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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 218, कुल 368 में से

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पृष्ठ 218

शब्दाकर्षणयन्त्र ] [ १६५
कुर्याच्छास्त्रोक्तविधिना पश्चादावरयेद् दृढम् ।
यदा स्यादशनिपातसूचकं घनगर्जितम् ॥१०१॥
तत्क्षणाद् यन्त्रावरणदर्पणस्त्रुटितो (तं?) भवेत् ।
पश्चात् तन्त्रीमुखनालरन्ध्राच्छब्द प्रजायते ॥१०२॥
अत्यन्तचलनं तेन भवेत् तन्त्र्या स्वभावतः ।
दृश्यन्ते यन्तॄणां याने चिह्नान्येतान्यथाक्रमात् ॥१०३॥
पतत्यशनिपातोऽद्य इति मत्वातिशीघ्रतः ।
त्रिचक्रकीलभ्रमणं कुर्यादत्यन्तवेगतः ॥१०४॥
भ्राम्यते तेन तच्छत्री शतलिङ्गाप्रमाणतः ।
पश्चात् तन्मणिकील च भ्रामयेद् वेगतः क्रमात् ॥१०५॥
—करे, शास्त्रोक्तविधि से ढक दे। जब विद्युत् गिरने का सूचक मेघगर्जन हो तो तत्क्षण यन्त्र
का आवरणदर्पण टूट जाता है, पश्चात् तारों के सिरे की नाल के छिद्र से शब्द होता है, इससे तार मे
अत्यन्त चंचल स्वभावत होती है। चालकयात्रियों के विमान यान में जब ये चिह्न दिखलाई पड़ते है
तो अब विद्युत् का गिरना होगा ऐसा समझ अति शीघ्र अत्यन्त त्रिचक्रकील का भ्रमण करदे इससे वह
छत्री १०० डिग्री के प्रमाण से घूमने लगती है पश्चात् उस मणिकील को भी वेग से घुमा देती
है-॥१०१-१०५॥
तेन सम्भ्रमते वेगात् तन्मणिसर्वतोमुखं ।
छत्रीवेगादशनिपातवेगशान्तिर्भविष्यति ॥१०६॥
मणिवेगादशनिपात क्रोशान्ते यानतो भवेत् ।
विमानरक्षणं तेन यन्तॄणा पालनं तथा ॥१०७॥
भवेत् तस्माच्छिरः कीलयन्त्रमुक्तं यथाविधि ।
इससे मणि सर्वतोमुख वेग से घूमती है, छत्री के वेग से विद्युत् गिरने के वेग की शान्ति
हो जावेगी—हो जाती है। मणि के वेग से विद्युत् गिरने का वेग विमान से कोस भर परे हो जावेगा,
इससे विमान का रक्षण तथा चालकयात्रियों का बचाव हो जावे—हो जाता है अतः शिरः कीलकयन्त्र
यथाविधि कहा है ॥१०६—१०७॥
अथ शब्दाकर्षणयन्त्रनिर्णयः — अथ शब्दाकर्षणयन्त्र का निर्णय है—
एवमुक्त्वा शिरः कीलयन्त्रमत्र यथाविधि ।
शब्दाकर्षणयन्त्रोऽथ सङ्ग्रहेण प्रकीर्त्यते ॥१०८॥
इस प्रकार शिरः कीलयन्त्र यहां यथाविधि कहकर शब्दाकर्षणयन्त्र आज-अब संक्षेप से कहा
जाता है।
तदुक्तं क्रियासारे — यह क्रियासार ग्रन्थ में कहा है—
अष्टदिक्षु विमानस्य क्रोशाद् द्वादशकोपरि ।
स्तन्वन्नतन्त्रीमार्गेण मृगपक्ष्यादिभिस्तथा ॥१०६॥