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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

शब्दाकर्षणयन्त्र ] [ १६७
ध्वनि को आकर्षित करने वाले घण्टार लोहे † से बना हुआ अद्भुत तारों के गुच्छे से युक्त
शब्द को प्रकट करने के डन्मुख शलाकाओं वाले दृढ दोनों पिण्डों—गोलों के मध्य में द्रावक के ऊपर
यथाक्रम रखकर क्वणकदर्पण—शब्द करनेवाले के आवरण को क्रम से करके अङ्गुष्ठमात्र चक्र की तीन
ग्रन्थियों के मूल में लगावे वहां से आरम्भ करके शलाकापर्यन्त यथाविधि अत्यन्त सूक्ष्म कोमल तारों को
क्रम से जोड़ दे इन तारोंको सूक्ष्मछिद्रवाले नीचले बिल में को घुमाकर क्वणादर्शदर्पण से रची करण्ड
सन्दूकची या डलिया के ऊपर रखवे, द्रोणमुख वाला—हाण्डी मुखवाला पात्र उसी क्वणादर्श से किया
हुआ हो उस के ऊपर क्रम से—॥ ११६–१२० ॥
संस्थापयेत् ततस्तस्मिन् पूर्वपश्चिमयोस्तथा ।
दक्षिणोत्तरतश्चैव रुदन्तीरटिकामिधान् (दान् ?) ॥१२१॥
मयोजयेन्मणीन् शुद्धान् चत्वारि समरेखत ।
मणिमन्तरत कृत्वा सूक्ष्मनालान् यथाविधि ॥ १२२ ॥
दर्पणेन कृतान् शुद्धांश्चतुर्दिक्षु दृढ यथा ।
स्थापयेदथ तस्योर्ध्वप्रदेशे शब्दफेनकम् ॥ १२३ ॥
तस्योपरि यथाशास्त्रं कुर्यादावरणं तत ।
तस्मिन् सम्धारयेत् सूक्ष्मशङ्कून् सुशोधितान् दृढान् ॥१२४॥
पश्चात् क्वणादर्शकृतावरणं तत्प्रमाणत ।
तस्योपरि न्यसेदष्टसूक्ष्मछिद्रसमन्वितम् ॥ १२५ ॥
—उसमें संस्थापित करे, पूर्व पश्चिम में तथा दक्षिण उत्तर रुदन्तीरटिका नामक चार शुद्ध
मणियों को समरेखा से जोड़ दे, मणि को बीच में करके दर्पण से बना हुआ शुद्ध सूक्ष्म नालों को
यथाविधि चारों दिशाओं में स्थापित करे उसके ऊपरि प्रदेश में शब्दफेन—शब्द सस्कारशक्तियुक्त चक्र
रख दे, उस के ऊपर यथाशास्त्र आवरण करे पुन उस में शोधित सूक्ष्म शङ्कओं को लगावे, पश्चात्
क्वण आदर्श से किए आठ सूक्ष्मछिद्र युक्त आवरण उस प्रमाण से उसके ऊपर रखे ॥ १२१–१२५ ॥
एकैकछिद्रमार्गेणान्तश्शङ्कुमुखान्तरात् ।
सूक्ष्मतन्त्रीन् समाहृत्य न्यसेदावरणोपरि ॥ १२६ ॥
तन्मध्येऽङ्गुलमानेन छिद्र कृत्वा यथाविधि ।
सिंहास्यदण्डनाल च मध्ये संस्थापयेत् क्रमात् ॥ १२७ ॥
वातापकर्षक चक्र षोडशारं सुसूक्ष्मम् ।
न्यसेत् तस्य पुरोभागे तन्त्रीसवेष्टित यथा ॥ १२८ ॥
एव क्रमेणाष्टदिक्षु सूक्ष्मचक्राणि विन्यसेत् ।
पूर्वोक्तसिंहास्यमुखेष्टदिक्षु यथाक्रमम् ॥ १२६ ॥
प्रदक्षिणावर्तकीलचक्रान् संस्थापयेदथ ।
शुद्धवाजीमुखलोहकृतवर्तु लपट्टिकान् ॥ १३० ॥
† घण्टार लोहा पीछे कहा गया है कृत्रिम है।

१६८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
एक एक छिद्रमार्ग से भीतर शङ्कु के मुख के अन्दर से सूक्ष्म तारों को निकालकर आवरण
के ऊपर लगावे, उस के अन्दर अङ्गुल माप से छिद्र करके यथाविधि सिहास्यदण्डनाल को मध्य में
संस्थापित करदे । वाताकर्षण चक्र १६ अराओंवाला सुसूक्ष्म उसके सामने वाले भाग में तारों से लिपटा
हुआ लगावे, इस प्रकार क्रम से आठ दिशाओं में सूक्ष्म चक्र लगावे, पूर्वोक्त सिहास्य मुख में आठ
दिशाओं में घूमनेवाले कीलचक्रों को संस्थापित करे अनन्तर शुद्ध याज्ञी मुखलोहे से की हुई गोल
पट्टिकाओं को-॥ १२६-१३० ॥
सुदृढान् च(छ्र?)षकाकारान् सरल स्थापयेत् तत ।
पूर्वोक्तावरणाच्छिद्रमुखसंस्थितान् क्रमात् ॥ १३१ ॥
तन्त्रीन् सङ्गृह्य विधिवत् तेषु संयोजयेत् क्रमात् ।
तथैव वाताहरणचक्रस्थानाद् यथाविधि ॥ १३२ ॥
मरुन्धान्यन्तसुसूक्ष्मतन्त्रीनाहृत्य शक्ति ।
सिहास्यस्थाष्टचषकपट्टिकामूलसन्धिषु ॥ १३३ ॥
संयोज्य शब्दफेनस्थशङ्कूना मूलकेन्द्रत ।
द्रवपात्रस्थमणिमावृत्य तन्त्रीन् यथाक्रमम् ॥ १३४ ॥
समाहृत्याय विधिवद् बध्नीयात् सुदृढ यथा ।
वातसंयोजनाच्चक्रभ्रमण भवति स्वतः ॥ १३५ ॥
—सुदृढ ग्लासपात्र या लोटापात्र के आकारवालों को सरल स्थापित करे फिर पूर्वोक्त आवरण के
आठ छिद्रमुखों में स्थित तारों को लेकर विधिवत् उन में लगादे वैसे ही वात को खींचने वाले चक्रस्थान
से यथाविधि छिद्रसहित अत्यन्त सूक्ष्म तारों को शक्ति से लेकर—खींचकर सिंहास्य में स्थित आठ
चषकपात्र पट्टिकामूलसन्धियों में जोड़कर शब्दफेनचक्र में स्थित शङ्कुओं के मूलकेन्द्र से द्रवपात्रस्थित
मणि को आवृत कर तारों को यथाक्रम लेकर विधिवत् दृढ बान्ध दे जिससे वातसंयोजन से चक्रभ्रमण
स्वतः हो जाता है—हो जावे ॥ १३१-१३५ ॥

