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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 231, कुल 368 में से

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पृष्ठ 231

२०८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
का चर्म शोषण हो जावे पश्चात् खांसी आदि अतिदुःखद रोग उत्पन्न हो जावें अतः उसके दूर करने के
लिये विमान का दिशाम्पति यन्त्र भी वामकेन्द्र भुजा में यथाविधि रखे ॥ ७३-७५ ॥
यन्त्रस्वरूपमुक्तं यन्त्रप्रकरणे—यन्त्रस्वरूप कहा है यन्त्र प्रकरण में—
कौबेरवातविषसंशोषणार्थं यथाविधि ॥ ७६ ॥
दिशाम्पति प्रवक्ष्यामि यन्त्र लोकोपकारकम् ।
चतुरश्रं वर्त्तुलं वा पीठं कुर्याद् यथाविधि ॥ ७७ ॥
पार्वणीदारुणा द्रावसंस्कृतेन त्रिधा क्रमात् ।
कौबेर वायु के विष का संशोषण करने के लिये यथाविधि लोकोपकारक दिशाम्पति यन्त्र
कहूंगा, चौकोन या गोल पीठ यथाविधि करे पार्वणी काष्ठ से जो द्राव से ३ वार संस्कृत की गई
हो ॥ ७६-७७ ॥
पार्वणीदारुस्वरूपमुक्तमगस्त्यलहर्याम्-पार्वणीदारु का स्वरूप कहा है अगस्त्यलहरी में-
प्रति पर्वणि पर्वाणि प्रभवेद्दिक्षुदण्डवत् ꣹ ॥ ७८ ॥
यस्मिन्नविरलं तत्तु पार्वणीदार्वीतीरितम् ।
रक्तवर्णं दीर्घपर्णं रक्तपुष्पविराजितम् ॥ ७६ ॥
सूक्ष्मकण्टकसंयुक्तं भुजङ्गविषनाशनम् ।
अत्यन्तकदुसारं च भूतप्रेतविनाशनम् ॥ ८० ॥
कृष्णपक्षे मुकुलितं पार्वणीदारुलक्षणम् । इत्यादि ।
जिस वृक्ष के प्रतिपर्व में पर्व—स्वसदृश भाग गन्ने के समान अविच्छिन्न रूप में हों वह
पार्वणी दारु कही गई है । लाल रंग वाला लम्बे पत्ते वाला लाल फूलों से विशेष भूषित सूक्ष्म कांटे
वाला सर्प विष नाशक अत्यन्त कडवे मध्य भाग वाला भूत प्रेत निवारक कृष्णपक्ष में खिलने वाला
पार्वणी दारु का लक्षण है ।
एकोनविंशत्संख्याकदपणेन यथाविधि ॥ ८१ ॥
बाहुमात्रं नालशङ्कु नवद्वारसमन्वितम् ।
नवकीलसंयुक्तं नवतन्त्रिभिरन्वितम् ॥ ८२ ॥
कृत्वा संस्थापयेत् पीठमध्ये शास्त्रविधानतः ।
तन्मूलदेशतस्सम्यगीशान्यादिक्रमात् ततः ॥ ८३ ॥
अष्टदिक्ष्वष्टकेन्द्राणि कल्पयेत् समसख्यया ।
विस्तृतास्यं सूक्ष्ममूलं मध्ये वर्त्तुलरूपकम् ॥ ८४ ॥
वितस्तिद्वयमायामं षड्वितस्त्युन्नत तथा ।
वितस्त्रित्रयमायामवर्त्तुलं नालमध्यमे ॥ ८५ ॥
꣹ 'प्रभवेत्' वचनव्यत्यय ।