बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
प्राणकुण्डलिनीतन्त्र ] [ १८१
सव्यासपसवचलनकीलकद्वयशोभितम् ।
साङ्केतार्थं तन्मध्ये शब्दनालेन सयुतम् ॥५७॥
पक्षाघातकचक्राद्यैस्सकीलैस्सशलाककै ।
संशोभित रक्तवर्णं नालत्रयमत परम् ॥५८॥
पीठस्थशकुन पूर्वं ईशाग्न्याग्नेयकेन्द्रत' ।
तथैव पश्चिमदिशि मध्यकेन्द्राद् यथाक्रमम् ॥५९॥
यानकुण्डलिनीमध्यमार्गस्थानावधिकमात् ।
सन्धायवृत्तादिकीलेशङ्कुभिस्सुदृढ यथा ॥३०॥
उक्त विद्युत् धूमवात के मार्ग सम्धीनाल मुख अवधि तक प्रकाशक्रिया प्रकट करने और
तिरोभावक्रिया बन्द करने के साधनरूप हस्तचक्रों से विराजित सीधी उल्टी गति देने वाली दो
कीलों—पेंचों से शोभित उनके मध्य में संकेत देने वाले शब्दनाल से युक्त पक्षाघात—एक पक्ष में
गति प्रेरणा देने वाले कीलसहित और शलाकाओंसहित चक्र आदि से युक्त लाल रंग की तीन नालें
पीठस्थ शंकु के पूर्व में ईशान्य आग्नेय केन्द्र से पश्चिम दिशा में मध्य मार्ग के स्थान तक क्रम से लगा
कर जोड कर घूमने वाली कीलों के शंकुओं से जैसे सुदृढ—॥ ५६-६० ॥
संस्थाप्य विधिवत् केन्द्रत्रयमूलावधि दृढम् ।
चालनादिक्रियास्सर्वेहस्तचक्रैर्यथाक्रमम् ॥ ६१ ॥
तत्तत्कीलचलनेन तत्तन्नालमुखान्तरात् ।
भवेत् तेन व्योमयानसञ्चार प्रभवेत् तत् ॥ ६२ ॥
उक्तकेन्द्राष्टस्थानमध्यपीठाद् यथाविधि ।
एकेकनालतन्त्री सरन्ध्रा दृढतरा क्रमात् ॥ ६३ ॥
सन्धायं शङ्कुन पूर्वकेन्द्रपीठान्तरादित ।
पूर्वोक्तनालत्रयोर्ध्वभागे वातायनान्तरे ॥ ६४ ॥
सन्धारयेत् तदग्राणि कीलकैस्सुदृढ यथा ।
यानसञ्चारोपयोग कृत्वा शक्तित्रय तथा ॥ ६५ ॥
—हो ऐसे विधिवत् तीन केन्द्र के मूल तक संस्थापित करके चालन आदि क्रियाएं सब हस्त-
चक्रों से यथाक्रम उनकी कीली चलाने से उस उस नालमुख के अन्दर से हो सके फिर उससे विमान-
सञ्चार बन सके । उक्त केन्द्र के आठ स्थान के मध्य पीठ से यथाविधि छिद्रसहित दृढ एक एक नालतार
को शंकु से पूर्व केन्द्र के पीठ के अन्दर से जोड कर पूर्वोक्त तीन नालों के ऊपरि भाग में वातायनयन्त्र
के अन्दर लगावे उनके अग्रभाग कीलों से दृढ विमानचालन में उपयोग करके तोनों शक्तियों—॥६८-६५॥
शक्तित्रयावशिष्टाश समप्रमतिवेगत ।
उक्ताष्टनालरन्ध्रेषु योजयेत् कोलचालनात् ॥ ६६ ॥
१८२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
ततश्शक्तित्रयं गत्वा आकाशे पतति स्वयम् ।
पश्चाद् वातप्रवाहे संम्मिलित्वा नाशमेधते ॥ ६७ ॥
तस्माद् विमानसञ्चारो अनायासेन सिध्यति ।
—तीनों शक्तियों के अवशिष्ट समग्र अंश को अतिवेग से कहे हुए आठ नालों के छिद्रों में कील
पच चला कर लगा दे फिर तीनो शक्तियां आकाश में पहुंच कर गिर जाती हैं—स्वयं नष्ट हो जाती हैं
पश्चात वायुप्रवाह में मिल कर नाश को प्राप्त हो जाती हैं अत विमानसञ्चार अनायास सिद्ध होता
है ॥ ६६-६७ ॥
अथ शक्त्युद्गमयन्त्रनिर्णय — अथ शक्त्युद्गम यन्त्र का निर्णय देते हैं—
एवमुक्त्वा प्राणकुण्डलिनोयन्त्रमत परम् ।
अथ शक्त्युद्गमयन्त्रस्सङ्ग्रहेण निरूप्यते ॥ ६८ ॥
इस प्रकार प्राणकुण्डलिनी यन्त्र कहकर उससे आगे शक्त्युद्गम यन्त्र संग्रह से निरूपित
किया जाता है ॥ ६८ ॥
उक्तं हि खेटविलासे—खेटविलास में कहा है—
ग्रहभानामष्टशक्तीर्महावारुणीशक्ति ।
आकृष्यन्ते पौर्णमायां कार्त्तिके मासि वेगत ॥ ६९ ॥
आकाशकक्ष्यपरिधिकेन्द्रेष्वथ यथाक्रमम् ।
सप्तत्रिंशोत्तरशतकेन्द्ररेखापथि क्रमात् ॥ ७० ॥
जलपिञ्जूलिकाशक्त्याकर्षणादतिवेगत ।
तच्छक्तयोऽष्टौ सर्वत्र व्याप्नुवन्ति विशेषत ॥ ७१ ॥
अन्योन्यशक्तिसंसर्गाद्धिमोद्रेको भयङ्कर ।
भवेत् पश्चात् त्रिधा तद्विभागस्स्याच्छक्तिभेदत ॥ ७२ ॥
तेष्वेकांशो शीतरसरूपवातो भवेत् तत ।
अपरो जलशो (सी ?) तस्य सीकराकारमेघते ॥ ७३ ॥
अन्यो भवेद् वातशीतरसप्रवाहिक क्रमात् ।
यदा यानस्समायाति केन्द्ररेखापथि क्रमात् ॥ ७४ ॥
वातशीतरसप्रवाहिकशक्तिस्स्ववेगत ।
विमानशक्तिसर्वस्वमपकर्षति तत्क्षणात् ॥ ७५ ॥
ग्रह नक्षत्रों की आठ शक्तियां महावारुणी शक्ति से कार्तिक मास में पौर्णमासी में वेग से
खींची जाती है, आकाशकक्षा सम्बन्धी परिधि केन्द्रों में यथाक्रम १३७ वें केन्द्ररेखामार्ग में जल
की पिनी रुई जैसी भाप शक्ति—अभ्रशक्ति के आकर्षण से अतिवेग से वे आठ शक्ति सर्वत्र
विशेष व्याप जाती हैं, एक दूसरे के शक्तिसंसर्ग से भयंकर हिम का उत्थान हो जावे पश्चात् शक्तिभेद
से उसका विभाग तीन प्रकार हो जावे, उनमें एक अंश शीतरसरूप वायु—ठण्डी भापमय वायु हो
