बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
पृष्ठ 225, कुल 368 में से
संदर्भ में पढ़ें२०२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
शक्तिमूषा बोतल में भर कर मिट्टी कपडा - कपड मिट्टी लपेट कर अलावुकुण्ड के मध्य में रख कर ५००
दर्जे की उष्णता के प्रमाण से अतिवेग से नेत्र अवधि तक गला कर पश्चात् धीरे से यन्त्रमुख में छोड़
दे पश्चात् वह लाल रंग दृढ मृदु अति सूक्ष्म हल्का बलिष्ठ सब शब्दों का आकर्षक घण्टार लोहा हो
जावेगा ॥ २१--२६ ॥
क्वणदर्पणमुक्तं दर्पणप्रकरणे--क्वणदर्पण दर्पणप्रकरण में कहा है-
काकारि करिशल्यक गरदक क्षाराष्टक सिहकम् ।
शल्याक वरशंकेर बुडिलक ज्वालामुख तुण्डिलम् ॥
बेंडाल शुकतुण्डक रविमुख चञ्चूलिक पाथिवम् ।
लुष्टाक वरतालक कुरवक कम्बोदर कामुकम् ॥ २७ ॥
संगृह्य तान् यथाशास्त्र शुद्धि कृत्वा त्रिवारत ।
पद्मास्यमूषामध्यास्ये पूरयित्वा समाशत ॥ २८ ॥
कुण्डे पद्माकारे स्थाप्य शशभस्त्राद् यथाविधि ।
कथ्याणा सप्तशतोष्णप्रमाणोनातिवे