही घूमनेवालो चक्रकीलों से दृढ स्थापित करे ॥३५१-३५५॥
औष्ण्यधूम पूरयित्वा शुण्डालेषु यथाविधि ।
कीलकभ्रमणाद् यस्मिन् कस्मिन् वा दिश्यथाक्रमम् ।।३५६।।
शुण्डालसाङ्केतवशात् सरल गमन यथा ।
भवेद् वेगेन यानस्य ततोर्ध्वमुखत ॐ क्रमात् ।।३५७।।
स्तम्भने गमने चैव अनुकूल यथा भवेत् ।
सन्धारयेद् भ्रामकचक्रकीलकान् यथाविधि ।।३५८।।
शुण्डालस्य तिरोभावप्रकाशौ च यथा भवेत् ।
कीलकानि तथा तत्र सम्यक् सन्धारयेत् तत ।।३५६।।
तृतीयवर्गाताम्रस्य नालद्वय सुशोधितम् ।
यन्त्रस्याग्निजलधूमकोशादारभ्य शास्त्रत ।।३६०।।
औष्ण्य धूम—गरम धूम को शुण्डालों में यथाविधि भरकर कील भ्रमण से जिस किसी दिशा
में यथाक्रम शुण्डालसंकेत के वश से यान का सरल गमन वेगसे हो तब ऊर्ध्वमुख के क्रम से स्तम्भन में
और गमन में अनुकूल जिससे हो अतः भ्रामक चक्रकीलों को लगावे, शुण्डाल के तिरोभाव—सङ्कोच
और प्रकाश—फैलाव भी जिससे हो सके वैसे कीलें लगावे । तृतीय वर्ग के ताम्बे की दो नाल सुशोधित
यन्त्र के अग्नि जल धूमवाले कोश से आरम्भ करके शास्त्रानुसार—
अत्युष्णावेगोपसंहारार्थ सर्वत्र पाश्र्वयो. ।
संवेष्ट्य विधिवत् पश्चात् कीलकं सुदृढ यथा ।।३६१।।
सन्धारयेत् ततोत्युष्णवेग नालद्वय प्रसेत् ।
विमानस्य पुरोभागस्थितवायुविभञ्जने ।।३६२।।
वातविभाजनचक्रकीलकान्यपि शास्त्रत. ।
सस्थापयेद् यथाकाल वातसख्यानुसारतः ।।३६३।।
एव चातुर्मुखी( ो?) ष्म्यकयन्त्र कृत्वा यथाविधि ।
विमानमध्यप्रदेशे स्थापयेत् सुदृढं यथा ।। ३६४ ।।
• तत ऊर्ध्वमुखतः, अत्र 'ततः' शब्दस्य विसर्गलोपे पुनरेकादेशसन्धिकार्यः ।
सुन्दरविमान ] [ २८६
अधोभागस्थयन्त्राणां वातधूमो ( ?रे ) ष्ण्यकैः क्रमात् ।
विमानस्योर्ध्वगमनं भवत्येव न संशयः ॥ ३६५ ॥
अत्यन्त उष्णवेग के उपसंहारार्थ सर्वत्र पार्श्वों में विधिवत् लपेटकर पश्चात् कीलों से सुदृढ
बन्द करे पुनः अत्युष्णवेग को दो नालें प्रसलें—रोक लें । विमान के सम्मुख भाग में स्थित वायु के
विभञ्जन में वात को विभक्त करने वाली कीलों को भी शास्त्र से यथावसर वातसंख्या के अनुसार
संस्थापित करे । इस चतुर्मुखो औष्ण्यक यन्त्र को यथाविधि बनाकर विमानके मध्यप्रदेशमें सुदृढ स्थापित
करे, अधोभागस्थ यन्त्रों—वातधूमौष्ण्यकों से क्रमश निःसंशय विमान का ऊर्ध्वगमन होता
है ॥ ३६१-३६५ ॥
पश्चाद् विमानगमने धूमादीनां यथाक्रमम् ।
वेगप्रमाणं निश्चित्य गणितागमतः क्रमात् ॥ ३६६ ॥
गमने व्योमयानस्य वेगमत्र निरूप्यते ।
छोटिकावच्छिन्नकाले यन्त्राद् धूमोद्गमात् स्वतः ॥ ३६७॥
लिङ्गानां द्विसहस्रं च शतं पश्चाच्च त्रयोदश ।
एतत्प्रमाणतो धूमवेगस्सञ्जायते ध्रुवम् ॥ ३६८ ॥
तथैव वातप्रसारणयन्त्रादपि च क्रमात् ।
पञ्चशतोत्तरद्विसहस्रलिङ्गप्रमाणत ॥ ३६६ ॥
छोटिकावच्छिन्नकाले वातवेग प्रजायते ।
तथैव नालस्तम्भाच्च लिङ्गानां षट्शतं क्रमात् ॥ ३७० ॥
