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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 302, कुल 368 में से

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सुन्दरविमान ] [ २७६
तावदेव गृहीत स्यात् प्रतियन्त्रमुखान्तरात् ।
तस्मात् पृथक् पृथग्यन्त्राणीति शास्त्रे वर्णितम् ॥२६४॥
विमानस्योर्ध्वगमनमेतेनापि भविष्यति ।
वायुत्पत्तिक्रम व्यष्ट्या मन्त्रै रेव निरूपितम् ॥२६५॥
विमान की चारों दिशाओं में वातोद्गमयन्त्र के सम्मुख भूमि की ओर एक एक पार्श्वभाग में
तीन यन्त्र लगावे, उनका आवरण भी उस उसके मान से करे । ३ बालिश्त लम्बा चौड़ा १२ बालिश्त
ऊंचे जैसे हो ऐसे १२ नाल स्तम्भों को बनावे पूर्वोक्त यन्त्रावरण के उपरि प्रदेश में पृथक् पृथक् ।
वेग से वात के ऊपर फेंकने के लिये स्तम्भों को दृढ संस्थापित करे २६०० अश्वगति के मान से । एक
एक स्तम्भ से वायु वेग से ऊपर जाता है कालानुसार जितना वायु अपेक्षित होना चाहिए उतना ही
प्रत्येक यन्त्रमुख में से लिया जावे । अतः पृथक् पृथक् यन्त्र है यह शास्त्र में वर्णित है । विमान की
ऊर्ध्वगमन—ऊपर जाना इससे भी हो जायगा, वायु की उत्पत्ति का क्रम व्यष्टिरूप से यन्त्रोंद्वारा ऐसे
निरूपित किया है ॥२६४—२६५॥
समष्ट्या वातमाहर्तुं बृहत्स्तम्भ प्रचक्षते ।
चतुर्बितस्त्यायाम त्रिंशद्वितस्त्युन्नत तथा ॥२६६॥
वातोद्गमनालस्तम्भ कृत्वा पश्चात् यथाविधि ।
यन्त्राणा मध्यकेन्द्रेऽथ स्थापयेत्सुदृढ यथा ॥२६७॥
भस्त्रिकोन्मुखयन्त्राणि स्तम्भमूले नियोजयेत् ।
यन्त्राणा वातमाकृष्य स्तम्भे पूरयितु क्रमात् ॥२६८॥
यन्त्रादिस्तम्भमूलान्तं तत्तद्रेखानुसारत ।
वाताकर्षणनालानि समाहृत्य यथाविधि ॥२६६॥
स्तम्भमूलान्तरे सम्यक् सन्धार्याथ यथाक्रमम् ।
वातपूरककीलानि तत्तन्नालमुखान्तरे ॥२७०॥
समष्टिरूप से वायु को आहरण करने के लिये बृहत्स्तम्भ चक्र कहते हैं वह ४० बालिश्त लम्बा
चौड़ा ३० बालिश्त ऊंचा वातोद्गमनालस्तम्भ करके—बनाकर पश्चात् यथाविधि यन्त्रों के मध्यकेन्द्र में
सुदृढ़ स्थापित करे । यन्त्रों के वायु को आकर्षित कर—खींचकर स्तम्भ में भरने को क्रम से भस्त्रिको-
न्मुखयन्त्रों को स्तम्भ के मूल में लगावे यन्त्रों से लेकर स्तम्भमूल तक उस उसकी रेखा के अनुसार
वाताकर्षणनालों को यथाविधि लेकर स्तम्भमूल के अन्दर सम्यक् यथाक्रम जोडकर वातपूरक कीलों को
उस उस नालमुख के अन्दर—
संयोज्य विधिवत् पश्चान्नालस्तम्भमुखान्तरे ।
अष्टाङ्गुलायाममुखविलं कृत्वा यथाविधि ॥२७१॥
तस्योपरि यथाशास्त्रं वितस्त्यैकोन्नत तथा ।
वितस्तित्रयमायाम मुख्ययन्त्र नियोजयेत् ॥२७२॥