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सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 315

२६२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र ]

वर्णस्वरूपमुक्तं वर्णसर्वस्वे—वर्णस्वरूप कहा है वर्णसर्वस्व में—
प्राणक्षारचतुष्टय च चणकमारण्यक' कोमलम्,
द्वात्रिंशच्छश कन्दसत्त्वममलमष्टादशाश तथा ।
विशच्छोदितनागमब्ध्युदितरेखामुख षोडश,
पञ्चान्माक्षिकषट्कद्दिश्यममल पञ्चानन विशति ॥८॥
पार पञ्चदशाष्टविशदमल क्षारत्रय ।
विशतिव्योम सप्तदशाष्ट हुसगरद पञ्चामृत षोडश ।
एतान् द्रावकयन्त्रकोशकुहरे सम्पूर्य पश्चाद् यथा-
शास्त्र द्रावकमाहरेद् द्विमुखरन्ध्राभ्यां यथापाकत ॥६॥
पश्चात् कुण्डमुखान्तरे सुविमले तद्राजलोह पुन ।
मूषाया परिपूर्य तत्र विधिवत् सस्थाप्य भस्त्रामुखात् ।
सञ्जाल्याष्टशतोष्णकध्यरयतस्सगृह्य पश्चात् सुधी ।
यन्त्रास्ये वरगर्भमध्यकुहरे संपूर्य सशोधयेत् ॥१०॥
एव कृत्वा राजलोह पश्चात् सग्राहयेद् यदि ।
शुद्धस्वर्णवदाभाति तल्लोह सुदृढ मृदु ॥११॥
एतेनैव प्रकर्तव्य विमानाकारमद्भुतम् ।
अत्यन्तसुन्दर सर्वहर्षद भवति ध्रुवम् ॥१२॥

प्राणक्षार—नवसादर या मूत्रक्षार* ४ भाग, कोमल आरण्यक चणक—कोमल गोखरु†
३२ भाग, अमल शशकन्दसत्त्व—लोहसत्त्व १८ भाग, शोधा हुआ नाग—सीसा २० भाग, अब्धि—
समुद्र में प्रकट हुआ रेखामुख—समुद्रफेन या शङ्ख ? १६ भाग, पश्चात् माक्षिक—सोनामाखीधातु
६ भाग, पञ्चानन ? (लोहा ?) २० भाग, पारा १५ भाग, विमल तीनों क्षार सज्जीखार यवक्षार सुहागा
समान सब २८ भाग, अभ्रक २० भाग, हंस—रूपाधातु ? १७ भाग, गरद—वत्सनाभ—वछनाग ८ भाग,
पञ्चामृत ?—दूध दही मधु शर्करा घृत ? १६ भाग, उनको द्रावक यन्त्रकोश के गुप्तस्थान में भरकर पश्चात्
यथाशास्त्र पाक हो जाने पर द्रावक को दो मुखरन्ध्रों—दो मुखछिद्रों से लेले । पश्चात् शुद्ध कुण्डमुख के
अन्दर उस राजलोहे को मूषा बोतल में भरकर विधिवत् स्थापित कर भस्त्रामुख से ८०० दर्जे की उष्णता
के वेग से सुबुद्धिमान् संगृहीत करके यन्त्र के मुख में आवृत करनेवाले गर्भमध्य छिद्रवाले में भरकर
शोधे इस प्रकार करके राजलोहे को लेले वह लोहा शुद्ध स्वर्ण जैसा लगता है मृदु दृढ हो जाता है
इसी राजलोहे से विमानाकार अद्भुत करना चाहिए यह अत्यन्त सुन्दर हर्षप्रद निश्चय होता है ॥८-१२॥

अथ पीठनिर्णयः—अथ पीठनिर्णय कहते हैं—
पीठ रुक्मविमानस्य कूर्माकार प्रकल्पयेत् ।
विजस्तिसहस्रायाम गात्रमेकवितस्तिकम् ॥१३॥

  • नुसार नरसार—प्राण, प्राणनामक क्षार या प्राणो का क्षार मूत्र "लोहद्रावकस्तथा" (रसतरङ्गिणी) ।
    † चणकद्रुम चणकसदृश पत्ते फल वाला ।