हस्तलेख कापी संख्या १४---
सम्भ्राम्यते मणौ पश्चात् तेन सव्यापसव्यत ।
तद्वेगाद् भ्राम्यते शब्दफेनचक्रमत परम् ॥ १ ॥
भ्राम्यन्त्यन्तश्शङ्कू मूलचक्राण्यपि यथाक्रमम् ।
तस्मात् सिंहास्यनालस्यचक्राण्यष्ट विशेषत ॥ २ ॥
भ्राम्यन्ति तेन ध्वन्याकर्षणघण्टारलोहत ।
कृतशब्दोन्मुखशनाकचालन भवेत् स्वत ॥ ३ ॥
रोरुवागृह्णीचर्मकृतगोलद्वय ततः ।
शलाकचालनात् सर्वशब्दान् तत्तत्स्वरैस्सह ॥ ४ ॥
सङ्गृह्य स्वान्तरे पश्चात् सन्निम्यति नान्यथा ।
तन्मूलकीलचालनात् पुनस्सिंहास्यमार्गत ॥ ५ ॥
द्रोणास्यपात्रे वेगेन प्रविश्याथ यथाक्रमम् ।
परश्रोत्रग्रहणयोग्यान् सर्वान् शब्दान् स्फुट यथा ॥ ६ ॥
करोति तत्क्षणादेव सर्वदिक्मुखत क्रमात् ।
-मणि घूमती है पश्चात् उससे सीधे उल्टे रूप में उसके वेग से शब्दफेनचक्र-शब्दसंस्कार चक्र
घूमता है उस के पश्चात् भीतरी शङ्कुओं के मूलचक्र भी यथाक्रम घूमते हैं । अत सिंहास्यनाल-सिंह के
मुख समान नाल के आठ चक्र विशेषरूप से घूमते हैं उससे ध्वनि को आकर्षित करनेवाले घण्टार-घण्टा
वाले लोहे से शब्दोन्मुख किया शलाकाचालन स्वत हो जावे रोरुवा गृह्णनी अतिशय शब्द को गुञ्जाने-
वाली ? के चर्म के दो गोल डोल जैसे शलाका चलाने से सब शब्दों को उन उन के स्वरों के साथ अपने
अन्दर लेकर पश्चात् नियन्त्रित करता है उस मूल कील के चलाने से पुन सिंहास्यमार्ग से द्रोणास्य पात्र
में वेग से प्रविष्ट हो यथाक्रम दूसरे के श्रोत्रग्रहण के योग्य सब शब्दों को तुरन्त सब ओर स्फुट करता
है ॥ १-६ ॥
तत्तद्दिश्यागत शब्द श्रुत्वा यन्ता सुधीः स्वयम् ॥ ७ ॥
परचक्रविचार यत् सर्वं विज्ञाय यन्त्रतः ।
इति कर्तव्यता ज्ञात्वा स्वयानपरिपालने ॥ ८ ॥
कुर्यात् प्रयत्न विधिवदन्यथा नाशमेधते ।

२०० ] [ बृहद् विमानशास्त्रं
तस्मादुक्तं समासेन शब्दाकर्षणयन्त्रकम् ॥ ६ ॥
शब्दाकर्षणयन्त्रास्तु द्वात्रिंशद्भेदत क्रमात् ।
शास्त्रेषु निर्णितास्सम्यग्यन्त्रशास्त्रविशारदै ॥ १० ॥
एतच्छब्दाकर्षणयन्त्र यानाङ्गत पृथक् ।
कुतस्तित्ववगन्तव्य सर्वशास्त्रप्रमाणत ॥ ११ ॥ इत्यादि ॥
उस उस दिशा से आये हुए शब्द को सुनकर बुद्धिमान् यन्त्रचालक परचक्र के सब विचार
को यन्त्र से जान कर अपने विमान की रक्षा के लिये यह कर्तव्य है यह जान कर प्रयत्न करे अन्यथा
नाश को प्राप्त हो जावे । अत संक्षेप से शब्दाकर्षण यन्त्र कहा । शब्दाकर्षण यन्त्र ३२ भेद के शास्त्रों
में यन्त्रशास्त्र विद्वानो ने क्रमश कहे हैं, यह शब्दाकर्षण यन्त्र विमानयान का अङ्गरूप से है ॥७-११॥
एतद्यन्त्रोपयुक्तं वस्तुस्वरूपवर्णनम्--इस यन्त्र के उपयुक्त वस्तु स्वरूप वर्णन है--
वैडालिकलोहमुक्तं लोहसर्वस्वे--वैडालिक लोहा कहा है लोहसर्वस्व में--
द्विवक्त्रशङ्करकान्तवज्रकमठा

शब्दाकर्षणयन्त्र ] [ २०१ ]
को लेकर शीघ्र यन्त्र के मुख में शास्त्रोक्त विधि से डाल दे। ऐसा करने पर शुद्ध स्पर्श से पुष्टिवर्धक
नीलवर्ण अत्यन्त सूक्ष्म सुण्ड भाररहित भास्वर वैडालिक लोहा हो जावेगा ॥
रुटनद्रावकमुक्तं मूलिकार्कप्रकाशिकायाम्--रुटनद्रावक मूलिकार्कप्रकाशिका में कहा है--
कनककरण्डगुञ्जापार्वणिचञ्चूलिभण्टिकारम्भा ।
विद्वेशचण्डिकामरशुण्डालिकबर्बंरास्यसौरम्भा ॥ १७ ॥
प्राणक्षारत्रितयविरञ्चिकटुकणिकासुरभी ।
सम्मेल्य द्रवयन्त्रे वेदानलसूर्तिसारसागराकांशान् ॥ १८ ॥
तथैव पञ्चदशगिरिजदिगवतारनेत्रबाणाशान् ।
सगृह्यापि च त्रिंशद्द्वादशविशाष्टभागसस्थ्यात ॥ १९ ॥
सगृह्णीयाद् द्रावकमष्टोत्तरशतकथ्योष्णमानेन ।
रुटनद्रावकमेतद् भवति विशुद्ध सुसूक्ष्मक पीतम् ॥ २० ॥ इत्यादि ॥
कनक-धतूरा, कर

२०२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
शक्तिमूषा बोतल में भर कर मिट्टी कपडा - कपड मिट्टी लपेट कर अलावुकुण्ड के मध्य में रख कर ५००
दर्जे की उष्णता के प्रमाण से अतिवेग से नेत्र अवधि तक गला कर पश्चात् धीरे से यन्त्रमुख में छोड़
दे पश्चात् वह लाल रंग दृढ मृदु अति सूक्ष्म हल्का बलिष्ठ सब शब्दों का आकर्षक घण्टार लोहा हो
जावेगा ॥ २१--२६ ॥
क्वणदर्पणमुक्तं दर्पणप्रकरणे--क्वणदर्पण दर्पणप्रकरण में कहा है-
काकारि करिशल्यक गरदक क्षाराष्टक सिहकम् ।
शल्याक वरशंकेर बुडिलक ज्वालामुख तुण्डिलम् ॥
बेंडाल शुकतुण्डक रविमुख चञ्चूलिक पाथिवम् ।
लुष्टाक वरतालक कुरवक कम्बोदर कामुकम् ॥ २७ ॥
संगृह्य तान् यथाशास्त्र शुद्धि कृत्वा त्रिवारत ।
पद्मास्यमूषामध्यास्ये पूरयित्वा समाशत ॥ २८ ॥
कुण्डे पद्माकारे स्थाप्य शशभस्त्राद् यथाविधि ।
कथ्याणा सप्तशतोष्णप्रमाणोनातिवे