तृतीय अध्याय: दर्पण, मणियाँ एवं विद्युत्-शक्ति सञ्चालन
शक्त्युद्गमयन्त्र ] [ १८३
फिर दूसरी शीत जल की फुशार रूप को प्राप्त हो जाती है, तीसरी शीत वायुधारा को प्रवाहित करने
वाली शक्ति । जब विमान केन्द्ररेखा के नीचे के मार्ग में आता है तो शीतवायुधारा को प्रवाहित करने
वाली शक्ति स्ववेग से विमानशक्ति के सर्वस्व-सामर्थ्य को तुरन्त खींच लेती है ॥ ६६-७५ ॥
तथा शीतरसरूपवातशक्तिस्स्वभावत ।
यानस्थसर्वयन्तॄणा बलमाकर्षति क्रमात् ॥ ७६ ॥
जलस्य सीत्कराकारशक्ति पश्चात् स्ववेगत ।
यानमावृत्य सर्वत्रादृश्य कुर्वीत नान्यथा ॥ ७७ ॥
बलापकर्षणाद् यानपतन तद्गदेव हि ।
यन्तॄणा प्राणहानिश्च यानागोचरमेव च ॥ ७८ ॥
प्रभवेदेककालेन कष्टात्कष्टतर तत ।
तस्मात् तत्परिहाराय यन्त्र शक्त्युद्गमाभिधम् ॥७९॥
विमाननाभिकेन्द्रस्य मध्ये संस्थापयेद् दृढम् ॥ इत्यादि ॥
और दूसरी शीतरसरूप वायु-ठण्डी भापमय शक्ति अपने स्वभाव से विमान में स्थित यात्रियों
के बल को खींच लेती है, तीसरी जल की फुवारा के आकार वाली शक्ति विमान को घेरकर सब ओर उसे
अदृश्य कर देती है । 'इस प्रकार तीनों शक्तियों के द्वारा' बल को खींचलेने से विमान गिर जाता है
यात्रियों की प्राणहानि और विमान का अदृश्य-लापता हो जाना एक साथ कष्ट से अधिक कष्ट हो जावे ।
अत उसके परिहार के लिये शक्त्युद्गमनामकयन्त्र विमाननाभि के केन्द्र मध्य में दृढ़रूप से संस्थापित
करे ॥ ७६-७९ ॥
उक्त हि खेटसंग्रहे—कहा है खेटसंग्रह ग्रन्थ में -
कुजार्कशनिजाम्भारिबुधमाण्डलिको रुरु ।
विश्वप्रकाशकश्चेति ग्रहाश्चाष्टावितीरिता ॥ ८० ॥
कृत्तिका शततारश्च मखामृगशिरास्तथा ।
चित्राश्रवणपुषाश्वीत्यष्टभा इति निर्णता ॥ ८१ ॥
स्वस्वसञ्चारपरिधिमण्डलकेन्द्ररेखामु चारत ।
एते ग्रहाश्च नक्षत्रास्सामीप्य शरदिक्रमात् ॥ ८२ ॥
कुज-मङ्गल, अर्क-सूर्य, शनि, जाम्भारि ?, -शुक्र?, बुध, माण्डलिक-चन्द्रमा, रुरु ?, विश्वप्रका-
शक-बृहस्पति ये आठ ग्रह कहे गए हैं। कृत्तिका, शतवार-शतभिषक्, मखा-मघा, मृगशिरा-मृगशीर्ष
चित्रा, श्रवण, पूषा, अश्विनौ ये आठ दीप्त नक्षत्र निर्णय किए हैं। ये ग्रह नक्षत्र अपने अपने सञ्चार-
गतिमार्ग के परिधिमण्डल की केन्द्ररेखाओं में गतिक्रम से क्रमश शरद् ऋतु में समीपता को प्राप्त
हुआ करते हैं ॥ ८०-८२ ॥
हस्तलेख कापी संख्या १३—
प्राप्यन्ते चारक्रमेण तेन शक्त्यष्टक भवेत् ॥ इत्यादि ॥
प्राप्त होते हैं चार-सञ्चारक्रम से उससे शक्त्यष्टक होवे ।
चारनिबन्धनेपि—चारनिबन्धनग्रन्थ में भी कहा है—
गणितोक्तप्रकारेण ग्रहभानां यथाक्रमम् ।
स्वस्वपरिधिमण्डलकेन्द्रे रेखानुसारत ॥१॥
चारातिचारादिवशात् सामीप्य केवलं भवेत् ।
शक्ति-सङ्घर्षणं तेन भवेदन्योन्यमद्भुतम् ॥२॥
एवमेकैकनक्षत्रग्रहायोश्शक्तिसङ्घर्षणात् ।
शक्तयोष्टौ प्रजायन्तेत्यन्तशीतघनात्मिका ॥३॥ इत्यादि ॥
गणित-गणित ज्योतिष में कहे प्रकार से ग्रह नक्षत्रों का यथाक्रम अपने अपने परिधिमण्डल
केन्द्र में रेखा के अनुसार चार अतिचार-गति सञ्चार आदि के बश केवल-अधिक समीपता हो जावे
तो उससे परस्पर अद्भुत शक्तिसंघर्ष हो जावे, इस प्रकार एक एक ग्रह और नक्षत्र के शक्तिसंघर्ष से
अत्यन्त शीतमूर्तिरूप आठ शक्तियां उत्पन्न हो जाती हैं ॥१ - ३॥
उक्तं हि शक्तिसर्वस्वे—शक्तिसर्वस्व में कहा है—
कृत्तिकाकुजयोश्शक्तिसङ्घर्षणवशात् स्वत ।
काचिच्छक्तद्युद्गमा नाम शक्तिस्सञ्जायते क्रमात् ॥४॥
तथैव शततारार्कशक्तिसङ्घर्षणेन च ।
शीतज्वालामुखी नाम काचिच्छक्ति प्रजायते ॥५॥
मघा (खा ?) शन्योश्शक्तिसङ्घर्षणवेगात् तथैव हि ।
शैत्यदष्ट्राभिधा (दा?) शक्ति र्जायते सर्वतोमुखा ॥६॥
तथा मृगशिरादम्भारिशक्त्योर्घर्षणेन च ।
सञ्जायते शीतरसवातशक्तिर्महोज्वला ॥७॥
तथैव चित्रा (त्त ?) बुधयोश्शक्तिसङ्घर्षणक्रमात् ।
शैत्यहेमाभिधा (दा?) काचिज्जायते शक्तिरुज्ज्वला ॥८॥
शक्त्युद्गमयन्त्र ] [ १८४
तथा श्रवणामण्डलयोश्शक्तिसङ्घर्षणक्रमात् ।
जायते स्फोरणी नाम शक्तिश्शीतप्रवाहिका ॥६॥
कृत्तिका नक्षत्र और मङ्गलग्रह की शक्तियों के संघर्षवश स्वतः शक्त्युद्मा नामक कोई शक्ति
प्रकट हो जाती है वैसे ही शतभिषक् नक्षत्र और सूर्य की शक्तियों के संघर्ष से शीतज्वालामुखी नाम
की कोई शक्ति प्रकट हो जाती है वैसे ही मघा नक्षत्र और शनि ग्रह की शक्तियों के संघर्ष से शैत्यदंष्ट्रा
नामक शक्ति सर्वतोमुख उत्पन्न हो जाती है । तथा मृगशिरा नक्षत्र और ब्रम्भारि-प्रजापति या बृहस्पति ?
