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सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 311

२८८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
भवेत् तेन व्योमयानवेग स्याद् द्विगुणं क्रमात् ।
पश्चादौष्ण्यधूमकोशचतुष्पार्श्वेष्वपि क्रमात् ।।३५४।।
यथा वातोद्गमयन्त्रे शुण्डालासम्प्रतिष्ठिता.।
तथैवावृत्त चक्रकीलकं संसंस्थापयेद् दृढम् ।।३५५।।
—लगादे, उनके परिभ्रमण—घूमने से दो नालों के अन्दर वाले दण्ड को आघात होगा इससे
भी व्योमयान वेग से चलता है । कीलसहित वायु की भस्त्रिकाएं वात को धकेलने के लिये पूर्वोक्त
दो नालमुखों में सम्यक् लगावे इससे नालके अन्दर बातका आघात अतिवेग से होगा, इससे भी व्योम-
यान का वेग द्विगुण हो जावे पश्चात् औष्ण्य धूमकोश चारों पाश्र्वों में भी क्रम से जैसे वातोद्गमयन्त्र में
शुण्डाल रखे हैं वैसे ही घूमनेवालो चक्रकीलों से दृढ स्थापित करे ॥३५१-३५५॥
औष्ण्यधूम पूरयित्वा शुण्डालेषु यथाविधि ।
कीलकभ्रमणाद् यस्मिन् कस्मिन् वा दिश्यथाक्रमम् ।।३५६।।
शुण्डालसाङ्केतवशात् सरल गमन यथा ।
भवेद् वेगेन यानस्य ततोर्ध्वमुखत ॐ क्रमात् ।।३५७।।
स्तम्भने गमने चैव अनुकूल यथा भवेत् ।
सन्धारयेद् भ्रामकचक्रकीलकान् यथाविधि ।।३५८।।
शुण्डालस्य तिरोभावप्रकाशौ च यथा भवेत् ।
कीलकानि तथा तत्र सम्यक् सन्धारयेत् तत ।।३५६।।
तृतीयवर्गाताम्रस्य नालद्वय सुशोधितम् ।
यन्त्रस्याग्निजलधूमकोशादारभ्य शास्त्रत ।।३६०।।
औष्ण्य धूम—गरम धूम को शुण्डालों में यथाविधि भरकर कील भ्रमण से जिस किसी दिशा
में यथाक्रम शुण्डालसंकेत के वश से यान का सरल गमन वेगसे हो तब ऊर्ध्वमुख के क्रम से स्तम्भन में
और गमन में अनुकूल जिससे हो अतः भ्रामक चक्रकीलों को लगावे, शुण्डाल के तिरोभाव—सङ्कोच
और प्रकाश—फैलाव भी जिससे हो सके वैसे कीलें लगावे । तृतीय वर्ग के ताम्बे की दो नाल सुशोधित
यन्त्र के अग्नि जल धूमवाले कोश से आरम्भ करके शास्त्रानुसार—
अत्युष्णावेगोपसंहारार्थ सर्वत्र पाश्र्वयो. ।
संवेष्ट्य विधिवत् पश्चात् कीलकं सुदृढ यथा ।।३६१।।
सन्धारयेत् ततोत्युष्णवेग नालद्वय प्रसेत् ।
विमानस्य पुरोभागस्थितवायुविभञ्जने ।।३६२।।
वातविभाजनचक्रकीलकान्यपि शास्त्रत. ।
सस्थापयेद् यथाकाल वातसख्यानुसारतः ।।३६३।।
एव चातुर्मुखी( ो?) ष्म्यकयन्त्र कृत्वा यथाविधि ।
विमानमध्यप्रदेशे स्थापयेत् सुदृढं यथा ।। ३६४ ।।

• तत ऊर्ध्वमुखतः, अत्र 'ततः' शब्दस्य विसर्गलोपे पुनरेकादेशसन्धिकार्यः ।