शब्दाकर्षणयन्त्र ] [ २०३

क्षारत्रय—तीनों क्षार—सज्जीक्षार यवक्षार सुहागा, आञ्जनिक—सुरमा, कान्त—सूर्यकान्त—
बिल्लौर, सज्जीक-सज्जी ? सञ्जीव—सञ्जीवनी-रुदन्ती क्षुप ?, वर-सैन्धवलवण, कर्णा-आस, कौडी,
सोनामाखी, पाषाणचूरा, फिटकरी, कांसा, पारा, तालकसत्त्व—हरिताल का सत्त्व, गेरू, रुरुक्क—उपधातु
शोरा जैसा ? या वनरोहडा ? या लोहविशेष, रोचक-रुच्य-सौवर्चललवण, कुडुब ?, गरद—गरुडनाग,
पञ्चमुख—लोहविशेष ? या वासा ?, शिङ्गर—शिङ्गाण—लोहमत—मग्दूर ?, शुण्डिलक—हाथीशुण्डी
वृक्ष । इन २१ वस्तुओं को आक्षिकमूषायुख बोतल में भरकर श्रेष्ठ सीपाकार व्यासटिका कुण्डे में रख
श्रेष्ठ भत्रामुख से १०३ दर्जे की उष्णता से गलाकर मणियन्त्रमुख में डाल दे । पश्चात् सुदृढ बलवान्
बलप्रद रुदन्तीमणि बन जाती है ॥ ३१-३३॥

रुटिकामणिरुक्तं तत्रैव—रुटिकामणि कही वहां ही—

फेन चमरीनखमुखशल्य चुम्बकपाथिवशर्करधूमान् ॥३४॥
पारदप्राणक्षारस्फाटिकान् नागवराटिकमाक्षिकशुण्डान् ।
रुण्डककुडुबसुवर्चलवोर्यान् जम्बालिकवरवैडालिकदन्तान् ।
रञ्जकमञ्जिष्ठपार्वणरुक्मान् कौशिकनखवरमौक्तिकशुक्तीन् ॥३५॥
शुद्धान्नेतान् समभागश्यान् नतमुखमूषामुखमध्यबिले ।
सम्पूर्य महोदरकुण्डमुखे सस्थाप्य च पण्मुखभस्त्रमुखात् ॥३६॥
विधिवत्सञ्जाल्यानेत्रान्त मणियन्त्रमुखे वेगात् सिञ्चेत् ।
पश्चात् सुदृढ श्यामलवर्णा प्रभवति रुटिकामणि भारयुतम् ॥३७॥ इत्यादि ॥

समुद्रफेन, चमरी-मञ्जरी-मुक्ता, नखमुखशल्य-एक सामुद्रिक जन्तु का नखाकारमुखरूप शल्य-
काण्टा या नख मुख-दद्द्ल ?, शल्य-मैनफल ?, चुम्बक-अयस्कान्त, पार्थिव-रेह ? शर्कर-
पाषाणचूर्ण, धूम-शिलारस या सुरमा ?, पारा, प्राणक्षार—नवसादर ? बिल्लौर या फिटकरी ? सीसा, कौडी,
सोनामाखी, शुद्ध-प्रवाल ? या हाथीशुण्डावृक्ष ? रुण्डक--अगर, कुडुब ?, सुवर्चलवीर्य -सज्जीक्षार, जम्बा-
लिक--कमलबीज ? या शैवाल ? या केतकी ?, वैडालिकदन्त -गन्धमार्जार के दान्त ? या हरिताल दन्त--
दन्तीहरिताल- गोदन्ती हरिताल, रञ्जक- शिंगरफ, मञ्जिष्ठ ?--मञ्जिष्ठा -मजीठ ?, पार्वणि--हरिणशृङ्ग ?,
रुक्म--स्वर्ण या धतूरा ?, कौशिकनख--नेवले के नख ? या उल्लूके नख ?, वर--सैन्धवलवण, मौक्तिकशुक्ति--
मोती की सीपी । इन सब शुद्ध हुए समान भागों को नखमुखमूषामुखमध्य बिल में भरकर महोदर कुण्ड
में रखकर छ. मुख भस्त्रामुख से विधिवत नेत्र तक गलाकर मणियन्त्रमुख में वेग से छोड़ दे फिर सुदृढ
श्यामल रुटिकामणि भारयुक्त हो जाती है ॥३४-३७॥

शब्दफेनमुक्तं शब्दमहोदध्याम् ?—शब्दफेन (मणि) कहा है शब्दमहोदधिग्रन्थ में—

बाडवारवमाकाशाज्जलात् प्राणनमेव च ।
वाताग्नि खमुखात् तद्वच्छिलादनुकरध्वनिम् ॥३८॥
किरणाना स्फोटनारुणशक्ति शैवालवल्कलम् ।
समुद्रफेन ग्रीवाक जल्पाक माल्लुल तृणम् ॥३९॥
गृन्धारक रुद्रशल्य गोकर्ण मुसलि तथा ।