की शक्तियों के संघर्ष से शीतरसवातशक्ति महोज्ज्वला उत्पन्न हो जाती है । वैसे ही चित्रा नक्षत्र और
बुध ग्रह की शक्तियों के संघर्ष से शैत्यहेमा नामक कोई उज्ज्वल शक्ति उत्पन्न हो जाती है । तथा
श्रवण नक्षत्र और मण्डल-मण्डलवृत्तवाले चन्द्र ? की शक्तियों के संघर्ष से स्फोरणी नामक शीतप्रवाहिका
शक्ति उत्पन्न हो जाती है ॥४-६॥
पूषारुरुकयोश्शक्तिसङ्घर्षणवशात् तथा ।
सजायते शीतघनरसशक्तिर्महोर्मिला ॥१०॥
विश्वप्रकाशाश्विन्योश्च शक्तिसङ्घर्षणवशात् स्वतः ।
शैत्यमण्डकिनी नाम काचिच्छक्ति प्रजायते ॥११॥
शैत्योद्गमनाभिधा शक्तिश्शीतज्वालामुखी तथा ।
शैत्यदंष्ट्रा शीतरसज्वालाशक्तिस्तथैव च ॥१२॥
शैत्यहेमा स्फोरणी च शीतघनरसात्मिका ।
शैत्यमण्डकिनी चेति शक्तयोष्टौ प्रकीर्तिता ॥१३॥
तास्वान्योन्ययोगेन ऋतुकालानुसारत ।
भिद्यन्ते षट् प्रकारेण शक्तिभेदस्ततोभवेत् ॥१४॥
पूषा-रेवती नक्षत्र और रुरुक ? की शक्तियों के संघर्षवश शीतघनरसशक्ति महोर्मिला-
नदीतरङ्गोंवाली उत्पन्न हो जाती है, विश्वप्रकाश ? और अश्विनियों की शक्ति के संघर्षवश शैत्यमण्डू-
किनी नामक कोई शक्ति प्रकट हो जाती है । शैत्योद्गमनामक शक्ति, शीतज्वालामुखी, शैत्यदंष्ट्रा,
शीतरसज्वालाशक्ति, शैत्यहेमा, स्फोरणी, शीतघनरसात्मिका, शैत्यमण्डूकिनी ये आठ शक्तिया
कही हैं वे अन्योन्य के सम्बन्ध से ऋतुकालानुसार भिन्न भिन्न होती है शक्तिभेद तो छ प्रकार
का है ॥१०-१४॥
तदुक्तमृतुकल्पे—वह ऋतुकल्प ग्रन्थ में कही है—
वसन्ते पञ्चधा ग्रीष्म ऋतो सप्तप्रकारत ।
अष्टधा वार्षिके तद्वत् त्रिधा शरदि वर्णित ॥१५॥
हे (है?) मन्ते दशधा प्रोक्तो द्विधा शिशिरतौ ❄ क्रमात् ।
एव क्रमेण भिद्यन्ते शक्तयष्षट् प्रकारत ॥१६॥
❄ शिश्रऋतौ सस्तेलेले ।
१८६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
त्रिधा यदुक्तं शरदि शक्तिभेदोत्र शास्त्रतः ।
तस्स्वरूप प्रसङ्गत्या सग्रहेण निरूप्यते ॥१७॥
पश्चादादित्यकिरणसम्पर्कात् ता यथाक्रमम् ।
विभज्यन्ते त्रिधा सम्यक् शक्तिसम्मेलनक्रमात् ॥१८॥
वसन्त में पांच प्रकार की ग्रीष्म ऋतु में सात प्रकार से वर्षा ऋतु में आठ प्रकार की शरद्ऋतु
में तीन प्रकार की कही हैं । हेमन्त ऋतु में दश प्रकार की कही शिशिर ऋतु में दो प्रकार की । इस क्रम
से शक्तियां छ प्रकार से विभक्त होती हैं । शरद् ऋतु में जो शक्तिभेद तीन प्रकार का है उसका स्वरूप
प्रसङ्ग से संक्षेप से निरूपित किया जाता है, पश्चात सूर्यकिरण के सम्पर्क से यथाक्रम तीन प्रकार से
विभक्त हो जाती हैं शक्तिसम्मेलन के क्रम से ॥ १७-१८ ॥
तासां नामानि शास्त्रोक्तप्रकारेणाभिवर्ण्यते ।
शीतज्वाला शैत्यदंष्ट्रा तथा शैत्योद्गमा क्रमात् ॥ १९ ॥
सम्मिलित्वा शीतरसवातशक्तिरभूत् स्वतः ।
शक्त्युद्गमयन्त्र ] [ १८७
शीतघ्नदर्पणात् पश्चात् कुर्यान्नालत्रय क्रमात् ।
यन्त्रस्थानादूर्ध्वमुखे पार्श्वयोरुभयोरपि ॥ २७ ॥
विमानयन्ता (स्वो ?) वरणावावृत्यैव यथाविधि ।
नालत्रय विमानेस्मिन् स्थापयेत् सुदृढ यथा ॥ २८ ॥
शीतवातायनीनालतन्त्रीन् नालत्रयान्तरे ।
सन्धायैतत्तथैवाग्रे भ्रामणीचक्रमप्यथ ॥ २६ ॥
यावच्छक्तित्रय व्योमयानमावृत्य वेगत ।
यानशक्ति हरेत् तावद् यानावरकत क्रमात् ॥ ३० ॥
उपर्युक्त घातक तीन शक्तियों के विनाशार्थ यन्त्रशक्ति-उद्गमानामक को सङ्क्षेप से यथाशास्त्र
यथामति निरूपित की जाती है । विमान के यात्रियों के सप्रमाण आदि में शैत्यग्राहक लोहे से दो आव-
रक-रक्षक करे । बन्द करने खोलने के साधनभूत दो कीलबन्धन भी विमानावरण के आगे और सामने
अन्तवाले भाग में शास्त्ररीति से दोनों के मध्यदण्ड के अग्रभाग में सन्धिकोली को बनावे । पश्चात् शीत-
नाशक दर्पण से क्रम से तीन नाल करे चालक के स्थान के ऊपर की ओर दोनों पार्श्वों में भी करे ।
विमानचालक दो आवरणों को डालकर यथाविधि इस विमान में तीन नाल स्थापित करे, शीतवाता-
यनीनाल तारों को तीनों नालों के अन्दर लगावे तथा आगे भ्रामणीचक्र भी लगावे । तीनों शक्तियों के
अनुरूप विमान को वेग से आवृत्त कर विमानयान की शक्ति को हरण करे । तब तक विमानयान के
आवरक से क्रमश —॥ २६-३० ॥
निवारयेत् तच्छक्तिवेग निश्शेष शीघ्रत क्रमात् ।
वेगात् सचालयेद् विकसनकीली यथाविधि ॥ ३१ ॥
आदावावरक तेन यन्तॄणा प्रभवेत् स्वत ।
पश्चाद् विमानावरक समग्र भवति ध्रुवम् ॥ ३२ ॥
ततश्शक्तित्रय व्योमयानस्यावरकोपरि ।
आमूलाग्र व्याप्य वेगात् तस्योद्वेग करिष्यति ॥ ३३ ॥
पश्चात् सम्भ्रामयेद् वेगाद् भ्रामणीचक्रमद्भुतम् ।
चक्रवेगस्समाहृत्य शक्तिवेग शनैश्शनै ॥ ३४ ॥
शीतवातायनीनालतन्त्रीणा सम्मुख यथा ।
प्रेषयेत् तन्त्रिमूलकीलकान् भ्रामयेत्तत ॥ ३५ ॥
तच्छक्तित्रयवेगस्तु पश्चान्नालत्रयान्तरे ।
प्रविश्य बाह्याकाशेथ तन्मुखाल्लयमेधते ॥ ३६ ॥
यन्तॄणा त्राणन तस्माद् यानरक्षण तथा ।
अहश्यत्वनिवृत्तिश्च प्रभवेदेककालत ॥ ३७ ॥
तस्माच्छक्त्युद्गमनाम यन्त्रमुक्त यथाविधि । इत्यादि ॥
[ १८८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
उस शक्तिवेग को निःशेष शीघ्र निवृत्त करे। विकसनकीली को यथाविधि वेग से सञ्चारित
करे, आदि में यन्त्राक्षों का आवरण स्वत हो जावे । फिर समग्र विमानावरक निश्चित हो जाता है।
फिर विमान यान के आश्रयक के ऊपर तीनों शक्तियां मूल से अग्रभाग तक व्याप्त करके वेग से उसका
उद्वेग करेंगी पश्चात् वेग से अंगुल भ्रामणी कील को घुमावे । चक्रवेग शक्तिवेग को धीरे धीरे इकट्ठे