वायुवेगस्स्वभावेन जायते नात्र संशयः ।
पश्चात् विमान के गमन में—चलने में धूम आदि का वेगप्रमाण यथाक्रम गणितशास्त्र से
निश्चय करके व्योमयान के गमन में यहां वेग निरूपित किया जाता है—दिखाया जाता है । चुटकी
बजाने जितने काल में धूमोद्गम यन्त्र से स्वतः दो सहस्र एक सौ तेरह २११३ लिङ्क (डिग्री) प्रमाण
से धूमवेग हो जाता है, इसी प्रकार वातप्रसारणयन्त्र से भी २५०० लिङ्क (डिग्री) से चुटकी बजाने
जितने समय में वायु का वेग हो जाता है ऐसे ही नालस्तम्भ से भी ६०० लिङ्क (डिग्री) वायुवेग
निःसंशय स्वभाव से हो जाता है ॥ ३६६-३७०॥
एवंप्रकारतो पीठस्थाद्योन्यन्त्रैः पृथक् पृथक् ॥ ३७१ ॥
वातो ( ?रे ) ष्ण्यधूमवेगाश्च उत्पद्यन्ते क्षणान्तरात् ।
एवमेव व्योमयानस्योर्ध्वभागेपि च क्रमात् ॥ ३७२ ॥
चातुर्मुखौष्ण्यकयन्त्राच्चोष्ण्यवेगस्स्वभावतः ।
चतुश्शतोत्तरत्रिसहस्रलिङ्गप्रमाणत ॥ ३७३ ॥
छोटिकावच्छिन्नकाले जायते नात्र संशयः ।
चातुर्मुखौष्ण्यवेगाच्च वातधूमोष्ण्यकैस्तथा ॥ ३७४ ॥
२६० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
शुण्डालेश्च तथा कीलकादिभि प्रेरितं क्रमात् ।
घटिकावच्छिन्नकाले योजनानां चतुश्शतम् ॥ ३७५ ॥
विमान वेगतो याति नात्र कार्या विचारणा ।
एवं सुन्दरयानस्य आकाररचनाविधिः ॥ ३७६ ॥
आलोड्य पूर्वशास्त्राणि यथामति निरूपित (निरूपितम्?) ।
इसी रीति से पीठस्थ अधोयन्त्रों से पृथक् पृथक् वातौष्ण्य धूम के वेग क्षण में ही उत्पन्न
होते हैं । इसी प्रकार व्योमयान के ऊर्ध्वभाग में भी क्रम से चतुर्मुखी औष्ण्यकयन्त्र से औष्ण्यवेग
स्वभावतः ३४०० लिङ्क (डिग्री) प्रमाण से वेग चुटकी बजाने जितने समय में निःसंशय हो जाता
है । चातुर्मुखौष्ण्य वेग से वातधूमौष्ण्यकों और शुण्डालों से तथा कील आदि से प्रेरित विमान
घड़ीमात्र काल में चार सौ योजन (१६०० कोस एवं एक घण्टे में ४००० कोस) वेग से जाता है
इसमें विचार करने की बात नहीं । इस सुन्दरविमान के आकाररचना की विधि पूर्वशास्त्रों का आलोडन
करके यथामति निरूपित की है ॥३७१-३७६॥
हस्तलेख कापी संख्या २०—
अथ रुक्मविमाननिर्णयः — अथ रुक्मविमान का निर्णय कहते हैं—
रुक्मश्च ॥ अ० २ अधि० ४ सू० ६ १ ॥
एवमुक्त्वा सुन्दराख्यविमान शास्त्रत क्रमात् ।
इदानीं रुक्मविमानसस्प्रहात्सम्प्रचक्षते ॥१॥
इस प्रकार सुन्दरनामक विमान शास्त्र से क्रमशः कहकर अब रुक्मविमान संक्षेप से कहते हैं ।
विमानबोधकपद्द्वयमस्मिन्निरूपितम् ।
तत्रादिमपदाद् व्योमयाननाम निदर्शितम् ॥२॥
समुच्चयार्थावबोधो द्वितीयपदतस्मृत ।
एव सामान्यत प्रोक्तस्सूत्रार्थस्सङ्ग्रहेण तु ॥३॥
विमानबोधक दो पद यहां निरूपित किए हैं उनमें आदिमपद से व्योमयान—विमान का नाम
दिखलाया दूसरे पद से समुच्चयार्थ का बोध किया गया है, इस प्रकार सामान्यतः संक्षेप से सूत्रार्थ कहा
अब उसका विशेषार्थ शास्त्र से क्रमश' कहा जाता है ॥२—३॥