२०४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
सप्तद्वाविंशति पञ्चचत्वारिंशत् त्रयोदश ॥४०॥
द्वात्रिंशदेकोनविंशदष्टत्रिंशच्चतुर्दश ।
द्वाविंशदष्टत्रिंशद्द्विचत्वारिंशत् त्रयोदश ॥४१॥
पञ्चविंशन्नव तथा त्रयोविंशद् यथाक्रमम् ।
संगृह्य विधिवच्छब्दफेन पक्वात् प्रकल्पयेत् ॥४२॥
आकाश से बाडवाश्व गर्जना ७, जल से गीलापन या वेग से बहन श्वास-सैसैं करना २२,
खमुख--आकाशगोल से वाताग्नि वायु की सनसनाहट करनेवाली अग्निशक्ति ४५ को, उसी प्रकार शिला
चट्टानपरतों या परस्पर घटनसे अनुकार ध्वनि १३को, किरणों की किरणस्फोटन नामकशक्ति--विदारण-करने
वाली एवं अतिसूक्ष्म व्यापकशब्दशक्ति ३२को, शैवाल-शैवाल का वल्कल--पद्मकाष्ठ पदमाखकी छाल या
या शैवाल--जलकाई का उपरिभाग ?, १६ भाग, समुद्रफेन ३८ भाग, ग्रीवाक ? १४ भाग, कदाचित् बांस ?,
जलपाक ? २२ भाग कदाचित् शंख, माल्लुल ? मञ्जुल--मजीठ ? ३८ भाग, तृण--दर्भ ४२ भाग, या माल्लुल-
तृण ३८ भाग ?, गुम्भारक ?, ११ भाग, रुद्रशल्य ? २५ भाग, गोकर्ण--अश्वगन्ध या वाजीवल्ली ? ६भाग,
मुसलि--तालमूल १३ भाग, इनको विधिवत् लेकर पके रस से—शब्दफेन पकाए हुए से कल्याण
हो जाए ॥३८–४२॥
उक्तं हि तत्रैव--कहा ही वहां —
शैवालादिमुसल्यान्तान् वस्तून् संशोध्य शास्त्रतः ॥४२॥
तत्तत्प्रमाणानुसारात् यन्त्रे फेनाकरे क्रमात् ।
संस्थाप्य पाचयेत् सम्यग्यथाविधि दिनत्रयम् ॥४३॥
घटिकार्धादिकंवार कीली सङ्कलनाभिधाम् ।
भ्रामयेद्वेगतो नित्यं फेनवद् भवति क्रमात् ॥४४॥
यन्त्रात् फेनमाहृत्य शक्तिसम्मेलनाभिधे ।
यन्त्रे नियोजयेत् पश्चान्नालषट्कैर्यथाक्रमम् ॥४५॥
शैवाल से आदि कर मुसलीपर्यन्त वस्तुओं को शास्त्र से शोधकर उस उसके मान के
अनुसार फेन करनेवाले यन्त्र में क्रमशः रख तीन दिन तक ठीक पकावे आधी घड़ीमें एकवार सङ्कलननामक
कीली को घुमावे, नित्य वेग से घुमावे तो क्रम से फेन जैसा हो जाता है, यन्त्र से फेन लेकर शक्ति-
सम्मेलन नामकयन्त्र में नियुक्त कर दें पश्चात् ६ नालों से यथाक्रम–॥४२-४५॥
प्राणानादिस्फोटनांश्यशक्त्यन्त क्रमशस्सुधी ।
तत्तत्संख्यानुसारेण शक्तिमेकैकतं क्रमात् ॥४६॥
पूर्वोक्तनालतो यन्त्रस्थितफेनोपरिक्रमात् ।
सम्मेलयेद् यथाशास्त्र सावधानान्मुहुर्मुहुं ॥४७॥
समीकरणचक्रस्य कीलकं पट्टिकान्वितम् ।
पार्श्वे यन्त्रस्य विधिवद् भ्रामयेत् कालमानतः ॥४८॥
मन्दोष्णात् पाचयेत् पश्चादेवं यथाक्रमम् ।
प्राणानादिस्फोटनान्तशक्तिसंयोजन बुधः ॥४९॥

पटप्रसारणयन्त्र ] [ २०५
कुर्यात् पृथक् पृथक् पश्चादातपे सन्निवेशयेत् ।
विद्युच्छक्तिं संयोज्य पञ्चाशीतिप्रमाणतः ॥५०॥
तत्फेनमध्ये यन्त्रस्य नालात् सचोदयेच्छनै ।
तया संपाचयेत् पश्चाद् दिनषट्कं यथाविधि ॥ ५१ ॥
ततस्सङ्गृह्य तत्फेनं तद्यन्त्रात् सावधानतः ।
वाजीमुखाख्यलोहस्य पेटिकाया न्यसेद् दृढम् ॥ ५२ ॥
एवं क्रमेण विधिवच्छब्दफेन विचारतः ।
कृत चेत् सर्वशब्दापकर्षणं कारयेत् स्वतः ॥ ५३ ॥
प्राणन आदि स्फोटनाख्य शक्ति तक क्रम से बुद्धिमान् उस उस की संख्या के अनुसार एक
एक शक्ति को क्रम से पूर्वोक्त नाल से यन्त्र में रखे फेन के ऊपर सावधानी से बार बार मिलावे, समी-
करण-बराबर करने वाले चक्र की कील को पत्रिकासहित यन्त्र के पास में विधिवत् घुमावे काल के अनु-
सार मन्दोष्णता से पकावे फिर यथाक्रम इसी प्रकार प्राणन आदि स्फोटनपर्यन्त शक्ति का संयोजन

२०६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
शब्दार्कषणनामक यन्त्र यथाविधि कहकर अब पटप्रसारण यन्त्र संक्षेप से निरूपित किया
जाता है ॥ ५७ ॥
तदुक्तं क्रियासारे—यह वृत्त क्रियासार ग्रन्थ में कहा है—
दिक्प्रभेदेन यानस्य गमनार्थं तथैव हि ।
ध (घा ?) पायोपायसङ्केतविज्ञानार्थं समासतः ॥५८॥
पटप्रसारण यन्त्र क्रमाद् यानभुजे न्यसेत् । इत्यादि ॥
दिशाभेद से विमानयान के जाने को तथा संक्षेप से थोड़े में प्रतिकूलबाधक अनुकूलसाधक के
सङ्केतज्ञानार्थं पटप्रसारण यन्त्र क्रम से विमान की भुजाओं में लगा दे ।
तदुक्तं पटकल्पे—यह बात पटकल्प में कही है—
रक्तकृष्णश्वेतनीलपीतवर्णादिभि क्रमात् ।
रञ्जितं पटमेक तु कुर्याच्छास्त्रविधानतः ॥ ५६ ॥
मुञ्जारक्तकल्याणगोमारी शम्बरस्तथा ।
शणराजावर्ततृणकव्यादान् शास्त्रतः क्रमात् ॥ ६० ॥
त्रिवारं शोधयित्वाथ कृत्वा सूर्यपुटत्रयम् ।
पाचनायन्त्रमध्ये तद्वस्तून संस्थाप्य शास्त्रतः ॥ ६१ ॥
पाकमानानुसारेण त्रिदिनं पाचयेत् क्रमात् ।
कुट्टिणी यन्त्रमध्येथ तत्सङ्गृह्य न्यसेत् ततः ॥ ६२ ॥
यामत्रयं कुट्टिणीकीलकचालनत क्रमात् ।
समीकृत्य यथाशास्त्र पाचनेथ पुन पचेत् ॥ ६३ ॥
पटक्रियायन्त्रमुखे स्थापयित्वा ततः परम् ।
कीलीचालनतस्सम्यगोतप्रोतात्मना क्रमात् ॥ ६४ ॥
समीकृत्याथ विधिवत् पट कुर्यान्मनोहरम् ।
सप्तवर्णादिभिस्सम्यग्रञ्जितं स्याद् यथा स्वतः ॥ ६५ ॥
लाल काले सफेद नीले पीले वर्ण आदि से क्रमशः रंगा एक पट (वस्त्र) शास्त्रविधान से करे ।
मूञ्ज, अरक्त—लाख या आरक्त-लाल चन्दन, कल्याण-राल, गोमारी—गोमरी—लालबैंगन ?, शाम्बर-
लोध या अर्जुनवृक्ष की छाल ?, शण—सन, राजावर्त—लाल फिटकरी, तृण-दर्भ, कव्याद—जटामांसी ?,
इन्हें शास्त्र से क्रमशः तीन बार शोधकर तीन सूर्यपुट कर दे, पाचनायन्त्र के मध्य में रखकर पाकप्रमाणा-
नुसार तीन दिन तक पकावे, फिर कुट्टिणी यन्त्र में रख दे ३ प्रहर कुट्टिणीयन्त्र चलाते हुए समान करके
फिर पाचनयन्त्र में पकावे पुनः पट्क्रियायन्त्रमुख में रखकर कीली चलाने से सम्यक् ओत प्रोत एकीभाव
हो जाने से बराबर करके विधिवत् मनोहर पट बनावे फिर वह स्वतः सात रंग आदि से रंगा हुआ हो
जावेगा ॥ ५६—६५ ॥