करके शीतशतायनी नालतारों के सम्मुख प्रेरित करदे तारों के मूल कीलें-पेंच घुमावे उन तीनों शक्तियों
का वेग तो पश्चात् तीन नालों के अन्दर प्रविष्ट होकर बाहिरी आकाश में उस मुख से लय को प्राप्त हो
जाता है । चालक यात्रियों का त्राण तथा यानरक्षण अदृश्यत्व होने वाले संकट की निवृत्ति हो जावे एक
काल में उससे शक्त्युद्गम यन्त्र यथाविधि कहा है ॥ ३१-३७ ॥
शैत्यग्राहक्लोहमुक्तं लोहतन्त्रे — शैत्यग्राहक लोहा लोहतन्त्र में कहा है—
चन्द्रोपल क्रोडिकसोमकन्दे विश्वावसु कौशिकचन्द्रमास्ये ;
वार्ध्र्यश्वक वारुणपञ्चकुड्मले सिंहास्यक शङ्खुलवाक्षुपाले(णे?) ॥ ३८ ॥
एतान् समांशान् परिशोधितान् क्रमात् संगृह्य शुण्डालकमूषमध्ये ।
सम्पूर्य चञ्चुमुखकुण्डगर्भे संस्थाप्य पञ्चाननभस्त्रिकामुखात् ॥ ३६ ॥
वेगेन सङ्गाल्य च तद्रस शनैर्यन्त्रास्यमध्ये परिपूरयेत् क्रमात् ।
एव कृते शुद्धमतीवसूक्ष्म भवेत् सुशैत्यग्राहक्लोहमद्भुतम् ॥ ४० ॥ इत्यादि ॥
चन्द्रोपल—नीलोत्पल—नीलोफर, क्रोडिक—वाराही कन्द या गेण्डे का सींग, सोमकन्द ?,
विश्वावसु ? धातुविशेष ?, कौशिक—कृत्रिम लोहा, चन्द्रमास्य—चन्द्रकान्त पत्थर ?, वार्ध्र्यश्वक
वाध्रयश्वक—तीक्ष्ण लोहा ?, वरुण—वरना वृक्ष या थूहर, पञ्चकुड्मल—पञ्चरत्नो ? सिंहास्य—वासा,
शङ्खुलवा—शङ्खखास—भीमसेनी कपूर, अक्षुपाल—अक्षुगाला, धात्री—आंवला। इन्हें शोधित समानांश
में लेकर शुण्डालकमूषा के मध्य भर कर चञ्चुमुख कुण्ड के मध्य में रख कर पञ्चमुखवाली
भस्त्रिकामूल से वेग से गला कर उसके रस को धीरे से यन्त्र के मुख में भरदे तो शुद्ध अतीवसूक्ष्म सुशैत्य
ग्राहक लोहा हो जावेगा ॥ ३८-४० ॥
शीतघ्नदर्पणमुक्तं दर्पणप्रकरणे—शीतनाशक दर्पण कहा है दर्पणप्रकरण में--
सीस कपालि वरचन्द्रमास्य पञ्चाङ्गुलि शैशिरिक वृणाङ्कम् ।
क्षारत्रय शुद्ध(र ?) सुवर्चल सिञ्चारुण सूक्ष्मतर च वालुकम् ॥ ४१ ॥
बम्भारिक चाञ्जनिक कुरङ्ग पञ्चोर्मिक चन्द्ररस शिवारिकम् ।
एतान् समाहृत्य समाशत क्रमात् विशोधितान् सेहिकमूषमध्ये ॥ ४२ ॥
सम्पूर्य पद्माकरकुण्डगर्भे संस्थाप्य शूर्पोदरभस्त्रिकामुखात् ।
सङ्गाल्य कक्ष्यत्रिशतोष्णात. क्रमाद् रस समाहृत्य शनैर्यथाविधि ॥४३॥
सम्पूरयेद् यन्त्रमुखान्तरे क्रमादेव कृते शुभ्रमतिदृढ लघु ।
भवेत् सुशीतघ्नकदर्पण ततश्शुभ्र सुसूक्ष्म सुमनोहर च ॥ ४४ ॥ इत्यादि ॥
सीसा, कपालि ? कपाली—विडङ्ग या कपाल—तालमखाना, चन्द्रमास्य—चन्द्रकान्त मणि ?,
पञ्चाङ्गुलि—पञ्चांगुल—एरण्ड, शैशारिक—शैशोरिक—निम्बबीज, वृणाङ्क—वृणमूल—गन्धतृण ?,
वक्रप्रसारणयन्त्र ] [ १८६
नौदासर, यवक्षार सज्जीखार, शुद्ध सोञ्चलनमक, सिञ्चाणुक ?, अतिसूक्ष्म बालु । बम्भारिक ?, अञ्जनिक-
सुरमा, कुरङ्ग—अर्कफेरा, पञ्चोर्मिक ?, चन्द्ररस—काम्पिल्लक रस ?, शिवारिक ? इनको समान लेकर
क्रम से शोधकर सेंहिक मूषा बोतल मध्य में भर कर पद्माकर कुण्डगर्भ में रख कर शूर्पोदर भस्त्रिका मुख
से ३०० दर्जे की उष्णता से गला कर पिघला रस धीरे से लेकर यन्त्रमुख के अन्दर क्रम से भर दे ऐसा
करने पर शुद्ध अतिदृढ हल्का शीतघ्न दर्पण सूक्ष्म सुमनोहर हो जावे ॥ ४१-४४ ॥
अथ वक्रप्रसारणयन्त्र.—अब वक्रप्रसारण यन्त्र कहते हैं—
उक्त्वा शक्त्युद्गमयन्त्र सङ्ग्रहेण यथामति ।
वक्रप्रसारण नामयन्त्रमद्य प्रचक्षते ॥ ४५ ॥
शक्त्युद्गम यन्त्र संक्षेप से यथामति कह कर वक्रप्रसारण यन्त्र अब कहते हैं ॥ ४५ ॥
उक्तं हि क्रियासारे—क्रियासार में कहा ही है—
[ १६० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
वर्तुलं कारयेच्चक्रं नालदण्डेन योजितम् ।
यानस्यैषादण्डमूलगुहावर्ते यथाविधि ॥ ५४ ॥
चतुरङ्गलमायामं बाहुमात्रं मनोहरम् ।
क्रकचाङ्गलचक्रेभ्यो'षोडशेभ्यो यथाविधि ॥ ५५ ॥
विमान यान के नाशार्थ शत्रुओं द्वारा डाले हुए दम्भोली आदि आठ यन्त्रों से नाश सम्भव
है उस नाश की निवृत्ति के अर्थ विमान का वक्रप्रसारण कील यन्त्र यहां कहते हैं। लोमश—कसीस,
अश्वत्थ सञ्जात-पीपल की लाख या गोन्द, शुल्व – ताम्बा १६ भाग, लघु-काला अगर ३ भाग, छ्विङ्का-लोह
विशेष या जस्ता ?, ५, आञ्जनक—सुरमा १ भाग मिला कर १०० दर्जे की उष्णता से गलावे, फिर यह
आरावाला ताम्र स्वर्ण के आकार का हल्का दृढ हो जाए, ३ बालिश्त लम्बा ३ बालिश्त ऊंचा गोल
चक्र करावे नालदण्ड से युक्त करे यान के ईषादण्ड मूल गहरे घेरे में यथाविधि ४ अंगुल मोटा बाहु-
मात्र लम्बा मनोहर १६ क्रकचांगुलचक्र—आरांगुल वाले चक्रों से यथाविधि—॥ ४६-५५ ॥
प्रतिष्ठितं तैलशुद्धं दण्डद्वयमुखान्तरे ।
चक्रमूलं समारभ्य यद्दण्डान्तरतं क्रमात् ॥ ५६ ॥
यानस्यैषादण्डमूलगुहावर्तस्थनालयो ।
अष्टाङ्गलचक्रेभ्य कृतमार्गानुसारत. ॥ ५७ ॥
त्रिपर्वसन्धिसंयुक्तशलाकान् तैलसंस्कृतान् ।
सन्धायं विधिवत् पश्चात्तदन्ते शाखन. क्रमात् ॥ ५८ ॥
चक्रसन्धिं प्रकल्प्याधारारचक्रमुखान्तरे ।
कीली सन्धारयेत् सम्यगुभयो पार्श्वयो क्रमात् ॥५९॥
मध्ये धूमप्रसारणकीलको पार्श्वयोस्तथा ।
सन्धारयेत् तथा धूमबन्धने कीलद्वयम् ॥ ६० ॥
प्रतिष्ठित तैल से शुद्ध दो दण्डों के मुख के अन्दर चक्रमूल को आरम्भ कर दण्डों के अन्दर
से विमान के ईषादण्ड—धुरा दण्ड मूल के गुहावर्तस्थ दो नालों में आठ अंगुल वाले चक्रों से मार्ग के
अनुसार बनाए तीन पर्वसन्धिसंयुक्त तैल से संस्कृत शलाकाओं को लगा कर फिर उनके अन्त में चक्र-
