बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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षड्वितस्त्यायामकं च गात्रमेकवितस्तिकम् ।
चतुरश्रं वर्तुलं वा पीठं कुर्याद् यथाविधि ॥ २३२ ॥
त्रिचक्रनालस्तम्भसंस्थापनार्थं यथाविधि ।
कुर्यात्केन्द्रद्वयं पीठे दक्षिणोत्तरयोः क्रमात् ॥ २३३ ॥
६ बालिश्त लम्बा १ बालिश्त मोटा चौकोर या गोल पीठ यथाविधि बनाना चाहिए त्रिचक्र-
नालस्तम्भ के संस्थापनार्थ दो केन्द्र पीठ में दक्षिण उत्तर में क्रम से करे ॥ २३२-२३३ ॥
त्रिचक्रनालस्तम्भयुक्तं यानबिन्दौ-त्रिचक्रनालस्तम्भ यानबिन्दु में कहा है-
वितस्तित्रयमायामो वितस्त्यष्टकमुन्नतौ ।
नालस्तम्भो कल्पयित्वा केन्द्रयोरुभयोः क्रमात् ॥ २३४ ॥
संस्थापयेत् ततो नालस्तम्भयो मूलत क्रमात् ।
कल्पयेदावृत्तकीलरन्ध्राणि त्रीण्यथाविधि ॥ २३५ ॥
तेषु सन्धारयेत् पश्चात् क्रमात् तत्कीलकान् दृढम् ।
३ बालिश्त लम्बे-चौड़े ८ बालिश्त ऊँचे दो नालस्तम्भ बनाकर (पीठ के) दोनों केन्द्रोंमें संस्थापित
करके लगादे फिर दोनों नालस्तम्भों के मूल से क्रमशः तीन घूमनेवाली या गोल कीलों के छिद्र उन छिद्रों
में उन कीलों को जोड दे (फिट् कर दे) ॥ २३४-२३५ ॥
तदुक्तं यानबिन्दौ-वह यह यानबिन्दु में कहा है-
वितस्त्यैकायामयुक्तं वितस्तिद्वयमुन्नतम् ॥ २३६ ॥
सीत्कारीनालवत्कृत्वा योजयेत् स्तम्भरन्ध्रके ।
चक्राणि कारयेत् त्रीणि वितस्त्यायामतस्ततः ॥२३७॥
दन्तैः क्रकचवत् सम्यग्युक्तानि सुदृढान्यथा ।
अनुलोमविलोमाभ्यामूर्ध्वाधोगमनं यथा ॥ २३८ ॥
तथा नालान्तरे सम्यग्योजयेत् कीलकैस्सह ।
वातपूरकनालं तु चक्रमध्ये निवेशयेत् ॥ २३६ ॥
कीलचङ्क्रमणाच्चक्रभ्रमणं भवति स्वतः ।
वातपूरकनालस्य तेन सञ्चालनं भवेत् ॥ २४० ॥
१ बालिश्त लम्बा चौड़ा २ बालिश्त उठा हुआ-ऊँचा सीत्कारीनाल-वायु को खींचती हुई सीत्
करनेवाली नाल जैसी बनाकर स्तम्भ के छिद्र में लगावे, तीन चक्र १ बालिश्त लम्बे सुदृढ बनावे दान्तों
से युक्त आरे की भांति, जिससे अनुलोम विलोम से ऊपर नीचे गमन हो। नालों के अन्दर भली प्रकार
कीलों से युक्त करदे और वातपूरक नाल को चक्रों के मध्य में लगादे कीलों के घूमने से चक्रों का घूमना
स्वतः होगा इससे वातपूरक नाल का चलना होगा ।
ऊर्ध्वाधोगमनान्नालो वेगाद् वायुं प्रकर्षति ।
स्तम्भद्वयस्य मूलाग्रात् पूर्वपश्चिमपार्श्वयोः ॥२४१॥