बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
शब्दार्कषणनामक यन्त्र यथाविधि कहकर अब पटप्रसारण यन्त्र संक्षेप से निरूपित किया
जाता है ॥ ५७ ॥
तदुक्तं क्रियासारे—यह वृत्त क्रियासार ग्रन्थ में कहा है—
दिक्प्रभेदेन यानस्य गमनार्थं तथैव हि ।
ध (घा ?) पायोपायसङ्केतविज्ञानार्थं समासतः ॥५८॥
पटप्रसारण यन्त्र क्रमाद् यानभुजे न्यसेत् । इत्यादि ॥
दिशाभेद से विमानयान के जाने को तथा संक्षेप से थोड़े में प्रतिकूलबाधक अनुकूलसाधक के
सङ्केतज्ञानार्थं पटप्रसारण यन्त्र क्रम से विमान की भुजाओं में लगा दे ।
तदुक्तं पटकल्पे—यह बात पटकल्प में कही है—
रक्तकृष्णश्वेतनीलपीतवर्णादिभि क्रमात् ।
रञ्जितं पटमेक तु कुर्याच्छास्त्रविधानतः ॥ ५६ ॥
मुञ्जारक्तकल्याणगोमारी शम्बरस्तथा ।
शणराजावर्ततृणकव्यादान् शास्त्रतः क्रमात् ॥ ६० ॥
त्रिवारं शोधयित्वाथ कृत्वा सूर्यपुटत्रयम् ।
पाचनायन्त्रमध्ये तद्वस्तून संस्थाप्य शास्त्रतः ॥ ६१ ॥
पाकमानानुसारेण त्रिदिनं पाचयेत् क्रमात् ।
कुट्टिणी यन्त्रमध्येथ तत्सङ्गृह्य न्यसेत् ततः ॥ ६२ ॥
यामत्रयं कुट्टिणीकीलकचालनत क्रमात् ।
समीकृत्य यथाशास्त्र पाचनेथ पुन पचेत् ॥ ६३ ॥
पटक्रियायन्त्रमुखे स्थापयित्वा ततः परम् ।
कीलीचालनतस्सम्यगोतप्रोतात्मना क्रमात् ॥ ६४ ॥
समीकृत्याथ विधिवत् पट कुर्यान्मनोहरम् ।
सप्तवर्णादिभिस्सम्यग्रञ्जितं स्याद् यथा स्वतः ॥ ६५ ॥
लाल काले सफेद नीले पीले वर्ण आदि से क्रमशः रंगा एक पट (वस्त्र) शास्त्रविधान से करे ।
मूञ्ज, अरक्त—लाख या आरक्त-लाल चन्दन, कल्याण-राल, गोमारी—गोमरी—लालबैंगन ?, शाम्बर-
लोध या अर्जुनवृक्ष की छाल ?, शण—सन, राजावर्त—लाल फिटकरी, तृण-दर्भ, कव्याद—जटामांसी ?,
इन्हें शास्त्र से क्रमशः तीन बार शोधकर तीन सूर्यपुट कर दे, पाचनायन्त्र के मध्य में रखकर पाकप्रमाणा-
नुसार तीन दिन तक पकावे, फिर कुट्टिणी यन्त्र में रख दे ३ प्रहर कुट्टिणीयन्त्र चलाते हुए समान करके
फिर पाचनयन्त्र में पकावे पुनः पट्क्रियायन्त्रमुख में रखकर कीली चलाने से सम्यक् ओत प्रोत एकीभाव
हो जाने से बराबर करके विधिवत् मनोहर पट बनावे फिर वह स्वतः सात रंग आदि से रंगा हुआ हो
जावेगा ॥ ५६—६५ ॥