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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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सुन्दरविमान ] [ २७७
वातपूरकचक्रकीलकान्येवं नियोजयेत् ।
वाताकर्षणभस्त्रिकामुख्ययन्त्रान्यत् परम् ॥२४२॥
वातपूरकचक्रकीलकेभ्यस्सन्धारयेत् क्रमात् ।
ऊपर नीचे नाल के चलने से नालवेग से वायु को खींचता है, दोनों स्तम्भों मूलाम से पूर्व
और पश्चिम में वातपूरक चक्र की कीलों को इस प्रकार करे, इससे आगे वाताकर्षण भस्त्रिकामुख्ययन्त्रों
को वातपूरक चक्र की कीलों से जोडदे ॥२४१-२४२॥
भस्त्रिकामुख्ययन्त्रमुक्तं बुडिलेन—भस्त्रिकामुख्ययन्त्र कहा है बुडिल आचार्य ने—
चक्रकण्ठमृगचर्म समाहृत्य यथाविधि ॥२४३॥
संशोध्य पुत्रजीविकातैलेनाथ यथाक्रमम् ।
पाचयेत् त्रिदिन पश्चात् क्षालयेच्छुद्धवारिणा ॥२४४॥
गजदन्तिकतैलेन लेपयित्वा मुहुर्मुहुः ।
आतपे स्थापयेत् पञ्चवासराणि तत परम् ॥२४५॥
षड्वितस्तिप्रमाणेण पश्चाद् यन्त्र प्रकल्पयेत् ।
यन्त्रमूलस्य विस्तारो वितस्तित्रयमुच्यते ॥२४६॥
तन्मध्यदेशविस्तारो वितस्तीना चतुर्भवेत् ।
तमन्त्ये देशविस्तारो वितस्त्यैकमितीरितम् ॥२४७॥
भस्त्रिकामुखदेशेथ सङ्कोचनविकासकम् ।
अनुलोमविलोमाभ्या स्थापयेत् कीलकद्वयम् ॥२४८॥
कीलकद्वयभ्रामण्याद् यातायात यथा भवेत् ।
संस्थापयेदेकदण्डमेतन्मध्ये तथा क्रमात् ॥२४६॥
वेगात्सञ्चालन तद्वत्स्तम्भन च तथैव हि ।
यथाभवेत् तथा कर्तुं स्थापयेत् कीलकद्वयम् ॥२५०॥
चक्रकण्ठमृग--चक्रदंष्ट्रमृग--वराह--सुवर ? का चर्म लेकर यथाविधि पुत्रजीवक-
जीयापोता के तैल से यथाक्रम तीन दिन तक पकावे फिर शुद्ध जल से प्रक्षालित कर-
गजदन्तिका ओषधि के तैल का पुन पुन लेप करके पांच दिन तक धूप में रखे फिर ६ बालिश्त यन्त्र
बनावे यन्त्र के मूल का विस्तार ३ बालिश्त उसके मध्यदेश का विस्तार ४ बालिश्त अन्तवाले देश का
विस्तार १ बालिश्त कहा है । भस्त्रिका के मुखदेश में सङ्कोच विकास के साधन दो कीलों अनुलोमविलोम
रीति से स्थापित करे, दोनों कीलों के घुमाने से जिस प्रकार यातायात हो सके इस प्रकार उनके मध्य
में एक दण्ड लगावे फिर वेग से चालन और स्तम्भन हो सके ऐसा करने को दो कीलें स्थापित करे ॥
२४३-२५०॥
कीलकभ्रमणाद् यातायातदण्डप्रचालनम् ।
भवेत्तद्वेगस्सम्यग्भस्त्रिकामुखचालनम् ॥२५१॥