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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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वक्रप्रसारणयन्त्र ] [ १८६
नौदासर, यवक्षार सज्जीखार, शुद्ध सोञ्चलनमक, सिञ्चाणुक ?, अतिसूक्ष्म बालु । बम्भारिक ?, अञ्जनिक-
सुरमा, कुरङ्ग—अर्कफेरा, पञ्चोर्मिक ?, चन्द्ररस—काम्पिल्लक रस ?, शिवारिक ? इनको समान लेकर
क्रम से शोधकर सेंहिक मूषा बोतल मध्य में भर कर पद्माकर कुण्डगर्भ में रख कर शूर्पोदर भस्त्रिका मुख
से ३०० दर्जे की उष्णता से गला कर पिघला रस धीरे से लेकर यन्त्रमुख के अन्दर क्रम से भर दे ऐसा
करने पर शुद्ध अतिदृढ हल्का शीतघ्न दर्पण सूक्ष्म सुमनोहर हो जावे ॥ ४१-४४ ॥
अथ वक्रप्रसारणयन्त्र.—अब वक्रप्रसारण यन्त्र कहते हैं—
उक्त्वा शक्त्युद्गमयन्त्र सङ्ग्रहेण यथामति ।
वक्रप्रसारण नामयन्त्रमद्य प्रचक्षते ॥ ४५ ॥
शक्त्युद्गम यन्त्र संक्षेप से यथामति कह कर वक्रप्रसारण यन्त्र अब कहते हैं ॥ ४५ ॥
उक्तं हि क्रियासारे—क्रियासार में कहा ही है—