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सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 220, कुल 368 में से

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पृष्ठ 220

शब्दाकर्षणयन्त्र ] [ १६७
ध्वनि को आकर्षित करने वाले घण्टार लोहे † से बना हुआ अद्भुत तारों के गुच्छे से युक्त
शब्द को प्रकट करने के डन्मुख शलाकाओं वाले दृढ दोनों पिण्डों—गोलों के मध्य में द्रावक के ऊपर
यथाक्रम रखकर क्वणकदर्पण—शब्द करनेवाले के आवरण को क्रम से करके अङ्गुष्ठमात्र चक्र की तीन
ग्रन्थियों के मूल में लगावे वहां से आरम्भ करके शलाकापर्यन्त यथाविधि अत्यन्त सूक्ष्म कोमल तारों को
क्रम से जोड़ दे इन तारोंको सूक्ष्मछिद्रवाले नीचले बिल में को घुमाकर क्वणादर्शदर्पण से रची करण्ड
सन्दूकची या डलिया के ऊपर रखवे, द्रोणमुख वाला—हाण्डी मुखवाला पात्र उसी क्वणादर्श से किया
हुआ हो उस के ऊपर क्रम से—॥ ११६–१२० ॥
संस्थापयेत् ततस्तस्मिन् पूर्वपश्चिमयोस्तथा ।
दक्षिणोत्तरतश्चैव रुदन्तीरटिकामिधान् (दान् ?) ॥१२१॥
मयोजयेन्मणीन् शुद्धान् चत्वारि समरेखत ।
मणिमन्तरत कृत्वा सूक्ष्मनालान् यथाविधि ॥ १२२ ॥
दर्पणेन कृतान् शुद्धांश्चतुर्दिक्षु दृढ यथा ।
स्थापयेदथ तस्योर्ध्वप्रदेशे शब्दफेनकम् ॥ १२३ ॥
तस्योपरि यथाशास्त्रं कुर्यादावरणं तत ।
तस्मिन् सम्धारयेत् सूक्ष्मशङ्कून् सुशोधितान् दृढान् ॥१२४॥
पश्चात् क्वणादर्शकृतावरणं तत्प्रमाणत ।
तस्योपरि न्यसेदष्टसूक्ष्मछिद्रसमन्वितम् ॥ १२५ ॥
—उसमें संस्थापित करे, पूर्व पश्चिम में तथा दक्षिण उत्तर रुदन्तीरटिका नामक चार शुद्ध
मणियों को समरेखा से जोड़ दे, मणि को बीच में करके दर्पण से बना हुआ शुद्ध सूक्ष्म नालों को
यथाविधि चारों दिशाओं में स्थापित करे उसके ऊपरि प्रदेश में शब्दफेन—शब्द सस्कारशक्तियुक्त चक्र
रख दे, उस के ऊपर यथाशास्त्र आवरण करे पुन उस में शोधित सूक्ष्म शङ्कओं को लगावे, पश्चात्
क्वण आदर्श से किए आठ सूक्ष्मछिद्र युक्त आवरण उस प्रमाण से उसके ऊपर रखे ॥ १२१–१२५ ॥
एकैकछिद्रमार्गेणान्तश्शङ्कुमुखान्तरात् ।
सूक्ष्मतन्त्रीन् समाहृत्य न्यसेदावरणोपरि ॥ १२६ ॥
तन्मध्येऽङ्गुलमानेन छिद्र कृत्वा यथाविधि ।
सिंहास्यदण्डनाल च मध्ये संस्थापयेत् क्रमात् ॥ १२७ ॥
वातापकर्षक चक्र षोडशारं सुसूक्ष्मम् ।
न्यसेत् तस्य पुरोभागे तन्त्रीसवेष्टित यथा ॥ १२८ ॥
एव क्रमेणाष्टदिक्षु सूक्ष्मचक्राणि विन्यसेत् ।
पूर्वोक्तसिंहास्यमुखेष्टदिक्षु यथाक्रमम् ॥ १२६ ॥
प्रदक्षिणावर्तकीलचक्रान् संस्थापयेदथ ।
शुद्धवाजीमुखलोहकृतवर्तु लपट्टिकान् ॥ १३० ॥
† घण्टार लोहा पीछे कहा गया है कृत्रिम है।