बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविशाम्यतियन्त्र ] [ २५१
फिर वातपा मणिको लेकर मध्य में रखे, अंशुपादर्पण उसके सामने बाले भाग में रखे ।
कौबेर वातसंसर्ग दिशाओं के भेद से स्वतः यदि सूर्यकिरणों में थोड़ा भी हो जावे तो अंशुपादर्पण का
मुख दिशा के अनुसार नीला लाल प्रभा मिश्रित वर्ण वाला हो जाता है अन्यथा नहीं । दर्पण के अन्दर
सन्धान से उसे यथाविधि जानकर नौ कीलों को अति वेग से घुमा दे एक एक कील के वेग से और
उस उस नाल के अन्दर शक्तिसंयोजन से शशचर्म में सम्मार्थिणूक = टक्कर लेने वाली अतिमहती
कोई शक्ति उत्पन्न हो जाती है उस शक्ति को मारूज्जुलिकावल्कल लेकर वेग से पद्मापत्रों पद्मापत्र की पंख-
डियों में प्रेरित करता है वे पद्मापत्र तारों के द्वारा उस शक्ति को वातपामणि को अपनी शक्ति से प्रेरित
करे वातपा मणि कौवेरविष वायु को सम्मार्षिणका के सहाय से अतिवेग से पीती है पश्चात् पद्म के
आठ दलों में स्थित नालमुख के अन्दर कौवेरवात से सम्बन्ध रखने वाली विषशक्ति बाह्य वायु में लय
को प्राप्त हो जाती है पश्चात् विमान के चालक यात्रियों को आरोगता हो जाती है अत विशाम्पति
यन्त्र यथाविधि कहा है ॥ ९२-१०१ ॥
एकोनविंशं दर्पणमुक्तं दर्पणप्रकरणे- दर्पण प्रकरण में १६वा दर्पण कहा है-
उरगत्वक् पद्ममुख व्याघ्रदन्त च सैकतम् ।
लवण पारद सीस चेति निर्यासवृत्तिका ॥ १०२ ॥
स्फाटिक रुरुक वीर मृणाल रविकर्पटम् ।
चञ्चोल बालज पञ्चप्राणक्षा(सा?)र शषोडुपम् ॥ १०३ ॥
त्रिसप्तपञ्चद्वात्रिंशच्चतु पञ्चदशस्तथा ।
द्विपञ्चाविंशतिस्सप्तत्रिंशत् पञ्चदशस्तथा ।
चत्वारिंशत् त्रयोविंशत् सप्तविंशत् त्रयोदश ॥ १०४ ॥
एकोनविंशाष्टदशभागसंख्यानुसारत ।
त्रिंवार शोधयित्वाष्टादशवस्तून यथाविधि ॥ १०५ ॥
मत्स्यमूषामुखे सम्यगापूर्य विधिवत् तत ।
नलिकाकुण्डमध्ये सस्थापयित्वा दृढ यथा ॥ १०६ ॥
एकोनशतकथ्योष्णप्रमाणेन यथाविधि ।
गालयेद् गोमुखीभस्त्रात् पश्चाद् यन्त्रमुखे न्यसेत् ॥ १०७ ॥
एव कृते पिङ्गलाख्यदर्पण भवति दृढम् ।
एतदेकोनविंशत्संख्याकमिति शास्त्रे भिर्वार्णतम् ॥ १०८ ॥
उरगत्वक् = नागकेसर वृक्ष की छाल या सांप की केंचुली, पद्ममुख ?-थासा ? या जवाकुसुम ?
या लोहा विशेष, व्याघ्रदन्त ?, सैकत-शिंगरफ, लवण, पारा, सीसा, निर्यास-लाख ?, मृत्तिका-
सौराष्ट्र मृत्तिका ? या गेरू ?, स्फाटिक-स्फाटिक मणि, रुरुक-वनरोहेडा या हरिण शृङ्ग, वीर-लोहा ?
या सिन्दूर, मृणाल-खस (ठण्डी घाममूल ) या कमलमूल, रविकर्पट ?-ताम्बे का पत्तर या आख की