सन्धि बना कर आरावाले चक्रमुख में दोनों पार्श्वों में कीली लगावे; बीच में धूमप्रसारण दो कीलें
दोनों पार्श्वों में लगावे तथा धूम को रोकने की दो कीलें भी लगावे ॥ ५६-६० ॥
सन्धितन्त्रीचक्रवर्गैस्तत्तन्मार्गानुसारतः ।
परस्परं सन्धिसंयोजनकीलीनिबन्धनम् ॥ ६१ ॥
कारयेत् सरलेनैव तत्तत्स्थानप्रमाणतः ।
बाहुमात्रे ताम्रपीठे एतत्सर्वं यथाविधि ॥ ६२ ॥
प्रकल्प्याधारपार्श्वेथ विमानस्य दृढं यथा ।
संस्थापयेद् यथाकामं पश्चात् कालानुसारतः ॥ ६३ ॥
शक्तिपञ्जरकील्यन्त्र ] [ १६१
सार्पतियंग्दण्डवक्रगतिभेदादिभि क्रमात् ।
विमानं चोदयेद् बुद्ध्या पुरोभागस्थचक्रतः ॥ ६४ ॥
तथैवान्ये कीलकादिसहायैरपि शास्त्रतः ।
एतद्यन्त्रसहायेन भवेद् वक्रगति क्रमात् ॥ ६५ ॥
विमानस्यातिवेगेन तेन दम्भोलिकादिभि ।
सम्भवापायनाशस्तु तत्क्षणादेव जायते ॥ ६६ ॥
विमानरक्षणं तस्माद् यन्त्रेणा च विशेषतः ।
भवेत् तस्मात् सग्रहेण यथावच्छास्त्रत क्रमात् ॥ ६७ ॥
वक्रप्रसारण नामयन्त्रमुक्तं मनोहरम् ॥ इत्यादि ॥
सन्धि तन्त्री चक्रवर्गों से उस उस मार्ग के अनुसार परस्पर सन्धि संयोजन कीलों का निबन्धन
उस उस स्थान के प्रमाण से सरलरूप में करे बाहुपरिमाण लम्बे के पीठ में यह सब यथाविधि रच कर
विमान के आधार पार्श्व में दृढ यथेष्ट स्थापित करे । पश्चात् समयानुसार सर्प की भांति तिरछे दण्ड
जैसी वक्रगति भेद आदि से विमान को बुद्धि से सामने के भाग वाले चक्र से प्रेरित करे तथा अन्य
कील आदि सहायक से भी शास्त्रानुसार इस यन्त्र की सहायता से वक्रगति विमान की अतिवेग से
दम्भोलि-(तारपीडो) जैसी वस्तुओं से होने वाले अनिष्ट का नाश तत्क्षण हो जाता है विमान की
तथा विशेषतः चालक और यात्रियों की रक्षा होजावे अतः शास्त्रानुसार संक्षेपसे मनोहर चक्रप्रसारण यन्त्र
कहा है ॥ ६१-६७ ॥
अथ शक्तिपञ्जरकील यन्त्रनिर्णय - अब शक्तिपञ्जरकील यन्त्र का निर्णय देते हैं-
एवमुक्त्वा वक्रप्रसारणयन्त्रमतं परम् ।
शक्तिपञ्जरकील यन्त्रमथ प्रवक्षते ॥ ६८ ॥
इस प्रकार वक्रप्रसारण यन्त्र कहकर इससे आगे शक्तिपञ्जरकील यन्त्र अब कहते हैं ।
तदुक्तं क्रियासारे- यह वह क्रियासार ग्रन्थ में कहा-
विमानसर्वाङ्गसन्धिस्थानभेदेषु शास्त्रतः ।
विमानाङ्गेषु सर्वत्र आमूलाग्रं यथाविधि ॥ ६६ ॥
विद्युत्सञ्चोदनार्थाय तत्कालानुसारत ।
शक्तिपञ्जरकीलकयन्त्रसस्थापन क्रमात् ॥ ७० ॥
विमानमध्यकेन्द्रे च कुर्याच्छास्त्रविधानतः ॥ इति
विमान के सब अङ्गों के भिन्न भिन्न सन्धिस्थानों में शास्त्र से विमान के अङ्गों में सर्वत्र मूल
से अग्रभाग तक यथाविधि विद्युत् को प्रेरित करने के अर्थ उस उस समय के अनुसार क्रम से शक्ति-
पञ्जर कीलक यन्त्र का संस्थापन विमान के मध्यकेन्द्र में विधान से करे ॥ ६६-७० ॥
तदुक्तं यन्त्रसर्वस्वे- यह वह यन्त्रसर्वस्व ग्रन्थ में कहा है-
विद्युत्सञ्चोदनार्थाय यानसर्वाङ्गसन्धिषु ॥ ७१ ॥
१६२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
शक्तिपञ्जरकीलकयन्त्रनिर्णयमुच्यते ।
कान्तक्रौञ्चिकलोहान् त्रीन् दशाष्टनवभागत ॥ ७२ ॥
सम्पूर्य मूषिकामूषामुखे पश्चाद् यथाविधि ।
निधायातपकुण्डेथ शतकक्ष्यमोष्णत क्रमात् ॥ ७३ ॥
सङ्गाल्य तन्मुखे विद्युच्छक्ति संयोजयेद् दश ।
ततो यन्त्रमुखे वेगात् पूरयेदेकत क्रमात् ॥ ७४ ॥
अत्यन्तमुदुल शुद्ध शक्तिगर्भाभिध (द ?) इदम् ।
भवेल्लोह तेन यन्त्र कुर्यात् तद्विधिरुच्यते ॥ ७५ ॥
विद्यु त को प्रेरित करने के अर्थ विमानयान के सर्वाङ्ग की सन्धियों में शक्तिपञ्जर कीलकयन्त्र
का निर्णय कहा जाता है । कान्त—अयस्कान्त, क्रौञ्चिक—कृत्रिम लोह विशेष, लोह—साधारण लोहा इन
तीनों को १०, ८, ६ भागों से मूषिका आकार की मूषा—बोतल के मुख में भरकर पश्चात् यथाविधि
आतपकुण्ड में रखकर १०० दर्जे की उष्णता से क्रम से गलाकर उसके मुख में विद्यु त् शक्ति १० संख्या
में युक्त करे फिर यन्त्रमुख में वेग से एक वार भर दे, अत्यन्त मृदुल शुद्ध शक्तिगर्भ नामक लोहा वह
हो जावे उस से यन्त्र बनावे उसकी विधि कही जाती है—विधि कहते हैं ॥ ७१-७५ ॥
बाहुमात्रमुन्नत तावदायाम द्रोणिवत् सुधी ।
पीठ कुर्याच्छक्तिगर्भोलोहेनैव यथाविधि ॥ ७६ ॥
पीठमूले तथामध्ये तदन्ते च यथाक्रमम् ।
अर्धचन्द्राकारमुखकीलस्तम्भान् दृढ यथा ॥ ७७ ॥
आदौ संस्थापयेत् पट्टिका ताम्रनिर्मिताम् ।
संयोजयेत् तत् कीलशङ्कुभिर्बन्धयेद् दृढम् ॥ ७८ ॥
तन्त्रीनु शलाकान् तच्छक्तिगर्भोलोहेन शास्त्रतः ।
सच्छिद्रदण्डनालान् त्रीन् (त्री ?) कृत्वा पश्चाद् यथाविधि ॥७९॥
दण्डच्छिदेषु सर्वत्र शलाकान् योजयेत् ततः ।
सप्रमाण लोहतन्त्री शलाकोपरि वेष्टयेत् ॥ ८० ॥
बाहुमाप में ऊंचा बाहुमाप लम्बा द्रोणी हाण्डी की भाति पीठ—विमानस्थली बुद्धिमान् उस
शक्तिगर्भ लोहे से ही यथाविधि बनावे । पीठ के मूल में मध्य में और अन्त में यथाक्रम अर्धचन्द्राकार
मुखवाली कीलों के स्तम्भों को दृढ़रूप में आदि में संस्थापित करे पश्चात् ताम्बे से बनी पट्टिका को लगावे
फिर कील शङ्कुओं से बान्ध दे, तारों को शलाकाओं को उस शक्तिगर्भ लोहे से शास्त्रानुसार छिद्रसहित
दण्डरूप नालों को तारों को बनाकर पश्चात् यथाविधि दण्डों के छिद्रों में सर्वत्र शलाकाओं को जोड़ दे
फिर माप से लोहे के तारों को शलाकाओं के ऊपर लपेट दे ॥ ७६–८० ॥
वर्तुलं पञ्जर तेन भवेत् सुदृढमद्भुतम् ।
तत्पञ्जर ताम्रपट्टिकोपरि स्थापयेत् ततः ॥ ८१ ॥
शिरःकीलकयन्त्र ] [ १६३