दिशाम्पतियन्त्र ] [ २०७
संगृह्य तत्पट दीर्घदण्डे संवेष्ट्य शास्त्रतः ।
तद्दण्डं त्रिमुखीनालयन्त्रे सन्धार्य यत्नतः ॥ ६६ ॥
सकीलकं यानभुजे स्थापयेत् सुदृढं यथा ।
रक्तादिवर्णसङ्क्लृप्तपटसन्दर्शनात् सुधीः ॥ ६७ ॥
वर्णसङ्केततोपायादीन् विज्ञाय यथाविधि ।
तिर्यग्गमनतो यानं यन्ता दूरे नियोजयेत् ॥ ६८ ॥
तथैव श्वेतपीतादिपटसञ्चालनक्रमात् ।
दिक्प्रभेदं सुविज्ञाय तत्सङ्केतानुसारतः ॥ ६६ ॥
विमानं चोदयेत् प्राज्ञो नानागतिप्रभेदतः ।
विमानरक्षणं तेन प्रभवेन्नात्र संशयः ॥ ७० ॥
तस्मादेतद्यन्त्रमुक्तं समासेन यथाविधि ॥ ७१ ॥ इत्यादि ॥
उस पट को लेकर लम्बे दण्डे पर शास्त्रानुसार लपेटकर उस दण्डे को त्रिमुखीनाल यन्त्र में
जोड़कर कीलसहित विमानयान की भुजा में दृढ़ स्थापित करे, बुद्धिमान् जन रक्त आदि रंग

२०८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
का चर्म शोषण हो जावे पश्चात् खांसी आदि अतिदुःखद रोग उत्पन्न हो जावें अतः उसके दूर करने के
लिये विमान का दिशाम्पति यन्त्र भी वामकेन्द्र भुजा में यथाविधि रखे ॥ ७३-७५ ॥
यन्त्रस्वरूपमुक्तं यन्त्रप्रकरणे—यन्त्रस्वरूप कहा है यन्त्र प्रकरण में—
कौबेरवातविषसंशोषणार्थं यथाविधि ॥ ७६ ॥
दिशाम्पति प्रवक्ष्यामि यन्त्र लोकोपकारकम् ।
चतुरश्रं वर्त्तुलं वा पीठं कुर्याद् यथाविधि ॥ ७७ ॥
पार्वणीदारुणा द्रावसंस्कृतेन त्रिधा क्रमात् ।
कौबेर वायु के विष का संशोषण करने के लिये यथाविधि लोकोपकारक दिशाम्पति यन्त्र
कहूंगा, चौकोन या गोल पीठ यथाविधि करे पार्वणी काष्ठ से जो द्राव से ३ वार संस्कृत की गई
हो ॥ ७६-७७ ॥
पार्वणीदारुस्वरूपमुक्तमगस्त्यलहर्याम्-पार्वणीदारु का स्वरूप कहा है अगस्त्यलहरी में-
प्रति पर्वणि पर्वाणि प्रभवेद्दिक्षुदण्डवत् ꣹ ॥ ७८ ॥
यस्मिन्नविरलं तत्तु पार्वणीदार्वीतीरितम् ।
रक्तवर्णं दीर्घपर्णं रक्तपुष्पविराजितम् ॥ ७६ ॥
सूक्ष्मकण्टकसंयुक्तं भुजङ्गविषनाशनम् ।
अत्यन्तकदुसारं च भूतप्रेतविनाशनम् ॥ ८० ॥
कृष्णपक्षे मुकुलितं पार्वणीदारुलक्षणम् । इत्यादि ।
जिस वृक्ष के प्रतिपर्व में पर्व—स्वसदृश भाग गन्ने के समान अविच्छिन्न रूप में हों वह
पार्वणी दारु कही गई है । लाल रंग वाला लम्बे पत्ते वाला लाल फूलों से विशेष भूषित सूक्ष्म कांटे
वाला सर्प विष नाशक अत्यन्त कडवे मध्य भाग वाला भूत प्रेत निवारक कृष्णपक्ष में खिलने वाला
पार्वणी दारु का लक्षण है ।
एकोनविंशत्संख्याकदपणेन यथाविधि ॥ ८१ ॥
बाहुमात्रं नालशङ्कु नवद्वारसमन्वितम् ।
नवकीलसंयुक्तं नवतन्त्रिभिरन्वितम् ॥ ८२ ॥
कृत्वा संस्थापयेत् पीठमध्ये शास्त्रविधानतः ।
तन्मूलदेशतस्सम्यगीशान्यादिक्रमात् ततः ॥ ८३ ॥
अष्टदिक्ष्वष्टकेन्द्राणि कल्पयेत् समसख्यया ।
विस्तृतास्यं सूक्ष्ममूलं मध्ये वर्त्तुलरूपकम् ॥ ८४ ॥
वितस्तिद्वयमायामं षड्वितस्त्युन्नत तथा ।
वितस्त्रित्रयमायामवर्त्तुलं नालमध्यमे ॥ ८५ ॥
꣹ 'प्रभवेत्' वचनव्यत्यय ।

