बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
पृष्ठ 298, कुल 368 में से
संदर्भ में पढ़ेंसुन्दरविमान ] [ २७५
वातमित्रलोहमुक्तं लोहतन्त्रे- वातमित्रलोह कहा है लोहतन्त्र में-
रसाञ्जनिकभागाशास्त्रयोदश तथैव हि ।
प्रभञ्जनस्य भोगास्तु सप्तविंशदितीरिता ॥२२२॥
पराङ्कुशस्य भागास्सप्तत्रिंशदिति कीर्तिताः ।
एतानि सर्पास्यमूषाया तत्तद्भागानुसारत ॥२२३॥
सम्पूर्य विधिवच्चक्रमूलकुण्डे यथाविधि ।
संस्थाप्य पश्चाद् वारणास्यभस्त्राद् वेगेन शास्त्रत ॥२२४॥
धमनेत् षोडशोत्तरद्विशतकक्ष्योष्णमानत ।
समीकरणयन्त्रेथ तद्रसं परिपूरयेत् ॥२२५॥
एव कृते वातमित्रलोह भवति नान्यथा ।
एतेनैव हि लोहेन कुर्याद् यन्त्राणि शास्त्रत ॥२२६॥
रसाञ्जनिक-रसोत १३ भाग तथा प्रभञ्जन ? के २७ भाग पराङ्कुश ? के ३७ भाग कहे ।
इनको सर्पास्यमूषा-कृत्रिमबोतल में उनके भागानुसार भरकर विधिवत् चक्रमूलकुण्ड में यथाविधि स्थापित
करके पश्चात् वारुणास्त्र हाथीमुख जैसी भस्त्रा-धौंकनी से २१६ दर्जे की उष्णता से धोंक समीकरण
यन्त्र में पिंघले द्रवको भरदे ऐसा करने पर वातमित्रलोह होजाता है अन्यथा नहीं यन्त्र ऐसे लोहे से
शास्त्रानुसार करे ॥२२२-२२६॥
आदौ पीठस्ततो नालस्तम्भयन्त्रस्तथैव च ।
वातपूरकचक्रकीलकानि तत परम् ॥२२७॥
वाताकर्षणभस्त्रिकामुखयन्त्रमतस्तथा ।
मुखसङ्कोचविकासनकीलकौ तदनन्तरम् ॥२२८॥
सकीलकयातायातनालश्चैव तथैव हि ।
यन्त्राणा कवच तद्वदातस्तम्भास्तथैव हि ॥२२६।
वातोद्गमाख्यनालश्च भस्त्रिकोन्मुखमेव च ।
तथैव वातपूरककीलकानि तत परम् ॥२३०॥
वातनिर्सनपङ्कूकीलकानीति द्वादश ।
एतानि यन्त्रस्याङ्गानीति यथाक्रमम् ॥२३१॥
प्रथम पीठ बनावे फिर नालस्तम्भयन्त्र उसके पश्चात् वातप्रपूरकचक्रकीलें पुन वाताकर्षण
भस्त्रिकामुखयन्त्र तथा उसके पीछे मुख के सङ्कोच विकास करने वाली दो कीलें फिर कीलोंसहित याता-
यात नाल, यन्त्रों का कवच, उसी प्रकार वातस्तम्भ भी, वातोद्गमाख्यनाल भस्त्रिकोन्मुख भी उसी प्रकार
वातपूरककीलें पुन' वातनिर्सनपङ्कू-अरापत्तचक्र की कीलें । ये यन्त्र के अङ्ग यथाक्रम वर्णित किए
हैं ॥ २२७-२३१ ॥
अथ पीठनिर्णयः-अब पीठ का निर्णय करते हैं-