विद्युच्छक्तिं पञ्जरस्याधोभागे न्यसेत् क्रमात् ।
पञ्जरस्थशलाकानां तन्त्रीणामपि शास्त्रत ॥ ८२ ॥'
विद्युत्सञ्चोदनार्थाय कीलकं स्थापयेत् तथा ।
विमानस्याऽङ्गयन्त्राणां द्वात्रिंशत्यंघ्रिषु (घिषु ?) क्रमात् ॥८३॥
विद्युत्संचोदनार्थायोपसंहाराथमेव च ।
अनुलोमविलोमाभ्यां द्वात्रिंशत्कीलकान् क्रमात् ॥ ८४ ॥
सन्धाययेत् सूक्ष्मकीली शङ्कुभिस्सुदृढं यथा ।
विद्युत्प्रयोगं सर्वत्र कर्तुं तेन यथोचितम् ॥८५॥
भवेद् विमाने शास्त्रोक्तरीत्या स्वेष्टप्रकारतः ।
दिक्प्रभेदेन सर्वत्र गतिवैचित्र्यतः क्रमात् ॥८६॥
भवेच्चोदयितुं व्योमयानं तस्माद् यथाविधि ।
तस्मादुक्तं समासेन विद्युत्पञ्जरयन्त्रकम् ॥८७॥
इससे पञ्जरगोल सुदृढ़ अद्भुत हो जावेगा उस पञ्जर को ताम्बे की पट्टिका के ऊपर स्थापित करदे
पुनः पञ्जर के नीचले भाग में विद्युत्शक्ति को रक्खे क्रमशः पञ्जरस्थ शलाकाओं तारों के भी (अन्दर)
शास्त्र से विद्युत् को प्रेरित करने के अर्थ कील-पेंच स्थापित करे—लगावे । विमान में स्थित अङ्गयन्त्रों
के ३२ पैरों में—नीचलेभागों में क्रम से विद्युत् को प्रेरित करने के अर्थ और उपसंहार-सङ्कोचकरने खींच
लेने के अर्थ भी अनुलोम-सीधे विलोम-उल्टे प्रकार से ३२ कीलों-पेंचों को क्रम से सूक्ष्मकील शङ्कुओं
से दृढ़ लगादे इससे शास्त्रोक्त रीतिसे विमान में विद्युत्का यथोचित और स्वेच्छानुसार प्रयोग करना हो
सकता है । दिशा के भेद से सर्वत्र विचित्र गति से विमान यान का प्रेरित करना हो सके अतः यथा-
विधि संक्षेप से विद्युत्पञ्जर कहा गया है ॥८१-८७॥
अथ शिर कीलकयन्त्रनिर्णय —अब शिर.कीलकयन्त्रनिर्णय करते हैं—
इत्युक्तवा शक्तिपञ्जरयन्त्रमथ यथाविधि ।
सङ्ग्रहेण शिर कीलकयन्त्रं सम्प्रचक्षते ॥८८॥
शक्तिपञ्जर यन्त्र कहकर अब यथाविधि संक्षेप से शिर कीलकयन्त्र को कहते हैं ॥८८॥
तदुक्तं क्रियासारे—वह क्रियासारग्रन्थ में कहा है—
विमानोपर्यशनिपातं मेघवृन्दाद् भवेद् यदा ।
तदा विनाशमायाति व्योमयानोतिशीघ्रत ॥८६॥
तस्मात् तत्परिहाराय शिर कीलकयन्त्रकम् ।
शिरोभागे विमानस्य स्थापयेच्छास्त्रतं क्रमात् ॥६०॥ इत्यादि ॥
विमान के ऊपर मेघराशि से विद्युत् का गिरना जब हो तब विमान अति शीघ्र नाश को प्राप्त
हो जाता है अतः उसके परिहार के लिये शिर.कीलकयन्त्र विमान के शिरोभाग में शास्त्र से स्थापित
करे ॥८६-६०॥
१६४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
यन्त्रस्वरूपमुक्तं यन्त्रसर्वस्वे— यन्त्रस्वरूप यन्त्रसर्वस्व में कहा है—
यदपायो विमानस्य भवेदशनिपातत ।
तदपायनिवृत्त्यर्थं शिर कीलकयन्त्रकम् ॥६१॥
सङ्ग्रहेण प्रवक्ष्यामि शास्त्रोक्तेनैव वर्त्मना ।
यावत्प्रमाण यानस्य शिरस्तस्तावदेव हि । ६२॥
कुर्याच्छत्रिं शलाकाद्यैर्लोहावरणात् क्रमात् ।
विषकण्ठाख्यलोहेनैवान्यथा निष्फल भवेत् ॥६३॥
तेनैव बाहुमात्रेण तद्दण्डं पीठमेव च ।
कुर्याच्चक्राकृतिं पश्चाद् वकतुण्डलोहत ॥६४॥
त्रिचक्रकीलकान् कृत्वा त्रीन् विमानस्य शास्त्रत ।
आदौ मध्ये तथा चान्ते स्थापयित्वा तत परम् ॥६५॥
विद्युत् के गिरने से जिससे कि विमान का विनाश हो जाता है उस विनाश या बिगाड़ की
निवृत्ति के अर्थ शिर कीलकयन्त्र संक्षेप से शास्त्र मार्ग से कहूंगा, जितना माप विमान के शिर का हो
उतने माप की छत्री शलाका आदि से लोहे के आवरण से करे विषकण्ठ नामक लोहे से करे अन्यथा
निष्फलता होजावे । उसी लोहे से बाहुमाप से उसके दण्डे और चक्राकार पीठ को बनावे पश्चात् वकतुण्ड
लोहे से तीन चक्रवाली तीन कीलों को करके विमान के आदि में मध्य में और अन्त में स्थापित
करके फिर—॥६१-६५॥
सदण्डं स्थापयेच्छत्रिं कीलद्वयमध्यत ।
मणिमग्निकुठाराख्य लोहपञ्जरसयुतम् ॥६६॥
किरीटवत्तच्छिरसि स्थापयेत् सरल यथा ।
त्रिचक्रकीलभ्रमरकीलकं यन्त्रपार्श्वत ॥६७॥
स्थापयित्वा यथाशास्त्र कुलिशध्वंसलोहत ।
कृत्वा तन्त्रीन् मणिस्थाननालरन्ध्राद् यथाविधि ॥६८॥
त्रिचक्रभ्रामणी कीलस्थानामूलावधि क्रमात् ।
समाहृत्याथ तत्स्थानमध्ये सन्धारयेत् तत ॥६९॥
तन्मुखे शब्दनालं च सकीलं स्थापयेद् दृढम् ।
गुरञ्जिकादर्पणेन तद्यन्त्रावरणं सुधी ॥१००॥
दो कीलों के मध्य में दण्डसहित छत्री स्थापित करे, अग्निकुठारनामक मणि लोहपञ्जर से युक्त
मुकुट की भांति शिर में—विमान के शिरोभाग में सरल स्थापित करे। तीन चक्रोंवाली—पेचों को घुमाने
वाली कील चालक के पास यथाशास्त्र स्थापित करके कुलिश ध्वंस (वज्रध्वंसक—विद्युत् का नाश करने
वाले) लोहे से तारों को मणिस्थान नाल के छिद्र से यथाविधि त्रिचक्रभ्रामणीकीलस्थ मूल
तक यथाविधि लाकर उनमें स्थान के मध्य में जोड़ दे, फिर उनके मुख में कीलसहित शब्दनाल स्थापित
करे, सुरञ्जिकादर्पण से यन्त्र का आवरण बुद्धिमान् —॥६६-१००॥
शब्दाकर्षणयन्त्र ] [ १६५
कुर्याच्छास्त्रोक्तविधिना पश्चादावरयेद् दृढम् ।
यदा स्यादशनिपातसूचकं घनगर्जितम् ॥१०१॥
तत्क्षणाद् यन्त्रावरणदर्पणस्त्रुटितो (तं?) भवेत् ।
पश्चात् तन्त्रीमुखनालरन्ध्राच्छब्द प्रजायते ॥१०२॥
अत्यन्तचलनं तेन भवेत् तन्त्र्या स्वभावतः ।
दृश्यन्ते यन्तॄणां याने चिह्नान्येतान्यथाक्रमात् ॥१०३॥
पतत्यशनिपातोऽद्य इति मत्वातिशीघ्रतः ।
त्रिचक्रकीलभ्रमणं कुर्यादत्यन्तवेगतः ॥१०४॥
भ्राम्यते तेन तच्छत्री शतलिङ्गाप्रमाणतः ।
पश्चात् तन्मणिकील च भ्रामयेद् वेगतः क्रमात् ॥१०५॥
—करे, शास्त्रोक्तविधि से ढक दे। जब विद्युत् गिरने का सूचक मेघगर्जन हो तो तत्क्षण यन्त्र
