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सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 303

२४० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
एतत्पात्राद् बहिर्याति वातस्तम्भान्तरे स्थित. ।
वायुवेगाद् विशेषेण तरङ्गाकारवत् स्वत ॥२७३॥
पश्चाद् धूमोद्गमयन्त्रस्थितधूमप्रसारणम् ।
वातप्रसारण यन्त्र स्तत्तदेव यथाविधि ॥२७४॥
तद्यन्त्रस्थितवातस्य क्रमाद् धूमोद्गमे यथा ।
भवेत् प्रवेशस्सरलात् तथा शास्त्रविधानत. ॥२७५॥
विधिवत् युक्त करके फिर नालस्तम्भमुख के अन्दर ८ अंगुल बडा मुख छिद्र उसके ऊपर
यथाशास्त्र १ बालिश्त ऊंचा ३ बालिश्त लम्बा चौड़ा मुखपात्र—ढक्कन लगावे बातस्तम्भ के अन्दर
स्थित वायु इस पात्र से वेग से तरङ्गाकार की भांति स्वत. बाहिर जाता है । पश्चात् धूमोद्गमयन्त्रस्थित
धूम का प्रसारण यन्त्रों से उसी भांति होता है, उस यन्त्र में स्थित वात का धूमोद्गम में जैसे
सरलता से प्रवेश हो उस प्रकार शास्त्रविधान से—
त्रिचक्रनालकोलांश्च सन्धार्याय यथाक्रमम् ।
तत्कीलकंर्यथाकाम धूम वा वायुमेव वा ॥२७६॥
समाकृष्याय विधिवत् तत्तत्कालानुसारत ।
उपयोक्तु भवेत् सम्यग्यथेष्ट सप्रमाणत. ॥२७७॥
एतद्यन्त्रस्य विधिवच्चतुर्दिक्षु यथाक्रमम् ।
वातनिरसनपङ्गुचक्राणि स्थापयेदथ ॥ २७८ ॥
एतच्चक्राणि वेगेन भ्रामयेद् यदि कीलकै. ।
वायु निराकृत्य पश्चाद् व्योमयान. प्रधावति ॥ २७६ ॥
तेन सर्वत्र वेगेन निरातङ्क यथा तथा ।
तीन चक्रों की नालकोलों को यथाक्रम लगाकर उन कीलों से यथेच्छ धूएं को या वायु को
खींचकर विधिवत् कालानुसार यथेष्ट मात्रा में भलीभांति उपभोग कर सके । इस यन्त्र की चारों दिशाओं
में यथाक्रम बातनिरसनपङ्गु—वायु निकलने के चपटे असंख्यक्त चक्रों या पेंचचक्रों को स्थापित करे,
इन चक्रों को यदि कीलों से वेग से घुमावे तो व्योमयान वायु को निकाल कर उस वेग से निरातङ्क
निर्भय सर्वत्र दौडता है ॥ १७६-१७६ ॥
अथ विमानावरणनिर्णयः—अब विमान के आवरण का निर्णय करते हैं—
आवृत्य धूमोद्गमयन्त्राणि कुड्यान्यथाविधि ॥ २८० ॥
विमानावरणं कर्तुं कुर्याच्छकुनवक्रमात् ।
सुन्दराख्यविमानस्यावरणं च यथाविधि ॥ २८१ ॥
राजलोहेनैव कुर्यादन्यथा निष्फलं भवेत् ।
पश्चादावरण यावद्गृहसंख्या विधीयते ॥ २८२ ॥
तावत्संख्यानुसारेण विभज्याथ यथाक्रमम् ।