सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 226, कुल 368 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 226

शब्दाकर्षणयन्त्र ] [ २०३

क्षारत्रय—तीनों क्षार—सज्जीक्षार यवक्षार सुहागा, आञ्जनिक—सुरमा, कान्त—सूर्यकान्त—
बिल्लौर, सज्जीक-सज्जी ? सञ्जीव—सञ्जीवनी-रुदन्ती क्षुप ?, वर-सैन्धवलवण, कर्णा-आस, कौडी,
सोनामाखी, पाषाणचूरा, फिटकरी, कांसा, पारा, तालकसत्त्व—हरिताल का सत्त्व, गेरू, रुरुक्क—उपधातु
शोरा जैसा ? या वनरोहडा ? या लोहविशेष, रोचक-रुच्य-सौवर्चललवण, कुडुब ?, गरद—गरुडनाग,
पञ्चमुख—लोहविशेष ? या वासा ?, शिङ्गर—शिङ्गाण—लोहमत—मग्दूर ?, शुण्डिलक—हाथीशुण्डी
वृक्ष । इन २१ वस्तुओं को आक्षिकमूषायुख बोतल में भरकर श्रेष्ठ सीपाकार व्यासटिका कुण्डे में रख
श्रेष्ठ भत्रामुख से १०३ दर्जे की उष्णता से गलाकर मणियन्त्रमुख में डाल दे । पश्चात् सुदृढ बलवान्
बलप्रद रुदन्तीमणि बन जाती है ॥ ३१-३३॥

रुटिकामणिरुक्तं तत्रैव—रुटिकामणि कही वहां ही—

फेन चमरीनखमुखशल्य चुम्बकपाथिवशर्करधूमान् ॥३४॥
पारदप्राणक्षारस्फाटिकान् नागवराटिकमाक्षिकशुण्डान् ।
रुण्डककुडुबसुवर्चलवोर्यान् जम्बालिकवरवैडालिकदन्तान् ।
रञ्जकमञ्जिष्ठपार्वणरुक्मान् कौशिकनखवरमौक्तिकशुक्तीन् ॥३५॥
शुद्धान्नेतान् समभागश्यान् नतमुखमूषामुखमध्यबिले ।
सम्पूर्य महोदरकुण्डमुखे सस्थाप्य च पण्मुखभस्त्रमुखात् ॥३६॥
विधिवत्सञ्जाल्यानेत्रान्त मणियन्त्रमुखे वेगात् सिञ्चेत् ।
पश्चात् सुदृढ श्यामलवर्णा प्रभवति रुटिकामणि भारयुतम् ॥३७॥ इत्यादि ॥

समुद्रफेन, चमरी-मञ्जरी-मुक्ता, नखमुखशल्य-एक सामुद्रिक जन्तु का नखाकारमुखरूप शल्य-
काण्टा या नख मुख-दद्द्ल ?, शल्य-मैनफल ?, चुम्बक-अयस्कान्त, पार्थिव-रेह ? शर्कर-
पाषाणचूर्ण, धूम-शिलारस या सुरमा ?, पारा, प्राणक्षार—नवसादर ? बिल्लौर या फिटकरी ? सीसा, कौडी,
सोनामाखी, शुद्ध-प्रवाल ? या हाथीशुण्डावृक्ष ? रुण्डक--अगर, कुडुब ?, सुवर्चलवीर्य -सज्जीक्षार, जम्बा-
लिक--कमलबीज ? या शैवाल ? या केतकी ?, वैडालिकदन्त -गन्धमार्जार के दान्त ? या हरिताल दन्त--
दन्तीहरिताल- गोदन्ती हरिताल, रञ्जक- शिंगरफ, मञ्जिष्ठ ?--मञ्जिष्ठा -मजीठ ?, पार्वणि--हरिणशृङ्ग ?,
रुक्म--स्वर्ण या धतूरा ?, कौशिकनख--नेवले के नख ? या उल्लूके नख ?, वर--सैन्धवलवण, मौक्तिकशुक्ति--
मोती की सीपी । इन सब शुद्ध हुए समान भागों को नखमुखमूषामुखमध्य बिल में भरकर महोदर कुण्ड
में रखकर छ. मुख भस्त्रामुख से विधिवत नेत्र तक गलाकर मणियन्त्रमुख में वेग से छोड़ दे फिर सुदृढ
श्यामल रुटिकामणि भारयुक्त हो जाती है ॥३४-३७॥

शब्दफेनमुक्तं शब्दमहोदध्याम् ?—शब्दफेन (मणि) कहा है शब्दमहोदधिग्रन्थ में—

बाडवारवमाकाशाज्जलात् प्राणनमेव च ।
वाताग्नि खमुखात् तद्वच्छिलादनुकरध्वनिम् ॥३८॥
किरणाना स्फोटनारुणशक्ति शैवालवल्कलम् ।
समुद्रफेन ग्रीवाक जल्पाक माल्लुल तृणम् ॥३९॥
गृन्धारक रुद्रशल्य गोकर्ण मुसलि तथा ।