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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 206

शक्त्युद्गमयन्त्र ] [ १८३
फिर दूसरी शीत जल की फुशार रूप को प्राप्त हो जाती है, तीसरी शीत वायुधारा को प्रवाहित करने
वाली शक्ति । जब विमान केन्द्ररेखा के नीचे के मार्ग में आता है तो शीतवायुधारा को प्रवाहित करने
वाली शक्ति स्ववेग से विमानशक्ति के सर्वस्व-सामर्थ्य को तुरन्त खींच लेती है ॥ ६६-७५ ॥
तथा शीतरसरूपवातशक्तिस्स्वभावत ।
यानस्थसर्वयन्तॄणा बलमाकर्षति क्रमात् ॥ ७६ ॥
जलस्य सीत्कराकारशक्ति पश्चात् स्ववेगत ।
यानमावृत्य सर्वत्रादृश्य कुर्वीत नान्यथा ॥ ७७ ॥
बलापकर्षणाद् यानपतन तद्गदेव हि ।
यन्तॄणा प्राणहानिश्च यानागोचरमेव च ॥ ७८ ॥
प्रभवेदेककालेन कष्टात्कष्टतर तत ।
तस्मात् तत्परिहाराय यन्त्र शक्त्युद्गमाभिधम् ॥७९॥
विमाननाभिकेन्द्रस्य मध्ये संस्थापयेद् दृढम् ॥ इत्यादि ॥
और दूसरी शीतरसरूप वायु-ठण्डी भापमय शक्ति अपने स्वभाव से विमान में स्थित यात्रियों
के बल को खींच लेती है, तीसरी जल की फुवारा के आकार वाली शक्ति विमान को घेरकर सब ओर उसे
अदृश्य कर देती है । 'इस प्रकार तीनों शक्तियों के द्वारा' बल को खींचलेने से विमान गिर जाता है
यात्रियों की प्राणहानि और विमान का अदृश्य-लापता हो जाना एक साथ कष्ट से अधिक कष्ट हो जावे ।
अत उसके परिहार के लिये शक्त्युद्गमनामकयन्त्र विमाननाभि के केन्द्र मध्य में दृढ़रूप से संस्थापित
करे ॥ ७६-७९ ॥
उक्त हि खेटसंग्रहे—कहा है खेटसंग्रह ग्रन्थ में -
कुजार्कशनिजाम्भारिबुधमाण्डलिको रुरु ।
विश्वप्रकाशकश्चेति ग्रहाश्चाष्टावितीरिता ॥ ८० ॥
कृत्तिका शततारश्च मखामृगशिरास्तथा ।
चित्राश्रवणपुषाश्वीत्यष्टभा इति निर्णता ॥ ८१ ॥
स्वस्वसञ्चारपरिधिमण्डलकेन्द्ररेखामु चारत ।
एते ग्रहाश्च नक्षत्रास्सामीप्य शरदिक्रमात् ॥ ८२ ॥
कुज-मङ्गल, अर्क-सूर्य, शनि, जाम्भारि ?, -शुक्र?, बुध, माण्डलिक-चन्द्रमा, रुरु ?, विश्वप्रका-
शक-बृहस्पति ये आठ ग्रह कहे गए हैं। कृत्तिका, शतवार-शतभिषक्, मखा-मघा, मृगशिरा-मृगशीर्ष
चित्रा, श्रवण, पूषा, अश्विनौ ये आठ दीप्त नक्षत्र निर्णय किए हैं। ये ग्रह नक्षत्र अपने अपने सञ्चार-
गतिमार्ग के परिधिमण्डल की केन्द्ररेखाओं में गतिक्रम से क्रमश शरद् ऋतु में समीपता को प्राप्त
हुआ करते हैं ॥ ८०-८२ ॥