बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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यथेष्टमथवा कुर्यात् सुदृढं सुमनोहरम् ।
पीठाधोभागदेशेष्टदिक्षु पश्चाद् यथाक्रमम् ॥१४॥
वितस्तिद्वादशायामकेन्द्रस्थानान् पृथक् पृथक् ।
गणितोक्तविधानेन कल्पयित्वा यथाविधि ॥१५॥
एकैककेन्द्रस्थानेथ चञ्चुपुटमुखान् दृढान् ।
कीलकान् स्थापयेत्सम्यग्दृढमावृत्तकीलकः ॥१६॥
पश्चादय.पिण्डचक्राण्यष्टकेन्द्रेषु युग्मतः ।
संयोजयेद् यथैकस्मिन् प्रभवेदेकसस्थितिः ॥१७॥
रुक्मविमान का पीठ कूर्माकार बनावे, सहस्र बालिश्त लम्बा चौड़ा १ बालिश्त मोटा अथवा
यथेष्ट सुदृढ मनोहर बनावे। पश्चात् पीठ के अधोभाग देश में आठों दिशाओं में यथाक्रम १२ बालिश्त
लम्बे केन्द्रस्थानों को पृथक् पृथक् गणितोक्त विधान से यथाविधि बनाकर एक एक केन्द्रस्थान में चञ्चु-
पुटमुखवाले कीलों को लगावे फिर घूमनेवाली या गोल कीलों से आठ केन्द्रों में दो दो करके लोहपिण्ड-
चक्रों को—स्थूलमोटे चक्रों को लगावे जिससे एक में एक की संस्थिति हो ॥ १३-१७ ॥
अयश्चक्रनिर्णयः —लोहचक्रों का निर्णय कहते हैं—
अयश्चक्रपिण्डलक्षणमुक्तं लल्लेन—लोहचक्रपिण्ड का लक्षण लल्ल ने कहा है—
वितस्तिद्वादशायाम कुङ्कुष्ठाष्टकभारकम् ।
वर्तुंलाकारत कुर्यात् पिष्टपेषणयन्त्रवत् ॥१८॥ इत्यादि ॥
१२ बालिश्त लम्बा चौड़ा ८ कंकुष्ठ ? भारवाला गोलाकार चक्की के पाट की भांति करे ॥१८॥
पश्चाच्चक्राणि विधिवच्चञ्चपुटमुखान्तरे ।
सम्यक् सन्धारयेद्भद्रमष्टदिक्षु पृथक् पृथक् ॥१९॥
एकैकअयस्कपिण्डमूलकेन्द्राद् यथाविधि ।
अविद्युत्कीलपर्यन्तं नालावरणत क्रमात् ॥२०॥
सन्धारयेच्छृङ्खलतन्त्रयस्सयंत्र कीलकै ।
पूर्वोक्तायस्कपिण्डस्थानपार्श्वे पृथक् पृथक् ॥२१॥
फिर चक्रों-अय पिण्डचक्रों को विधिवत् चञ्चुपुटमुख-चोंच आकार के सम्पुटरूप में आठों-
दिशाओं में पृथक् पृथक् संयुक्त करे । एक एक लोहचक्रपिण्ड के मूलकेन्द्र से यथाविधि विद्युत् की
कील तक क्रमश नालावरण से शृङ्खलातन्त्रयों-जंजीररूप तारों को कीलों से पूर्व कहे लोहचक्रपिण्डस्थान
के पार्श्व में पृथक् पृथक् सङ्गत करे ॥१९-२१॥
बटिणिकास्तम्भनिर्णय. —बटिणिका-बटन या घुण्डी के स्तम्भ का निर्णय—
वितस्त्येकायामयुक्तान् चतुर्वितस्तिरुन्नतान् ।
स्तम्भान् संस्थापयेत्तेषु कीलकान् तन्त्रवाहकान् ॥२२॥
सन्धारयेद् दृढ पश्चाच्छक्तिनालाविधिक्रमात् ।
अष्टाङ्गुलायामचक्राण्युभयोः पार्श्वयोः दृढम् ॥२३॥