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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 221, कुल 368 में से

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पृष्ठ 221

१६८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
एक एक छिद्रमार्ग से भीतर शङ्कु के मुख के अन्दर से सूक्ष्म तारों को निकालकर आवरण
के ऊपर लगावे, उस के अन्दर अङ्गुल माप से छिद्र करके यथाविधि सिहास्यदण्डनाल को मध्य में
संस्थापित करदे । वाताकर्षण चक्र १६ अराओंवाला सुसूक्ष्म उसके सामने वाले भाग में तारों से लिपटा
हुआ लगावे, इस प्रकार क्रम से आठ दिशाओं में सूक्ष्म चक्र लगावे, पूर्वोक्त सिहास्य मुख में आठ
दिशाओं में घूमनेवाले कीलचक्रों को संस्थापित करे अनन्तर शुद्ध याज्ञी मुखलोहे से की हुई गोल
पट्टिकाओं को-॥ १२६-१३० ॥
सुदृढान् च(छ्र?)षकाकारान् सरल स्थापयेत् तत ।
पूर्वोक्तावरणाच्छिद्रमुखसंस्थितान् क्रमात् ॥ १३१ ॥
तन्त्रीन् सङ्गृह्य विधिवत् तेषु संयोजयेत् क्रमात् ।
तथैव वाताहरणचक्रस्थानाद् यथाविधि ॥ १३२ ॥
मरुन्धान्यन्तसुसूक्ष्मतन्त्रीनाहृत्य शक्ति ।
सिहास्यस्थाष्टचषकपट्टिकामूलसन्धिषु ॥ १३३ ॥
संयोज्य शब्दफेनस्थशङ्कूना मूलकेन्द्रत ।
द्रवपात्रस्थमणिमावृत्य तन्त्रीन् यथाक्रमम् ॥ १३४ ॥
समाहृत्याय विधिवद् बध्नीयात् सुदृढ यथा ।
वातसंयोजनाच्चक्रभ्रमण भवति स्वतः ॥ १३५ ॥
—सुदृढ ग्लासपात्र या लोटापात्र के आकारवालों को सरल स्थापित करे फिर पूर्वोक्त आवरण के
आठ छिद्रमुखों में स्थित तारों को लेकर विधिवत् उन में लगादे वैसे ही वात को खींचने वाले चक्रस्थान
से यथाविधि छिद्रसहित अत्यन्त सूक्ष्म तारों को शक्ति से लेकर—खींचकर सिंहास्य में स्थित आठ
चषकपात्र पट्टिकामूलसन्धियों में जोड़कर शब्दफेनचक्र में स्थित शङ्कुओं के मूलकेन्द्र से द्रवपात्रस्थित
मणि को आवृत कर तारों को यथाक्रम लेकर विधिवत् दृढ बान्ध दे जिससे वातसंयोजन से चक्रभ्रमण
स्वतः हो जाता है—हो जावे ॥ १३१-१३५ ॥