का आवरणदर्पण टूट जाता है, पश्चात् तारों के सिरे की नाल के छिद्र से शब्द होता है, इससे तार मे
अत्यन्त चंचल स्वभावत होती है। चालकयात्रियों के विमान यान में जब ये चिह्न दिखलाई पड़ते है
तो अब विद्युत् का गिरना होगा ऐसा समझ अति शीघ्र अत्यन्त त्रिचक्रकील का भ्रमण करदे इससे वह
छत्री १०० डिग्री के प्रमाण से घूमने लगती है पश्चात् उस मणिकील को भी वेग से घुमा देती
है-॥१०१-१०५॥
तेन सम्भ्रमते वेगात् तन्मणिसर्वतोमुखं ।
छत्रीवेगादशनिपातवेगशान्तिर्भविष्यति ॥१०६॥
मणिवेगादशनिपात क्रोशान्ते यानतो भवेत् ।
विमानरक्षणं तेन यन्तॄणा पालनं तथा ॥१०७॥
भवेत् तस्माच्छिरः कीलयन्त्रमुक्तं यथाविधि ।
इससे मणि सर्वतोमुख वेग से घूमती है, छत्री के वेग से विद्युत् गिरने के वेग की शान्ति
हो जावेगी—हो जाती है। मणि के वेग से विद्युत् गिरने का वेग विमान से कोस भर परे हो जावेगा,
इससे विमान का रक्षण तथा चालकयात्रियों का बचाव हो जावे—हो जाता है अतः शिरः कीलकयन्त्र
यथाविधि कहा है ॥१०६—१०७॥
अथ शब्दाकर्षणयन्त्रनिर्णयः — अथ शब्दाकर्षणयन्त्र का निर्णय है—
एवमुक्त्वा शिरः कीलयन्त्रमत्र यथाविधि ।
शब्दाकर्षणयन्त्रोऽथ सङ्ग्रहेण प्रकीर्त्यते ॥१०८॥
इस प्रकार शिरः कीलयन्त्र यहां यथाविधि कहकर शब्दाकर्षणयन्त्र आज-अब संक्षेप से कहा
जाता है।
तदुक्तं क्रियासारे — यह क्रियासार ग्रन्थ में कहा है—
अष्टदिक्षु विमानस्य क्रोशाद् द्वादशकोपरि ।
स्तन्वन्नतन्त्रीमार्गेण मृगपक्ष्यादिभिस्तथा ॥१०६॥
१६६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
सन्ताडनभ्रामणाद्यैर्मनुष्यैरष्टयन्त्रकैः ।
गूढेन वा प्रकाशेन ये शब्दास्सम्भवन्ति हि ॥ ११० ॥
तेषां सङ्ग्रहणार्थाय शब्दाकर्षणयन्त्रकम् ।
व्योमायनभुजे सम्यक् स्थापयेद् विधिवत्सुधीः ॥ १११ ॥ इत्यादि ॥
विमान की आठों दिशाओं में १२ कोश से ऊपर तारसहित ताररहित मार्ग से तथा मृगपक्षी
आदि के द्वारा सन्ताडन भ्रमण आदि से मनुष्यों से आठयन्त्रों से गूढ या प्रकट जो शब्द उत्पन्न होते हैं
उनके पकड़ने के अर्थ शब्दाकर्षण यन्त्र विमान की भुजा में सम्यक् विधिवत् बुद्धिमान् स्थापित
करे ॥१०६—१११॥
यन्त्रस्वरूपमुक्तं यन्त्रसर्वस्वे—यन्त्रस्वरूप यन्त्रसर्वस्व में कहा है—
चतुरस्रं वर्त्तुलं वा शुद्धवैडाललोहतः ।
पीठं कृत्वाथ तन्मध्ये शङ्कु संस्थाप्य पार्श्वयोः ॥ ११२॥
सङ्कल्पस्वरवादित्रशब्दभाषापकर्षकम् ।
रोरुवापक्षिणो नोचेद् गृञ्जनीपक्षिणोपि वा ॥ ११३॥
शुद्धीकृतेन देहस्थचर्मणा मृदुलेन च ।
कृत्वा कन्दु(तु?)कवद् गोलद्वयं सूक्ष्म लघु दृढम् ॥११४॥
स्थापयेद् विधिवत् पश्चात् तन्मध्ये कटनद्रवम् ।
सम्पूर्य सुरघादर्शापात्रे संस्थापयेत् क्रमात् ॥११५॥
चौकोर या गोल शुद्धवैडाल लोहे से पीठ-भूमिका बनाकर उसके मध्य में शंकु संस्थापित करे
दोनों पार्श्वों में सङ्कल्प स्वर वादित्र—बाजे शब्द भाषा—भाषण के खींच लेनेवाले यन्त्र को लगावे,
रोरुवा ? पक्षी के नही तो गृञ्जनी ? पक्षी के भी शुद्ध किए देहस्थ मृदुल चमड़े से गेंद के समान सूक्ष्म
छोटे दृढ दो गोल विधिवत् स्थापित करे पश्चात् उनके मध्य में कटनद्रव ? भरकर सुरघादर्श ? पात्र में
क्रम से संस्थापित कर दे ॥११२—११५॥
ध्वन्याकर्षणघण्टारलोहनिर्मितमद्भुतम् ।
तन्त्रीगुच्छसमायुक्त शब्दोन्मुखशलाककम् ॥ ११६ ॥
दृढ पिण्डद्वयोर्मध्ये द्रावकोपर्यथाक्रमम् ।
प्रतिष्ठाप्याथ कवचाकदर्पणावरण क्रमात् ॥ ११७ ॥
कृत्वा मूलेऽङ्गुष्ठमात्रचक्रग्रन्थित्रयं तत ।
सन्धारयेत् तदारभ्य शलाकान्तं यथाविधि ॥ ११८ ॥
अत्यन्तसूक्ष्मान्मृदुलान् संयोजयेत् क्रमात् ।
एतत्तन्त्रीन् समावृत्य म्यग्बिलं सूक्ष्मरन्ध्रकम् ॥ ११९ ॥
क्वणादर्शेन रक्षित करण्डमुपरि न्यसेत् ।
द्रोणास्यपात्रं तेनैव कृतं तस्योपरि क्रमात् ॥ १२० ॥
शब्दाकर्षणयन्त्र ] [ १६७
ध्वनि को आकर्षित करने वाले घण्टार लोहे † से बना हुआ अद्भुत तारों के गुच्छे से युक्त
शब्द को प्रकट करने के डन्मुख शलाकाओं वाले दृढ दोनों पिण्डों—गोलों के मध्य में द्रावक के ऊपर
यथाक्रम रखकर क्वणकदर्पण—शब्द करनेवाले के आवरण को क्रम से करके अङ्गुष्ठमात्र चक्र की तीन
ग्रन्थियों के मूल में लगावे वहां से आरम्भ करके शलाकापर्यन्त यथाविधि अत्यन्त सूक्ष्म कोमल तारों को
क्रम से जोड़ दे इन तारोंको सूक्ष्मछिद्रवाले नीचले बिल में को घुमाकर क्वणादर्शदर्पण से रची करण्ड
सन्दूकची या डलिया के ऊपर रखवे, द्रोणमुख वाला—हाण्डी मुखवाला पात्र उसी क्वणादर्श से किया
हुआ हो उस के ऊपर क्रम से—॥ ११६–१२० ॥
संस्थापयेत् ततस्तस्मिन् पूर्वपश्चिमयोस्तथा ।
दक्षिणोत्तरतश्चैव रुदन्तीरटिकामिधान् (दान् ?) ॥१२१॥
मयोजयेन्मणीन् शुद्धान् चत्वारि समरेखत ।
मणिमन्तरत कृत्वा सूक्ष्मनालान् यथाविधि ॥ १२२ ॥
दर्पणेन कृतान् शुद्धांश्चतुर्दिक्षु दृढ यथा ।
स्थापयेदथ तस्योर्ध्वप्रदेशे शब्दफेनकम् ॥ १२३ ॥
तस्योपरि यथाशास्त्रं कुर्यादावरणं तत ।
तस्मिन् सम्धारयेत् सूक्ष्मशङ्कून् सुशोधितान् दृढान् ॥१२४॥
पश्चात् क्वणादर्शकृतावरणं तत्प्रमाणत ।
तस्योपरि न्यसेदष्टसूक्ष्मछिद्रसमन्वितम् ॥ १२५ ॥
—उसमें संस्थापित करे, पूर्व पश्चिम में तथा दक्षिण उत्तर रुदन्तीरटिका नामक चार शुद्ध
मणियों को समरेखा से जोड़ दे, मणि को बीच में करके दर्पण से बना हुआ शुद्ध सूक्ष्म नालों को
यथाविधि चारों दिशाओं में स्थापित करे उसके ऊपरि प्रदेश में शब्दफेन—शब्द सस्कारशक्तियुक्त चक्र