विमानो रुक्मवर्णात्वान्नाम्ना रुक्म इतीरित ॥४॥
राजलोहादेव रुक्मविमानमपि कारयेत् ।
पाकभेदाद् राजलोहे रुक्मवर्णविकारता ॥५॥
यथा भवेत् तथा कुर्याच्छास्त्रोक्तेनैव मार्गंत ।
अन्यथा निष्फल याति नात्र कार्या विचारणा ॥६॥
रुक्म (सुनेहरा) वर्ण होने से विमान रुक्म नाम का कहा है । राजलोहे से ही रुक्म विमान
अवश्य बनाना चाहिए, पाकभेद से राजलोह में रुक्मवर्णविकारता जैसे हो जावे वैसे शास्त्रोक्त मार्ग से
बनावे अन्यथा निष्फलता को प्राप्त हो जाता है इसमें विचारणा—शङ्का न करनी चाहिए ॥४—६॥
उक्तं हि यानबिन्दौ—कहा ही है यानबिन्दु ग्रन्थ में—
आदौ कृत्वा स्वर्णवर्णं राजलोहस्य शास्त्रतः ।
पश्चादाकाररचना कुर्याद् यानस्य च क्रमात् ॥७॥ इत्यादि
आदि में राजलोहे का शास्त्रविधि से स्वर्णवर्ण करके पश्चात् विमानयान की आकाररचना
क्रम से करे ॥७॥
२६२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र ]
वर्णस्वरूपमुक्तं वर्णसर्वस्वे—वर्णस्वरूप कहा है वर्णसर्वस्व में—
प्राणक्षारचतुष्टय च चणकमारण्यक' कोमलम्,
द्वात्रिंशच्छश कन्दसत्त्वममलमष्टादशाश तथा ।
विशच्छोदितनागमब्ध्युदितरेखामुख षोडश,
पञ्चान्माक्षिकषट्कद्दिश्यममल पञ्चानन विशति ॥८॥
पार पञ्चदशाष्टविशदमल क्षारत्रय ।
विशतिव्योम सप्तदशाष्ट हुसगरद पञ्चामृत षोडश ।
एतान् द्रावकयन्त्रकोशकुहरे सम्पूर्य पश्चाद् यथा-
शास्त्र द्रावकमाहरेद् द्विमुखरन्ध्राभ्यां यथापाकत ॥६॥
पश्चात् कुण्डमुखान्तरे सुविमले तद्राजलोह पुन ।
मूषाया परिपूर्य तत्र विधिवत् सस्थाप्य भस्त्रामुखात् ।
सञ्जाल्याष्टशतोष्णकध्यरयतस्सगृह्य पश्चात् सुधी ।
यन्त्रास्ये वरगर्भमध्यकुहरे संपूर्य सशोधयेत् ॥१०॥
एव कृत्वा राजलोह पश्चात् सग्राहयेद् यदि ।
शुद्धस्वर्णवदाभाति तल्लोह सुदृढ मृदु ॥११॥
एतेनैव प्रकर्तव्य विमानाकारमद्भुतम् ।
अत्यन्तसुन्दर सर्वहर्षद भवति ध्रुवम् ॥१२॥
प्राणक्षार—नवसादर या मूत्रक्षार* ४ भाग, कोमल आरण्यक चणक—कोमल गोखरु†
३२ भाग, अमल शशकन्दसत्त्व—लोहसत्त्व १८ भाग, शोधा हुआ नाग—सीसा २० भाग, अब्धि—
समुद्र में प्रकट हुआ रेखामुख—समुद्रफेन या शङ्ख ? १६ भाग, पश्चात् माक्षिक—सोनामाखीधातु
६ भाग, पञ्चानन ? (लोहा ?) २० भाग, पारा १५ भाग, विमल तीनों क्षार सज्जीखार यवक्षार सुहागा
समान सब २८ भाग, अभ्रक २० भाग, हंस—रूपाधातु ? १७ भाग, गरद—वत्सनाभ—वछनाग ८ भाग,
पञ्चामृत ?—दूध दही मधु शर्करा घृत ? १६ भाग, उनको द्रावक यन्त्रकोश के गुप्तस्थान में भरकर पश्चात्
यथाशास्त्र पाक हो जाने पर द्रावक को दो मुखरन्ध्रों—दो मुखछिद्रों से लेले । पश्चात् शुद्ध कुण्डमुख के
अन्दर उस राजलोहे को मूषा बोतल में भरकर विधिवत् स्थापित कर भस्त्रामुख से ८०० दर्जे की उष्णता
के वेग से सुबुद्धिमान् संगृहीत करके यन्त्र के मुख में आवृत करनेवाले गर्भमध्य छिद्रवाले में भरकर