दिशासम्पतियन्त्र ] [ २०६
१६ वीं संख्यावाले दर्पण से यथाविधि भुजा के बराबर नालशंकु—पोला शंकु नौ द्वारों से
युक्त नौ कील पेंचों वाला नौ तारों से युक्त बना कर पीठ के मध्य में शास्त्रविधान से स्थापित करे उसके
मूलस्थान से भली प्रकार ईशानी आदि क्रम से आठ दिशाओं में आठ केन्द्र बनावे, समान संख्या से
खुले मुख वाला सूक्ष्म मूल वाला बीच में गोल २ बालिश्त लम्बा ६ बालिश्त ऊंचा ३ बालिश्त लम्बा
चौड़ा गोल नाल के मध्य में—॥ ८१-८५ ॥
एव क्रमेण कर्तव्य नालाष्टकमत् परम् ।
गणितोक्तविधानेन पत्राष्टकविराजितम् ॥ ८६ ॥
पद्ममेक कल्पयित्वा शङ्कुनोपरि विन्यसेत् ।
शङ्कुरन्ध्रे ष्वष्टनालान् सम्यक् सन्धारयेद् दृढम् ॥ ८७ ॥
गोभि (वि ?) लोक्तप्रकारेणावरण शशचर्मणा ।
नालाष्टकान्तर्बाह्यं च कर्तव्यं सप्रमाणतः ॥ ८८ ॥
माञ्चूलिकावल्कल तन्मूलमध्ये नियोजयेत् ।
नालस्थतन्त्रीस्सङ्गृह्य पद्माष्टदलसन्धिषु ॥ ८६ ॥
सन्धारयेद् यथाशास्त्र पद्मोपरि यथाक्रमम् ।
इस प्रकार क्रम से आठ नालें बनानी चाहिए' गणितोक्त विधान से आठ पत्रों-पंखड़ियों से विराजित
एक कमल बनाना चाहिए, उसे शंकु के ऊपर रक्खे, शंकु छिद्रों में ८ नालें सम्यक् लगावे गोभिल के
कहे प्रकारानुसार शशचर्म से आवरण आठों नालों के अन्दर और बाहिर सप्रमाण करना चाहिए। माञ्चू-
लिका वल्कल उसके मूलमध्य में लगा दे नालस्थ तारों को लेकर आठों पद्मों की सन्धियों में यथाशास्त्र
पद्मों के ऊपर जोड दें ॥ ८६-८६ ॥
माञ्चूलिकावल्कलमुक्तं पटप्रदीपिकायाम्—माञ्चूलिकावल्कल पटप्रदीपिका में कहा है—
वासन्तीमुण्डरङ्गिकासुररुचिकासवर्तकीफाल्गुणी,
चञ्चोरारुणकान्तक कुदलनी मण्डूरिकामारिका ।
लङ्कारिकपिवल्लरी विषधरा स्रवालिकामञ्जरी,
रुक्माङ्ग। वरघुण्डिकार्कगरुडागुञ्जावरीजम्भरा ॥ ६० ॥
एतेषा वरकाण्डपिञ्जुलिमथ त्वङ्मञ्जरीक क्रमात् ,
सप्ताहा वरपाकयन्त्रमुक्ततस्सम्पूयं सम्पाचयेत् ।
क्रौञ्चद्रावकसेचनेन च पुन. पाकेन संक्षालनात्,
तच्छाक्षोदितवर्त्मना त्रिदिनतः पाकप्रमाणाद् यदि ॥ ६१ ॥
कुर्याच्छेदतिशुभ्रवर्णममलं भद्रं मनोशमृजु,
श्रेष्ठाच्छेत्तरं भवेत् सुमुदुल माञ्चूलिकावल्कलम् ॥ इत्यादि ॥

२१० ] [ बृहद् विमानशास्त्रे
वासन्ती-पुण्ड्रवृक्ष-जूही फूलवृक्ष, मूड ?, रञ्जिका-रञ्जिनी-नागवल्ली या मजीठ या हरिद्रा,
सुर-देवदारु, रुचिका-रुचक-कागजी निम्बु, संवर्तकी-संवर्तक-बहेडा वृक्ष, फाल्गुणी-अर्जुन वृक्ष,
चञ्चोर चञ्चुर-रक्त एरण्ड, अरुणकान्त-सूर्यकान्त ? वा अरुणा-रक्तपुष्प तरु, कान्त-केसर या तृण ?,
कुदलनी-कुदलि-अश्मन्तक वृक्ष, मण्डूरिका-मण्डूर ?-लोहमल, मारिका-मारक-शिगरफ या मारिच-
कङ्कोल वृक्ष, लङ्कारी-लङ्कारिका-असनर्ग, कपिवल्लरी-कपिवल्ली-गजपिप्पली या कैथ, विषधरा ?-
सवालिका ? संवाटिका-शिषाडा, मञ्जरी-गन्धतुलसी या तिलवृक्ष या अशोक वृक्ष ? रुक्माङ्गा-
स्वर्णाङ्गा-महारग्वध वृक्ष-अमलतास, शरपुष्ठिका-श्रेष्ठ ढिण्ढिका ?-जल शिरीष वृक्ष, अर्क-आक,
गरुडा-गरुडी-गडूची-गिलोय, गुंजा-घौंटली, वरी-शतावरी, या अवरी-अवरिका-धन्या ?, जम्भरा-
झर्झर-सुगन्ध द्रव्य विशेष ? इनके श्रेष्ठ काण्ड कोपल छाल बूर को लेकर श्रेष्ठ पाक यन्त्रमुख में भर
कर पकावे क्रौञ्चद्रावक क्रौञ्च पद्मावीज रस ? डालने से फिर पकाने से शोधन से शास्त्रोक्त मार्ग से ३
दिन पकाने से शुभ्र वर्ण निर्मल भन्न मनपसन्द कोमल अति श्रेष्ठ सुमृदु माञ्जूलिकावल्कल
हो जावे ॥६०-६१॥
वातपामणिमाहृत्य पश्चान्मध्ये प्रकल्पयेत् ।
अंशुपादर्पणं तस्य पुरोभागे ततो न्यसेत् ॥ ६२ ॥
कौबेरवातसंसर्गो दिक्प्रभेदक्रमात् स्वतः ।
सम्भवेद् यदि मार्तण्डकिरणेषु मनागपि ॥ ६३ ॥
तदांशुपादर्पणस्य मुखं दिगनुसारत ।
नीलरक्तप्रभामिश्रवर्णं भवति नान्यथा ॥ ६४ ॥
दर्पणान्तरसन्धानात् तद्विज्ञाय यथाविधि ।
कीलकान् नवसंख्याकान् भ्रामयेदतिवेगतः ॥ ६५ ॥
एकैककीलवेगेन तत्तन्नालान्तरे क्रमात् ।
शक्तिसंयोजनाच्चैव शशचर्मणि वेगतः ॥ ६६ ॥
जायते सम्भाषिणाख्या काचिच्छक्तिर्महत्तरा ।
माञ्जूलिकावल्कलं तच्छक्तिमाहृत्य वेगतः ॥ ६७ ॥
चोदयेत् पद्मपत्रेषु तत्तत्पत्रान्यपि तन्त्रिभिः ।
तच्छक्तिं प्रे रयेद् वातपामणिं स्वीयशक्तिः ॥ ६८ ॥
वातपामणिः कौबेरविषवायुमतं परम् ।
सम्भाषिणिकासहाय्येन पिबेदत्यन्तवेगतः ॥ ६६ ॥
पश्चात् पश्चाष्टदलमध्यस्थनालमुखान्तरात् ।
कौबेरवातसम्बन्धविषवल्लघतिवेगतः ॥ १०० ॥
लयमायाति बाह्याकाशस्थवायौ स्वभावतः ।
पश्चात् खेटस्य यन्तॄणामारोग्यं भवति ध्रुवम् ॥ १०१ ॥
तस्माद् दिक्षाम्पतियन्त्रमेतदुक्तं यथाविधि ॥ इत्यादि ॥

