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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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२६० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
शुण्डालेश्च तथा कीलकादिभि प्रेरितं क्रमात् ।
घटिकावच्छिन्नकाले योजनानां चतुश्शतम् ॥ ३७५ ॥
विमान वेगतो याति नात्र कार्या विचारणा ।
एवं सुन्दरयानस्य आकाररचनाविधिः ॥ ३७६ ॥
आलोड्य पूर्वशास्त्राणि यथामति निरूपित (निरूपितम्?) ।
इसी रीति से पीठस्थ अधोयन्त्रों से पृथक् पृथक् वातौष्ण्य धूम के वेग क्षण में ही उत्पन्न
होते हैं । इसी प्रकार व्योमयान के ऊर्ध्वभाग में भी क्रम से चतुर्मुखी औष्ण्यकयन्त्र से औष्ण्यवेग
स्वभावतः ३४०० लिङ्क (डिग्री) प्रमाण से वेग चुटकी बजाने जितने समय में निःसंशय हो जाता
है । चातुर्मुखौष्ण्य वेग से वातधूमौष्ण्यकों और शुण्डालों से तथा कील आदि से प्रेरित विमान
घड़ीमात्र काल में चार सौ योजन (१६०० कोस एवं एक घण्टे में ४००० कोस) वेग से जाता है
इसमें विचार करने की बात नहीं । इस सुन्दरविमान के आकाररचना की विधि पूर्वशास्त्रों का आलोडन
करके यथामति निरूपित की है ॥३७१-३७६॥