बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
पृष्ठ 309, कुल 368 में से
संदर्भ में पढ़ें२८६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
ततो यन्त्रपुरोभागे मध्ये चोर्ध्वप्यध क्रमात् ।
पार्श्वयोरुभयोश्चैव यथाकालानुसारतः ॥ ३३३ ॥
सर्वत्र धूमोद्गम च स्तम्भन च यथा भवेत् ।
पद्मचक्राकारकीलान् तत्तत्स्थानेषु शास्त्रतः ।। ३३४।।
द्वौ द्वौ सन्धारयेत्सम्यक् पश्चात् तत्पृष्ठभागत ।
काष्ठप्रक्षेपणार्याय इङ्गालान् वा यथोचितम् ।। ३३५।।
घुमानेवाली कीलों को क्रम से सुदृढ युक्त करे फिर धूमपूरक कुण्ड के सामनेवाले भाग में
८ अङ्गुल मापवाली वातायनशलाकाएं एक एक को एक एक अङ्गुल प्रदेश में दृढ स्थापित करे फिर यन्त्र
के सामनेवाले भाग में मध्य भाग में और ऊर्ध्व भाग में नीचे भाग में भी क्रम से स्थापित करे तथा दोनों
पार्श्वों में समयानुसार करे । सर्वत्र धूएं का निकलना और रोक देना जिससे बन जावे । पद्मचक्र के
आकारवाली कीलों को उन उन स्थानों में शास्त्र से दो दो कीलें लगावे फिर पृष्ठभाग में काष्ठ फेंकने
के लिये या अंगारों—कोयलों को यथोचित डालने के लिये—॥३३१-३३५॥
सार्धवितस्त्यायामेन विल कुर्याद् यथाविधि ।
कवाटोद्घाटनार्थाय बिलद्वारस्य शास्त्रत ॥३३६॥
यथा स्यात्सरल तद्वत्कीलकान् सन्नियोजयेत् ।
उष्णप्रमापक यन्त्र तथा वेगप्रमापकम् ।। ३३७।।
दक्षिणोत्तरयो पश्चात् तत्कीलस्य यथाक्रमम् ।
मनुष्यवत्प्रवचन कुर्वन्त सुस्फुट क्रमात् ।। ३३८।।
कालप्रमापक यन्त्र तथा तस्योर्ध्वभागके ।
सस्थापयेद् दृढ पश्चाद् दक्षभागे तथैव हि ।। ३३६।।
द्वादशोत्तरद्विशतयुतसहस्रसख्यका ।
यथा शब्दरवतरङ्गोत्पत्तिर्वेगत् क्रमात् ।। ३४०।।
—डेढ बालिश्त लम्बा चौडा छिद्र यथाविधि करे, बिलद्वार के किवाडों को खोलने के अर्थ
शास्त्रानुसार जैसे सरलता हो वैसी कीलें—पेंच लगावें । उष्णता का मापनेवाला वेग का मापनेवाला यन्त्र
दक्षिण और उत्तर में लगावे, मनुष्य की भाँति सुस्फुट बोलते हुए यन्त्र, कालमापक यन्त्र को उसके ऊपर
भागमें लगावे पश्चात् दक्षिण भाग में १२१२ संख्या में शब्द की गूंज तरङ्ग की उत्पत्ति वेग से हो
जावे ॥ ३३६-३४० ॥
छोटिकावच्छिन्नकाले बहिर्याति तथास्थितम् ।
रवप्रसारण नाम कीलनाल नियोजयेत् ।।३४१।।
विमानस्य प्रसरणे स्तम्भने च तथैव हि ।
वेगातिवेगापायेषु एतत्साङ्केतकद्भवेत् ।।३४२।।
स्तम्भनादीन् पञ्चसङ्केतान् निदर्शयितुं पुनः ।