शोधे इस प्रकार करके राजलोहे को लेले वह लोहा शुद्ध स्वर्ण जैसा लगता है मृदु दृढ हो जाता है
इसी राजलोहे से विमानाकार अद्भुत करना चाहिए यह अत्यन्त सुन्दर हर्षप्रद निश्चय होता है ॥८-१२॥
अथ पीठनिर्णयः—अथ पीठनिर्णय कहते हैं—
पीठ रुक्मविमानस्य कूर्माकार प्रकल्पयेत् ।
विजस्तिसहस्रायाम गात्रमेकवितस्तिकम् ॥१३॥
- नुसार नरसार—प्राण, प्राणनामक क्षार या प्राणो का क्षार मूत्र "लोहद्रावकस्तथा" (रसतरङ्गिणी) ।
† चणकद्रुम चणकसदृश पत्ते फल वाला ।
रुक्मविमान ] [ २६३
यथेष्टमथवा कुर्यात् सुदृढं सुमनोहरम् ।
पीठाधोभागदेशेष्टदिक्षु पश्चाद् यथाक्रमम् ॥१४॥
वितस्तिद्वादशायामकेन्द्रस्थानान् पृथक् पृथक् ।
गणितोक्तविधानेन कल्पयित्वा यथाविधि ॥१५॥
एकैककेन्द्रस्थानेथ चञ्चुपुटमुखान् दृढान् ।
कीलकान् स्थापयेत्सम्यग्दृढमावृत्तकीलकः ॥१६॥
पश्चादय.पिण्डचक्राण्यष्टकेन्द्रेषु युग्मतः ।
संयोजयेद् यथैकस्मिन् प्रभवेदेकसस्थितिः ॥१७॥
रुक्मविमान का पीठ कूर्माकार बनावे, सहस्र बालिश्त लम्बा चौड़ा १ बालिश्त मोटा अथवा
यथेष्ट सुदृढ मनोहर बनावे। पश्चात् पीठ के अधोभाग देश में आठों दिशाओं में यथाक्रम १२ बालिश्त
लम्बे केन्द्रस्थानों को पृथक् पृथक् गणितोक्त विधान से यथाविधि बनाकर एक एक केन्द्रस्थान में चञ्चु-
पुटमुखवाले कीलों को लगावे फिर घूमनेवाली या गोल कीलों से आठ केन्द्रों में दो दो करके लोहपिण्ड-
चक्रों को—स्थूलमोटे चक्रों को लगावे जिससे एक में एक की संस्थिति हो ॥ १३-१७ ॥
अयश्चक्रनिर्णयः —लोहचक्रों का निर्णय कहते हैं—
अयश्चक्रपिण्डलक्षणमुक्तं लल्लेन—लोहचक्रपिण्ड का लक्षण लल्ल ने कहा है—
वितस्तिद्वादशायाम कुङ्कुष्ठाष्टकभारकम् ।
वर्तुंलाकारत कुर्यात् पिष्टपेषणयन्त्रवत् ॥१८॥ इत्यादि ॥
१२ बालिश्त लम्बा चौड़ा ८ कंकुष्ठ ? भारवाला गोलाकार चक्की के पाट की भांति करे ॥१८॥
पश्चाच्चक्राणि विधिवच्चञ्चपुटमुखान्तरे ।
सम्यक् सन्धारयेद्भद्रमष्टदिक्षु पृथक् पृथक् ॥१९॥
एकैकअयस्कपिण्डमूलकेन्द्राद् यथाविधि ।
अविद्युत्कीलपर्यन्तं नालावरणत क्रमात् ॥२०॥
सन्धारयेच्छृङ्खलतन्त्रयस्सयंत्र कीलकै ।
पूर्वोक्तायस्कपिण्डस्थानपार्श्वे पृथक् पृथक् ॥२१॥
फिर चक्रों-अय पिण्डचक्रों को विधिवत् चञ्चुपुटमुख-चोंच आकार के सम्पुटरूप में आठों-
दिशाओं में पृथक् पृथक् संयुक्त करे । एक एक लोहचक्रपिण्ड के मूलकेन्द्र से यथाविधि विद्युत् की
कील तक क्रमश नालावरण से शृङ्खलातन्त्रयों-जंजीररूप तारों को कीलों से पूर्व कहे लोहचक्रपिण्डस्थान
के पार्श्व में पृथक् पृथक् सङ्गत करे ॥१९-२१॥
बटिणिकास्तम्भनिर्णय. —बटिणिका-बटन या घुण्डी के स्तम्भ का निर्णय—
वितस्त्येकायामयुक्तान् चतुर्वितस्तिरुन्नतान् ।
स्तम्भान् संस्थापयेत्तेषु कीलकान् तन्त्रवाहकान् ॥२२॥
सन्धारयेद् दृढ पश्चाच्छक्तिनालाविधिक्रमात् ।
अष्टाङ्गुलायामचक्राण्युभयोः पार्श्वयोः दृढम् ॥२३॥