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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 232, कुल 368 में से

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दिशासम्पतियन्त्र ] [ २०६
१६ वीं संख्यावाले दर्पण से यथाविधि भुजा के बराबर नालशंकु—पोला शंकु नौ द्वारों से
युक्त नौ कील पेंचों वाला नौ तारों से युक्त बना कर पीठ के मध्य में शास्त्रविधान से स्थापित करे उसके
मूलस्थान से भली प्रकार ईशानी आदि क्रम से आठ दिशाओं में आठ केन्द्र बनावे, समान संख्या से
खुले मुख वाला सूक्ष्म मूल वाला बीच में गोल २ बालिश्त लम्बा ६ बालिश्त ऊंचा ३ बालिश्त लम्बा
चौड़ा गोल नाल के मध्य में—॥ ८१-८५ ॥
एव क्रमेण कर्तव्य नालाष्टकमत् परम् ।
गणितोक्तविधानेन पत्राष्टकविराजितम् ॥ ८६ ॥
पद्ममेक कल्पयित्वा शङ्कुनोपरि विन्यसेत् ।
शङ्कुरन्ध्रे ष्वष्टनालान् सम्यक् सन्धारयेद् दृढम् ॥ ८७ ॥
गोभि (वि ?) लोक्तप्रकारेणावरण शशचर्मणा ।
नालाष्टकान्तर्बाह्यं च कर्तव्यं सप्रमाणतः ॥ ८८ ॥
माञ्चूलिकावल्कल तन्मूलमध्ये नियोजयेत् ।
नालस्थतन्त्रीस्सङ्गृह्य पद्माष्टदलसन्धिषु ॥ ८६ ॥
सन्धारयेद् यथाशास्त्र पद्मोपरि यथाक्रमम् ।
इस प्रकार क्रम से आठ नालें बनानी चाहिए' गणितोक्त विधान से आठ पत्रों-पंखड़ियों से विराजित
एक कमल बनाना चाहिए, उसे शंकु के ऊपर रक्खे, शंकु छिद्रों में ८ नालें सम्यक् लगावे गोभिल के
कहे प्रकारानुसार शशचर्म से आवरण आठों नालों के अन्दर और बाहिर सप्रमाण करना चाहिए। माञ्चू-
लिका वल्कल उसके मूलमध्य में लगा दे नालस्थ तारों को लेकर आठों पद्मों की सन्धियों में यथाशास्त्र
पद्मों के ऊपर जोड दें ॥ ८६-८६ ॥
माञ्चूलिकावल्कलमुक्तं पटप्रदीपिकायाम्—माञ्चूलिकावल्कल पटप्रदीपिका में कहा है—
वासन्तीमुण्डरङ्गिकासुररुचिकासवर्तकीफाल्गुणी,
चञ्चोरारुणकान्तक कुदलनी मण्डूरिकामारिका ।
लङ्कारिकपिवल्लरी विषधरा स्रवालिकामञ्जरी,
रुक्माङ्ग। वरघुण्डिकार्कगरुडागुञ्जावरीजम्भरा ॥ ६० ॥
एतेषा वरकाण्डपिञ्जुलिमथ त्वङ्मञ्जरीक क्रमात् ,
सप्ताहा वरपाकयन्त्रमुक्ततस्सम्पूयं सम्पाचयेत् ।
क्रौञ्चद्रावकसेचनेन च पुन. पाकेन संक्षालनात्,
तच्छाक्षोदितवर्त्मना त्रिदिनतः पाकप्रमाणाद् यदि ॥ ६१ ॥
कुर्याच्छेदतिशुभ्रवर्णममलं भद्रं मनोशमृजु,
श्रेष्ठाच्छेत्तरं भवेत् सुमुदुल माञ्चूलिकावल्कलम् ॥ इत्यादि ॥