रख दे, उस के ऊपर यथाशास्त्र आवरण करे पुन उस में शोधित सूक्ष्म शङ्कओं को लगावे, पश्चात्
क्वण आदर्श से किए आठ सूक्ष्मछिद्र युक्त आवरण उस प्रमाण से उसके ऊपर रखे ॥ १२१–१२५ ॥
एकैकछिद्रमार्गेणान्तश्शङ्कुमुखान्तरात् ।
सूक्ष्मतन्त्रीन् समाहृत्य न्यसेदावरणोपरि ॥ १२६ ॥
तन्मध्येऽङ्गुलमानेन छिद्र कृत्वा यथाविधि ।
सिंहास्यदण्डनाल च मध्ये संस्थापयेत् क्रमात् ॥ १२७ ॥
वातापकर्षक चक्र षोडशारं सुसूक्ष्मम् ।
न्यसेत् तस्य पुरोभागे तन्त्रीसवेष्टित यथा ॥ १२८ ॥
एव क्रमेणाष्टदिक्षु सूक्ष्मचक्राणि विन्यसेत् ।
पूर्वोक्तसिंहास्यमुखेष्टदिक्षु यथाक्रमम् ॥ १२६ ॥
प्रदक्षिणावर्तकीलचक्रान् संस्थापयेदथ ।
शुद्धवाजीमुखलोहकृतवर्तु लपट्टिकान् ॥ १३० ॥
† घण्टार लोहा पीछे कहा गया है कृत्रिम है।
१६८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
एक एक छिद्रमार्ग से भीतर शङ्कु के मुख के अन्दर से सूक्ष्म तारों को निकालकर आवरण
के ऊपर लगावे, उस के अन्दर अङ्गुल माप से छिद्र करके यथाविधि सिहास्यदण्डनाल को मध्य में
संस्थापित करदे । वाताकर्षण चक्र १६ अराओंवाला सुसूक्ष्म उसके सामने वाले भाग में तारों से लिपटा
हुआ लगावे, इस प्रकार क्रम से आठ दिशाओं में सूक्ष्म चक्र लगावे, पूर्वोक्त सिहास्य मुख में आठ
दिशाओं में घूमनेवाले कीलचक्रों को संस्थापित करे अनन्तर शुद्ध याज्ञी मुखलोहे से की हुई गोल
पट्टिकाओं को-॥ १२६-१३० ॥
सुदृढान् च(छ्र?)षकाकारान् सरल स्थापयेत् तत ।
पूर्वोक्तावरणाच्छिद्रमुखसंस्थितान् क्रमात् ॥ १३१ ॥
तन्त्रीन् सङ्गृह्य विधिवत् तेषु संयोजयेत् क्रमात् ।
तथैव वाताहरणचक्रस्थानाद् यथाविधि ॥ १३२ ॥
मरुन्धान्यन्तसुसूक्ष्मतन्त्रीनाहृत्य शक्ति ।
सिहास्यस्थाष्टचषकपट्टिकामूलसन्धिषु ॥ १३३ ॥
संयोज्य शब्दफेनस्थशङ्कूना मूलकेन्द्रत ।
द्रवपात्रस्थमणिमावृत्य तन्त्रीन् यथाक्रमम् ॥ १३४ ॥
समाहृत्याय विधिवद् बध्नीयात् सुदृढ यथा ।
वातसंयोजनाच्चक्रभ्रमण भवति स्वतः ॥ १३५ ॥
—सुदृढ ग्लासपात्र या लोटापात्र के आकारवालों को सरल स्थापित करे फिर पूर्वोक्त आवरण के
आठ छिद्रमुखों में स्थित तारों को लेकर विधिवत् उन में लगादे वैसे ही वात को खींचने वाले चक्रस्थान
से यथाविधि छिद्रसहित अत्यन्त सूक्ष्म तारों को शक्ति से लेकर—खींचकर सिंहास्य में स्थित आठ
चषकपात्र पट्टिकामूलसन्धियों में जोड़कर शब्दफेनचक्र में स्थित शङ्कुओं के मूलकेन्द्र से द्रवपात्रस्थित
मणि को आवृत कर तारों को यथाक्रम लेकर विधिवत् दृढ बान्ध दे जिससे वातसंयोजन से चक्रभ्रमण
स्वतः हो जाता है—हो जावे ॥ १३१-१३५ ॥
हस्तलेख कापी संख्या १४---
सम्भ्राम्यते मणौ पश्चात् तेन सव्यापसव्यत ।
तद्वेगाद् भ्राम्यते शब्दफेनचक्रमत परम् ॥ १ ॥
भ्राम्यन्त्यन्तश्शङ्कू मूलचक्राण्यपि यथाक्रमम् ।
तस्मात् सिंहास्यनालस्यचक्राण्यष्ट विशेषत ॥ २ ॥
भ्राम्यन्ति तेन ध्वन्याकर्षणघण्टारलोहत ।
कृतशब्दोन्मुखशनाकचालन भवेत् स्वत ॥ ३ ॥
रोरुवागृह्णीचर्मकृतगोलद्वय ततः ।
शलाकचालनात् सर्वशब्दान् तत्तत्स्वरैस्सह ॥ ४ ॥
सङ्गृह्य स्वान्तरे पश्चात् सन्निम्यति नान्यथा ।
तन्मूलकीलचालनात् पुनस्सिंहास्यमार्गत ॥ ५ ॥
द्रोणास्यपात्रे वेगेन प्रविश्याथ यथाक्रमम् ।
परश्रोत्रग्रहणयोग्यान् सर्वान् शब्दान् स्फुट यथा ॥ ६ ॥
करोति तत्क्षणादेव सर्वदिक्मुखत क्रमात् ।
-मणि घूमती है पश्चात् उससे सीधे उल्टे रूप में उसके वेग से शब्दफेनचक्र-शब्दसंस्कार चक्र
घूमता है उस के पश्चात् भीतरी शङ्कुओं के मूलचक्र भी यथाक्रम घूमते हैं । अत सिंहास्यनाल-सिंह के
मुख समान नाल के आठ चक्र विशेषरूप से घूमते हैं उससे ध्वनि को आकर्षित करनेवाले घण्टार-घण्टा
वाले लोहे से शब्दोन्मुख किया शलाकाचालन स्वत हो जावे रोरुवा गृह्णनी अतिशय शब्द को गुञ्जाने-
वाली ? के चर्म के दो गोल डोल जैसे शलाका चलाने से सब शब्दों को उन उन के स्वरों के साथ अपने
अन्दर लेकर पश्चात् नियन्त्रित करता है उस मूल कील के चलाने से पुन सिंहास्यमार्ग से द्रोणास्य पात्र
में वेग से प्रविष्ट हो यथाक्रम दूसरे के श्रोत्रग्रहण के योग्य सब शब्दों को तुरन्त सब ओर स्फुट करता
है ॥ १-६ ॥
तत्तद्दिश्यागत शब्द श्रुत्वा यन्ता सुधीः स्वयम् ॥ ७ ॥
परचक्रविचार यत् सर्वं विज्ञाय यन्त्रतः ।
इति कर्तव्यता ज्ञात्वा स्वयानपरिपालने ॥ ८ ॥
कुर्यात् प्रयत्न विधिवदन्यथा नाशमेधते ।
२०० ] [ बृहद् विमानशास्त्रं
तस्मादुक्तं समासेन शब्दाकर्षणयन्त्रकम् ॥ ६ ॥
शब्दाकर्षणयन्त्रास्तु द्वात्रिंशद्भेदत क्रमात् ।
शास्त्रेषु निर्णितास्सम्यग्यन्त्रशास्त्रविशारदै ॥ १० ॥
एतच्छब्दाकर्षणयन्त्र यानाङ्गत पृथक् ।
कुतस्तित्ववगन्तव्य सर्वशास्त्रप्रमाणत ॥ ११ ॥ इत्यादि ॥
उस उस दिशा से आये हुए शब्द को सुनकर बुद्धिमान् यन्त्रचालक परचक्र के सब विचार
को यन्त्र से जान कर अपने विमान की रक्षा के लिये यह कर्तव्य है यह जान कर प्रयत्न करे अन्यथा
नाश को प्राप्त हो जावे । अत संक्षेप से शब्दाकर्षण यन्त्र कहा । शब्दाकर्षण यन्त्र ३२ भेद के शास्त्रों
में यन्त्रशास्त्र विद्वानो ने क्रमश कहे हैं, यह शब्दाकर्षण यन्त्र विमानयान का अङ्गरूप से है ॥७-११॥
एतद्यन्त्रोपयुक्तं वस्तुस्वरूपवर्णनम्--इस यन्त्र के उपयुक्त वस्तु स्वरूप वर्णन है--
वैडालिकलोहमुक्तं लोहसर्वस्वे--वैडालिक लोहा कहा है लोहसर्वस्व में--
द्विवक्त्रशङ्करकान्तवज्रकमठा