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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 227

२०४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
सप्तद्वाविंशति पञ्चचत्वारिंशत् त्रयोदश ॥४०॥
द्वात्रिंशदेकोनविंशदष्टत्रिंशच्चतुर्दश ।
द्वाविंशदष्टत्रिंशद्द्विचत्वारिंशत् त्रयोदश ॥४१॥
पञ्चविंशन्नव तथा त्रयोविंशद् यथाक्रमम् ।
संगृह्य विधिवच्छब्दफेन पक्वात् प्रकल्पयेत् ॥४२॥
आकाश से बाडवाश्व गर्जना ७, जल से गीलापन या वेग से बहन श्वास-सैसैं करना २२,
खमुख--आकाशगोल से वाताग्नि वायु की सनसनाहट करनेवाली अग्निशक्ति ४५ को, उसी प्रकार शिला
चट्टानपरतों या परस्पर घटनसे अनुकार ध्वनि १३को, किरणों की किरणस्फोटन नामकशक्ति--विदारण-करने
वाली एवं अतिसूक्ष्म व्यापकशब्दशक्ति ३२को, शैवाल-शैवाल का वल्कल--पद्मकाष्ठ पदमाखकी छाल या
या शैवाल--जलकाई का उपरिभाग ?, १६ भाग, समुद्रफेन ३८ भाग, ग्रीवाक ? १४ भाग, कदाचित् बांस ?,
जलपाक ? २२ भाग कदाचित् शंख, माल्लुल ? मञ्जुल--मजीठ ? ३८ भाग, तृण--दर्भ ४२ भाग, या माल्लुल-
तृण ३८ भाग ?, गुम्भारक ?, ११ भाग, रुद्रशल्य ? २५ भाग, गोकर्ण--अश्वगन्ध या वाजीवल्ली ? ६भाग,
मुसलि--तालमूल १३ भाग, इनको विधिवत् लेकर पके रस से—शब्दफेन पकाए हुए से कल्याण
हो जाए ॥३८–४२॥
उक्तं हि तत्रैव--कहा ही वहां —
शैवालादिमुसल्यान्तान् वस्तून् संशोध्य शास्त्रतः ॥४२॥
तत्तत्प्रमाणानुसारात् यन्त्रे फेनाकरे क्रमात् ।
संस्थाप्य पाचयेत् सम्यग्यथाविधि दिनत्रयम् ॥४३॥
घटिकार्धादिकंवार कीली सङ्कलनाभिधाम् ।
भ्रामयेद्वेगतो नित्यं फेनवद् भवति क्रमात् ॥४४॥
यन्त्रात् फेनमाहृत्य शक्तिसम्मेलनाभिधे ।
यन्त्रे नियोजयेत् पश्चान्नालषट्कैर्यथाक्रमम् ॥४५॥
शैवाल से आदि कर मुसलीपर्यन्त वस्तुओं को शास्त्र से शोधकर उस उसके मान के
अनुसार फेन करनेवाले यन्त्र में क्रमशः रख तीन दिन तक ठीक पकावे आधी घड़ीमें एकवार सङ्कलननामक
कीली को घुमावे, नित्य वेग से घुमावे तो क्रम से फेन जैसा हो जाता है, यन्त्र से फेन लेकर शक्ति-
सम्मेलन नामकयन्त्र में नियुक्त कर दें पश्चात् ६ नालों से यथाक्रम–॥४२-४५॥
प्राणानादिस्फोटनांश्यशक्त्यन्त क्रमशस्सुधी ।
तत्तत्संख्यानुसारेण शक्तिमेकैकतं क्रमात् ॥४६॥
पूर्वोक्तनालतो यन्त्रस्थितफेनोपरिक्रमात् ।
सम्मेलयेद् यथाशास्त्र सावधानान्मुहुर्मुहुं ॥४७॥
समीकरणचक्रस्य कीलकं पट्टिकान्वितम् ।
पार्श्वे यन्त्रस्य विधिवद् भ्रामयेत् कालमानतः ॥४८॥
मन्दोष्णात् पाचयेत् पश्चादेवं यथाक्रमम् ।
प्राणानादिस्फोटनान्तशक्तिसंयोजन बुधः ॥४९॥