विशाम्यतियन्त्र ] [ २५१
फिर वातपा मणिको लेकर मध्य में रखे, अंशुपादर्पण उसके सामने बाले भाग में रखे ।
कौबेर वातसंसर्ग दिशाओं के भेद से स्वतः यदि सूर्यकिरणों में थोड़ा भी हो जावे तो अंशुपादर्पण का
मुख दिशा के अनुसार नीला लाल प्रभा मिश्रित वर्ण वाला हो जाता है अन्यथा नहीं । दर्पण के अन्दर
सन्धान से उसे यथाविधि जानकर नौ कीलों को अति वेग से घुमा दे एक एक कील के वेग से और
उस उस नाल के अन्दर शक्तिसंयोजन से शशचर्म में सम्मार्थिणूक = टक्कर लेने वाली अतिमहती
कोई शक्ति उत्पन्न हो जाती है उस शक्ति को मारूज्जुलिकावल्कल लेकर वेग से पद्मापत्रों पद्मापत्र की पंख-
डियों में प्रेरित करता है वे पद्मापत्र तारों के द्वारा उस शक्ति को वातपामणि को अपनी शक्ति से प्रेरित
करे वातपा मणि कौवेरविष वायु को सम्मार्षिणका के सहाय से अतिवेग से पीती है पश्चात् पद्म के
आठ दलों में स्थित नालमुख के अन्दर कौवेरवात से सम्बन्ध रखने वाली विषशक्ति बाह्य वायु में लय
को प्राप्त हो जाती है पश्चात् विमान के चालक यात्रियों को आरोगता हो जाती है अत विशाम्पति
यन्त्र यथाविधि कहा है ॥ ९२-१०१ ॥
एकोनविंशं दर्पणमुक्तं दर्पणप्रकरणे- दर्पण प्रकरण में १६वा दर्पण कहा है-
उरगत्वक् पद्ममुख व्याघ्रदन्त च सैकतम् ।
लवण पारद सीस चेति निर्यासवृत्तिका ॥ १०२ ॥
स्फाटिक रुरुक वीर मृणाल रविकर्पटम् ।
चञ्चोल बालज पञ्चप्राणक्षा(सा?)र शषोडुपम् ॥ १०३ ॥
त्रिसप्तपञ्चद्वात्रिंशच्चतु पञ्चदशस्तथा ।
द्विपञ्चाविंशतिस्सप्तत्रिंशत् पञ्चदशस्तथा ।
चत्वारिंशत् त्रयोविंशत् सप्तविंशत् त्रयोदश ॥ १०४ ॥
एकोनविंशाष्टदशभागसंख्यानुसारत ।
त्रिंवार शोधयित्वाष्टादशवस्तून यथाविधि ॥ १०५ ॥
मत्स्यमूषामुखे सम्यगापूर्य विधिवत् तत ।
नलिकाकुण्डमध्ये सस्थापयित्वा दृढ यथा ॥ १०६ ॥
एकोनशतकथ्योष्णप्रमाणेन यथाविधि ।
गालयेद् गोमुखीभस्त्रात् पश्चाद् यन्त्रमुखे न्यसेत् ॥ १०७ ॥
एव कृते पिङ्गलाख्यदर्पण भवति दृढम् ।
एतदेकोनविंशत्संख्याकमिति शास्त्रे भिर्वार्णतम् ॥ १०८ ॥
उरगत्वक् = नागकेसर वृक्ष की छाल या सांप की केंचुली, पद्ममुख ?-थासा ? या जवाकुसुम ?
या लोहा विशेष, व्याघ्रदन्त ?, सैकत-शिंगरफ, लवण, पारा, सीसा, निर्यास-लाख ?, मृत्तिका-
सौराष्ट्र मृत्तिका ? या गेरू ?, स्फाटिक-स्फाटिक मणि, रुरुक-वनरोहेडा या हरिण शृङ्ग, वीर-लोहा ?
या सिन्दूर, मृणाल-खस (ठण्डी घाममूल ) या कमलमूल, रविकर्पट ?-ताम्बे का पत्तर या आख की

२१२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
रुई ?, चञ्चोल—चञ्चुलु—लाल एरन्ड ? बालज—सुगन्धबालास्थ्य, पांचों प्राणक्षार—मनुष्य घोडा
गधा बैल बकरी के मूत्रों का क्षार नवसादर, शशोङुप—लोध काष्ठ । क्रमश ३, ७, ५, २२, ४, १५, २,
५, २०, ७, ३०, १५, ४०, २३, २७, १३, १६, १८ भागों के अनुसार इन १२ वस्तुओं को तीन बार
शोधकर मत्स्यमूषा मुख बोतल में विधिवत् भर कर नलिकाकुण्ड के मध्य में रख कर ६६ दर्जे की उष्णता
से यथाविधि गोमुखी भस्त्रा से गलावे पश्चात् यन्त्रमुख में डाल दे ऐसा करने पर पिङ्गलाख्य दर्पण हो
जावेगा यही १६वीं संख्या वाला दर्पण शास्त्र में वर्णित किया है ॥ १०३–१०८ ॥

हस्तलेख कापी संख्या १५ –
अथ पट्टिकाभ्रकयन्त्रम्—अब पट्टिकाभ्रक यन्त्र कहते हैं ।
एवमुक्त्वा सङ्ग्रहेण दिशाम्पतिमतं परम् ।
पट्टिकाभ्रकयन्त्रस्वरूपमत्र निरूप्यते ॥१॥
इस प्रकार 'दिशाम्पति' यन्त्र संक्षेप से कहकर अब आगे, 'पट्टिकाभ्रक' यन्त्र के स्वरूप का
निरूपण किया जाता है।
तदुक्तं क्रियासारे—यह यह वृत्त 'क्रियासार' ग्रन्थ में कहा है—
ग्रहसन्धिसमुद्भूतज्वालामुखविनाशने ।
पट्टिकाभ्रकयन्त्रं च यानावरणमध्यमे ॥२॥
स्थापयेद्विधिवद् धीमान् सर्वदुःखविनाशनम् ।
ग्रहों की सन्धि में प्रकट हुए ज्वालामुख-अति ज्वलनशक्ति के विनाश निमित्त पट्टिकाभ्रक
यन्त्र को भी यानावरण के मध्य भाग में बुद्धिमान् स्थापित करे जो कि सर्वदुःखों का विनाशसाधन है ।
उक्तं हि यन्त्रसर्वस्वे—यन्त्रसर्वस्व ग्रन्थ में कहा ही है—
ग्रहसञ्चारमार्गेषु ग्रहाणां तु परस्परम् ॥३॥
एकरेखाप्रवेशेन ग्रहसन्धिर्भवेदतः ।
ज्वालामुखाभिधा ❀ काचिद्विषशक्तिः प्रजायते ॥४॥
यानारूढास्तया सर्वे मरिष्यन्ति न संशयः ।
तस्मात्तच्छक्तिनाशाय सङ्ग्रहेण यथाविधि ॥५॥
पट्टिकाभ्रकयन्त्रस्वरूपमद्य निरूप्यते ।
तृतीयवर्गाभ्रकेषु तृतीयाभ्रकतः क्रमात् ॥६॥
कारयेत्पट्टिकाभ्रकयन्त्रं शास्त्रविधानतः ।
ग्रहों के सञ्चरण मार्गों में ग्रहों के परस्पर एकरेखाप्रवेश से ग्रहसन्धि होती है अतः वहां
ज्वालामुखनामक कोई विषशक्ति--घातक विप्रयोगशक्ति† विरुद्ध संयोगशक्ति प्रकट हो जाती है उससे
❀ वा (हस्तलेखे)
† "विष विप्रयोगे" (अपादि०) विरुद्ध संयोग-घर्षण वा धम्त्वाद् ।

