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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 297, कुल 368 में से

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पृष्ठ 297

२७४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
समाहृत्यातिसरलात्काचकंकुरयोगतः ।
प्रादक्षण्ये क्रमाद् याने धूमोद्गमपुरो भुवि ॥२१४॥
स्थितभुज्युकलोहस्य नालान्तर्गततन्त्रिभिः ।
सन्धाय विधिवत् पश्चात् प्रतिधूमोद्गमान्तरे ॥२१५॥
पूर्वोक्त काचावरणनाली लोहनालके तारोंसे शक्तिपूरकपात्रसे शक्तिको यथाविधि लेकर पात्रस्थ द्रवपात्रों
में क्रम से भली भांति भरने को एक एक नाल में संशोधित चार तारें काचचक्रमूख से सम्यक् जोडकर
पूर्वोक्त पात्रों में अन्दर रखे कांचपात्रों में द्रावक में भरकर फिर उस पात्रमूल से दो तारे क्रम से शक्ति
को खीचने के लिये कीलों से बाहिर लगादे फिर उन दोनों कीलों से उन दोनों तारों को सरल लेकर
अतिसरल कांचकङ्कुरयोग से—कांच घुण्डीवाले योग से घूमाकर यान में धूम को निकालने वाले यन्त्र
के सामने भूमि में स्थित भुज्यु लोहे की नालों के अन्दरवाले तारों से विधिवत् जोडकर प्रत्येक धूम को
निकालने वाले यन्त्र के अन्दर—॥ २०६-२१५ ॥
स्थितविद्युद्घर्षकमणिकीलकेषु यथाक्रमम् ।
शक्तिं संयोजयेत् ताभ्यां सप्रमाणं यथोचितम् ॥२१६॥
एव धूमोद्गमनालस्तम्भस्थे च यथाविधि ।
उक्तविद्युद्घर्षकमणिकीलके स्तन्नियोजयेत् ॥२१७॥
एतेन सर्वत्र विद्युद्व्याप्तिस्स्याद् व्योमयानके ।
तस्माद् विद्युद्यन्त्रमेव कृत्वा शास्त्रानुसारतः ॥२१८॥
वामभागे विमानस्य स्थापयेत् सुदृढ यथा । इत्यादि
—स्थित हुए विद्युद्घर्षणमणि की कीलों में यथाक्रम शक्ति को उन दो तारों से यथोचित युक्त
करे, इस प्रकार धूमोद्गमनाल के स्तम्भ में भी यथाविधि उक्त विद्युद्घर्षकमणि की कीलों से संयुक्त करे
जोड दे । इससे व्योमयान में सर्वत्र विद्युत् की व्याप्ति होजावे, अतः शास्त्रानुसार ही विद्युद्यन्त्र करके
विमान के वामभाग में सुदृढ स्थापित करे ॥२१६-२१८॥
अथ वातप्रसारणयन्त्रनिर्णयः—अब वातप्रसारणयन्त्र का निर्णय है—
उक्तं हि क्रियासारे—कहा ही है क्रियासर ग्रन्थ या प्रकरण में—
विमानोत्क्षेपणार्याय खपथे शास्त्रत क्रमात् ।
वातप्रसारणं नाम यन्त्र शास्त्रेषु वर्णितम् ॥२१६॥
इत्युक्तत्वाद् यन्त्रमद्य सग्रहेण निरूप्यते ।
एतद्यन्त्र वातमित्रलोहादेव प्रकल्पयेत् ॥२२०॥
अन्यथा यदि कुर्वीत तत्क्षणात्नाशमेधते ॥२२१॥
आकाशमार्ग में विमान को ऊपर उठाने के लिये शास्त्रानुसार क्रम से वातप्रसारण नाम का
यन्त्र शास्त्रों में कहा है । ऐसा कहे जाने से अब यन्त्र संक्षेप में कहा जाता है, यह यन्त्र वातमित्र लोहे
से ही बनावे अन्यथा करेगा तो नाश को प्राप्त हो जावेगा ॥२१६—२२१॥