बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहस्तलेख कापी संख्या २०—
अथ रुक्मविमाननिर्णयः — अथ रुक्मविमान का निर्णय कहते हैं—
रुक्मश्च ॥ अ० २ अधि० ४ सू० ६ १ ॥
एवमुक्त्वा सुन्दराख्यविमान शास्त्रत क्रमात् ।
इदानीं रुक्मविमानसस्प्रहात्सम्प्रचक्षते ॥१॥
इस प्रकार सुन्दरनामक विमान शास्त्र से क्रमशः कहकर अब रुक्मविमान संक्षेप से कहते हैं ।
विमानबोधकपद्द्वयमस्मिन्निरूपितम् ।
तत्रादिमपदाद् व्योमयाननाम निदर्शितम् ॥२॥
समुच्चयार्थावबोधो द्वितीयपदतस्मृत ।
एव सामान्यत प्रोक्तस्सूत्रार्थस्सङ्ग्रहेण तु ॥३॥
विमानबोधक दो पद यहां निरूपित किए हैं उनमें आदिमपद से व्योमयान—विमान का नाम
दिखलाया दूसरे पद से समुच्चयार्थ का बोध किया गया है, इस प्रकार सामान्यतः संक्षेप से सूत्रार्थ कहा
अब उसका विशेषार्थ शास्त्र से क्रमश' कहा जाता है ॥२—३॥
विमानो रुक्मवर्णात्वान्नाम्ना रुक्म इतीरित ॥४॥
राजलोहादेव रुक्मविमानमपि कारयेत् ।
पाकभेदाद् राजलोहे रुक्मवर्णविकारता ॥५॥
यथा भवेत् तथा कुर्याच्छास्त्रोक्तेनैव मार्गंत ।
अन्यथा निष्फल याति नात्र कार्या विचारणा ॥६॥
रुक्म (सुनेहरा) वर्ण होने से विमान रुक्म नाम का कहा है । राजलोहे से ही रुक्म विमान
अवश्य बनाना चाहिए, पाकभेद से राजलोह में रुक्मवर्णविकारता जैसे हो जावे वैसे शास्त्रोक्त मार्ग से
बनावे अन्यथा निष्फलता को प्राप्त हो जाता है इसमें विचारणा—शङ्का न करनी चाहिए ॥४—६॥
उक्तं हि यानबिन्दौ—कहा ही है यानबिन्दु ग्रन्थ में—
आदौ कृत्वा स्वर्णवर्णं राजलोहस्य शास्त्रतः ।
पश्चादाकाररचना कुर्याद् यानस्य च क्रमात् ॥७॥ इत्यादि
आदि में राजलोहे का शास्त्रविधि से स्वर्णवर्ण करके पश्चात् विमानयान की आकाररचना
क्रम से करे ॥७॥