बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्दाकर्षणयन्त्र ] [ २०१ ]
को लेकर शीघ्र यन्त्र के मुख में शास्त्रोक्त विधि से डाल दे। ऐसा करने पर शुद्ध स्पर्श से पुष्टिवर्धक
नीलवर्ण अत्यन्त सूक्ष्म सुण्ड भाररहित भास्वर वैडालिक लोहा हो जावेगा ॥
रुटनद्रावकमुक्तं मूलिकार्कप्रकाशिकायाम्--रुटनद्रावक मूलिकार्कप्रकाशिका में कहा है--
कनककरण्डगुञ्जापार्वणिचञ्चूलिभण्टिकारम्भा ।
विद्वेशचण्डिकामरशुण्डालिकबर्बंरास्यसौरम्भा ॥ १७ ॥
प्राणक्षारत्रितयविरञ्चिकटुकणिकासुरभी ।
सम्मेल्य द्रवयन्त्रे वेदानलसूर्तिसारसागराकांशान् ॥ १८ ॥
तथैव पञ्चदशगिरिजदिगवतारनेत्रबाणाशान् ।
सगृह्यापि च त्रिंशद्द्वादशविशाष्टभागसस्थ्यात ॥ १९ ॥
सगृह्णीयाद् द्रावकमष्टोत्तरशतकथ्योष्णमानेन ।
रुटनद्रावकमेतद् भवति विशुद्ध सुसूक्ष्मक पीतम् ॥ २० ॥ इत्यादि ॥
कनक-धतूरा, कर