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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 305, कुल 368 में से

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पृष्ठ 305

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Let's see: रवप्रसारणकीलनाल (च?) तथैव हि ॥ २६६ ॥ or रवप्रसारणकीलनाल.(च?)तथैव हि ॥ २६६ ॥.
Wait, in L16, there is no space, it's कीलनाल.(च?)तथैव. A dot might just be a period or broken type. But कीलनाल.(च?)तथैव or कीलनाल (च?) तथैव? Putting (च?) is clear. Let's look at whether there's a space or dot:
रवप्रसारणकीलनाल.(च?)तथैव हि ॥ २६६ ॥

Let's check line breaks and markers:
२८२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
सोम, कञ्चुक, शुण्डाल लोहों को यथाविधि शुद्ध करके क्रम से ३०, ४५, २० अंशों में ले
पद्ममूषा यन्त्र में छत्रमुखनामककुण्ड में रखकर वासुकी-सर्परूप लम्बी भस्त्रिका से ७१६ दर्जे की
उष्णता से नेत्रपर्यन्त गलाकर धीरे से यन्त्र में भर दे ऐसा करने पर नीले रंग का भाररहित अति सूक्ष्म
दो सहस्र दर्जे की उष्णता वेग सहने तक सुन्दर चमक वाला शतघ्नि सहस्रघ्नी तोपों से अच्छेद्य
शीतल हो आ