बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहस्तलेख कापी संख्या १४---
सम्भ्राम्यते मणौ पश्चात् तेन सव्यापसव्यत ।
तद्वेगाद् भ्राम्यते शब्दफेनचक्रमत परम् ॥ १ ॥
भ्राम्यन्त्यन्तश्शङ्कू मूलचक्राण्यपि यथाक्रमम् ।
तस्मात् सिंहास्यनालस्यचक्राण्यष्ट विशेषत ॥ २ ॥
भ्राम्यन्ति तेन ध्वन्याकर्षणघण्टारलोहत ।
कृतशब्दोन्मुखशनाकचालन भवेत् स्वत ॥ ३ ॥
रोरुवागृह्णीचर्मकृतगोलद्वय ततः ।
शलाकचालनात् सर्वशब्दान् तत्तत्स्वरैस्सह ॥ ४ ॥
सङ्गृह्य स्वान्तरे पश्चात् सन्निम्यति नान्यथा ।
तन्मूलकीलचालनात् पुनस्सिंहास्यमार्गत ॥ ५ ॥
द्रोणास्यपात्रे वेगेन प्रविश्याथ यथाक्रमम् ।
परश्रोत्रग्रहणयोग्यान् सर्वान् शब्दान् स्फुट यथा ॥ ६ ॥
करोति तत्क्षणादेव सर्वदिक्मुखत क्रमात् ।
-मणि घूमती है पश्चात् उससे सीधे उल्टे रूप में उसके वेग से शब्दफेनचक्र-शब्दसंस्कार चक्र
घूमता है उस के पश्चात् भीतरी शङ्कुओं के मूलचक्र भी यथाक्रम घूमते हैं । अत सिंहास्यनाल-सिंह के
मुख समान नाल के आठ चक्र विशेषरूप से घूमते हैं उससे ध्वनि को आकर्षित करनेवाले घण्टार-घण्टा
वाले लोहे से शब्दोन्मुख किया शलाकाचालन स्वत हो जावे रोरुवा गृह्णनी अतिशय शब्द को गुञ्जाने-
वाली ? के चर्म के दो गोल डोल जैसे शलाका चलाने से सब शब्दों को उन उन के स्वरों के साथ अपने
अन्दर लेकर पश्चात् नियन्त्रित करता है उस मूल कील के चलाने से पुन सिंहास्यमार्ग से द्रोणास्य पात्र
में वेग से प्रविष्ट हो यथाक्रम दूसरे के श्रोत्रग्रहण के योग्य सब शब्दों को तुरन्त सब ओर स्फुट करता
है ॥ १-६ ॥
तत्तद्दिश्यागत शब्द श्रुत्वा यन्ता सुधीः स्वयम् ॥ ७ ॥
परचक्रविचार यत् सर्वं विज्ञाय यन्त्रतः ।
इति कर्तव्यता ज्ञात्वा स्वयानपरिपालने ॥ ८ ॥
कुर्यात् प्रयत्न विधिवदन्यथा नाशमेधते ।