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सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 310, कुल 368 में से

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पृष्ठ 310

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सुन्दरविमान ] [ २८७
सकीलकानी विविधन्मुखरन्ध्राणि पञ्चधा ॥३४३॥
रवप्रसारणे कृत्वा स्थापयेत् कीलकानि हि ।
एकैककीलभ्रमणादेकैकमुखरन्ध्रक ॥३४४॥
एकैकसाङ्केतरवो वेगान्निस्सरति क्रमात् ।
साङ्केतकस्वररवश्रवणादेव तत्क्षणात् ॥३४५॥
—चुटकी बजाने जितने समय में वैसा स्थित बाहिर निकल जाता है, शब्दप्रसारण कील को भी
नियुक्त करवे, इसी प्रकार विमान के चलाने रोकने में भी कील लगावे । वेग अतिवेग और उनके कम
करने को भी यह संकेत करनेवाली हो । स्तम्भन आदि पांच संकेतों को प्रदर्शित करने के लिये कीलों-
सहित पांच प्रकार के मुखछिद्र शब्द प्रसारणयन्त्र में करके कीलें स्थापित करे, एक एक कील के भ्रमण
से एक एक मुख छिद्र एक एक संकेतवाले स्वर शब्द श्रवण से तत्क्षण—॥३४१-३४५॥
पूर्वोक्तपञ्चसङ्के तान् स्तम्भनालाद् यान् यथाक्रमम् ।
विजायन्ते विशेषेण रवभेदात् पृथक् पृथक् ॥३४६॥
एतद्यन्त्रस्य विधिवत्पार्श्वयोरुभयो क्रमात् ।
षडङ्गुलायामयुतमुन्नते तु यथाविधि ॥३४७॥
षड्विंशतिवितस्तीना प्रमाणेन विनिर्मितौ ।
आघातनालो सुदृढौ पश्चात् सन्धारयेत् ततः ॥३४८॥
पञ्चाङ्गुलायामलोहदण्डो नालद्वयान्तरे ।
मन्धारयेद् यथाशास्त्र नालमानानुसारत ॥३४६॥
आदिमध्यावसानेषु नालयोरुभयो क्रमात् ।
परिभ्रमणचक्रकीलकान्यथ यथाक्रमात् ॥३५०॥
पूर्वोक्त पांच जिन संकेत स्तम्भनाल से यथाक्रम विशेषरूप से शब्दभेद पृथक् पृथक् जाने
जाते हैं, इस यन्त्र के दोनों पाश्र्वों में क्रम से ६ अङ्गल लम्बाई से युक्त ऊंचाई यथाविधि २६ बालिश्त
प्रमाण से बनाये दो आघातनाल सुदृढ पश्चात् लगावे, पांच अङ्गुल लम्बे दा लोहदण्ड दोनों नालों के
नालमापानुसार अन्दर लगावे । आदि में मध्य में और अन्त में दोनों नालों की भ्रमण चक्रकीलें भी ॥
३४६-३५०॥
सन्धारयेद् दृढं तेषा परिभ्रमणत क्रमात् ।
नालद्वयान्तरे सम्यग्दण्डाघातो भविष्यति ॥३५१॥
एतेनापि व्योमयानगमन वेगतो भवेत् ।
सकीलबातभस्त्रिकाश्च बाताहताय हि ॥३५२॥
पूर्वोक्तनालमुखयोस्सम्यक् सन्धारयेद् दृढम् ।
तेन नालान्तरे बाताघातश्चाप्यतिवेगत ॥३५३॥
‡ "सुपां सुपो भवन्तीति जस् स्थाने शस्" विभक्तिव्यत्यय प्रथमा स्थाने द्वितीया ।