बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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कुर्यात् पृथक् पृथक् पश्चादातपे सन्निवेशयेत् ।
विद्युच्छक्तिं संयोज्य पञ्चाशीतिप्रमाणतः ॥५०॥
तत्फेनमध्ये यन्त्रस्य नालात् सचोदयेच्छनै ।
तया संपाचयेत् पश्चाद् दिनषट्कं यथाविधि ॥ ५१ ॥
ततस्सङ्गृह्य तत्फेनं तद्यन्त्रात् सावधानतः ।
वाजीमुखाख्यलोहस्य पेटिकाया न्यसेद् दृढम् ॥ ५२ ॥
एवं क्रमेण विधिवच्छब्दफेन विचारतः ।
कृत चेत् सर्वशब्दापकर्षणं कारयेत् स्वतः ॥ ५३ ॥
प्राणन आदि स्फोटनाख्य शक्ति तक क्रम से बुद्धिमान् उस उस की संख्या के अनुसार एक
एक शक्ति को क्रम से पूर्वोक्त नाल से यन्त्र में रखे फेन के ऊपर सावधानी से बार बार मिलावे, समी-
करण-बराबर करने वाले चक्र की कील को पत्रिकासहित यन्त्र के पास में विधिवत् घुमावे काल के अनु-
सार मन्दोष्णता से पकावे फिर यथाक्रम इसी प्रकार प्राणन आदि स्फोटनपर्यन्त शक्ति का संयोजन