२१४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
यान--व्योमयान या विमानयान पर सवार हुए सब निःसंशय मर जायेंगे । अतः उस विषशक्ति-विरुद्ध
योगवाली शक्ति के नाशार्थ संक्षेप से पट्टिकाअभ्रकयन्त्र का स्वरूप आज-अब विधिवत् निरूपित किया जाता
है । तृतीयवर्ग के अभ्रकों में क्रमानुसार तृतीय अभ्रक से शास्त्रविधान से पट्टिकाअभ्रकयन्त्र करावे-बनवाए
या करे बनवावे ॥३-६॥
तदुक्तं शौनकीये--यह शौनकीय वचन में कहा है-
अथ तृतीयवर्गस्थाभ्रकनामान्यनुक्रमिष्यामो ‡ शारदपङ्किलसोममार्जा-
लिकारक्तमुखविनाशका इति । सोमेनैवैतदिति + केचित् ॥
अब तृतीय वर्गवाले अभ्रक नामों को कहेंगे शारद, पङ्किल, सोममार्जालिक, रक्तमुख, विनाशक
या रक्तमुखविनाशक । सोम से ही करे ऐसा कुछ आचार्य कहते हैं । (सोम की तृतीय संख्या है ) ।
सोमाभ्रकलक्षणमुक्तं लोहतन्त्रे-सोम नाम के अभ्रक का लक्षण लोहतन्त्र में कहा है-
मेघवर्णेऽति

Here is the complete and accurate transcription of the text from the provided image:

पट्टिकाभ्रकयन्त्रः ] [ २१५
अभ्रक को रसमाताबीज तैल रस—हिङ्गुल और माताबीज—आलुकणी या इन्द्रवारुणी के
बीज के तैल से विधि से या दो बार, शोधे फिर अभ्रक को गलाकर दो वितस्ति—बालिश्तमात्र लम्बी
चौड़ी बाहु—हाथ भर ऊंची पट्टिका बनावे । प्रथम कूर्मपीठ (नीचे का स्थान) वारिवृक्ष—हीवेर—सुगन्ध
वाला वरना ? वृक्ष की लकड़ी से सोलह अङ्गुल लम्बा बाहुमात्र ऊंचा शंकुपट्टिकाकार से शास्त्रानुसार
बनावे, पुनः सीधी घूमनेवाले कीलचक्र विधिवत् शौण्डीर मणि‡ से युक्त कील चक्र लगावे उस शंकु में
लगावे, पश्चात् मूलकेन्द्र से तन्त्रियों-तारों को लगावे ॥ ९-१३ ॥
आपट्टिकान्तं विधिवत्कीलचक्रानुसारत ।
पश्चाद्भागे दन्तपात्रं स्थापयित्वा ततः परम् ॥ १४ ॥
शैवालद्रावकं तस्मिन् सम्पूर्य रविचुम्बकम् ।
पारदं च न्यसेत् पश्चात् तन्त्रीनाहृत्य शास्त्रत ॥१५॥
तस्मिन् सन्धारयित्वाथ शृङ्गिण्याच्छाद्य नालतः ।
तन्नालमूलमाकाशे दृढं सन्धारयेत् क्रमात् ॥ १६ ॥
प्रदक्षिणावर्तकीलपञ्चचक्रैर्विराजितम् ।
पूर्वोक्ताभ्रकशङ्कु तत्पीठमध्ये दृढं यथा ॥ १७ ॥
पुनः पट्टिकापर्यन्त चक्रों के अनुसार दन्तपात्र—जिस में दान्ते हों—दान्ते लगे हों चक्रों को
घुमाने के लिये उसे स्थापित करके पुनः उस दन्तपात्र में शैवालद्रावक को भर के पश्चात् रविचुम्बक—
सूर्यतेज को खींचने वाले सूर्यकान्त और पारा डाले तन्त्रियों—तारों को लेकर शास्त्रानुसार उस में बन्द
कर शृङ्गी ? में नाल से ढक कर, उस नाल के मूल को आकाश में दृढ लगादे घूमनेवाले पांच कीलचक्रों
से वह नालमूल युक्त हो, जिस से पूर्व कहा अभ्रक शङ्कु पीठ के मध्य दृढ रहे ॥ १४-१७॥
स्थापयित्वा तस्य मूर्ध्नि पट्टिकां द्रवशोधिताम् ।
सन्धारयेद् यथाशास्त्रं यानावरणमध्यमे ॥ १८ ॥
यदा सन्ध्यन्तराज्ज्वालामुखशक्तिस्स्वभावतः ।
सम्भूय व्योमयानस्य मार्गान्ति प्रसार्यते ॥ १९ ॥
कीली सन्धारयेच्छङ्कुमुलकेन्द्रे तदा बुधः।
तेन तन्त्रीमुखाच्छ्रैत्यवेगस्पन्दनसंयुतः ॥ २० ॥
द्रवपात्रात्समुत्थाय पञ्चचक्रमुखान्तरात् ।
पूर्वोक्तपट्टिकामूलकेन्द्रं प्रविशति स्वयम् ॥ २१ ॥
पश्चात्तन्मुखमासाद्य शक्तिं ज्वालामुखामिधाम् ।
समाकृष्यातिवेगेन पट्टिकामूलकेन्द्रतः ॥ २२ ॥
‡ शौण्डीर मणि आगे कही हुई कृत्रिमणि है ।
† शृङ्गिण्या ? (हस्तलेखे पाठः)

२१६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
उस शङ्कु की मूर्धा में द्रवशोधित अभ्रकपट्टिका को स्थापित करे व्योमयान के आवरण के मध्य
भाग में शास्त्रानुसार जोड दे । जब ग्रहमागों के सन्धिरैखास्थान से ज्वालामुख शक्तिस्वभाव से ग्रहमार्गों से
परस्पर मिलकर व्योमयान के मार्ग तक प्रसारित की जाती है । तब बुद्धिमान् विद्वान् शंकुमूल के केन्द्र में
कीली को लगावे—बन्द करे उस से तन्त्रीमुखतार के सिरे से शीतता का वेग स्पन्दन करता हुआ पांच
चक्रों के मुख जिस में लगे हैं उस द्रावकपात्र से उठकर पूर्वोक्त पट्टिकामूलकेन्द्र में स्वयं प्रवेश करता है ।
पश्चात् उस मुख को प्राप्त कर ज्वालामुखनामक शक्ति को पट्टिकामूलकेन्द्र से अतिवेग से खींचकर-।१८-२२।
प्रदक्षिणावर्तकीलमध्यस्थितमणौ क्रमात् ।
सञ्चोदयति वेगेन तच्छक्ति तदनन्तरम् ॥२३॥
तन्मणिस्स्वकीयवेगेन समाकृष्यातिवेगत ।
सम्पूरयेन्नालमुखे तन्मूलात् खे लय व्रजेत् ॥२४॥
तेन यानस्थनॄणाञ्चामृत्यु