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सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 215

१६२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
शक्तिपञ्जरकीलकयन्त्रनिर्णयमुच्यते ।
कान्तक्रौञ्चिकलोहान् त्रीन् दशाष्टनवभागत ॥ ७२ ॥
सम्पूर्य मूषिकामूषामुखे पश्चाद् यथाविधि ।
निधायातपकुण्डेथ शतकक्ष्यमोष्णत क्रमात् ॥ ७३ ॥
सङ्गाल्य तन्मुखे विद्युच्छक्ति संयोजयेद् दश ।
ततो यन्त्रमुखे वेगात् पूरयेदेकत क्रमात् ॥ ७४ ॥
अत्यन्तमुदुल शुद्ध शक्तिगर्भाभिध (द ?) इदम् ।
भवेल्लोह तेन यन्त्र कुर्यात् तद्विधिरुच्यते ॥ ७५ ॥
विद्यु त को प्रेरित करने के अर्थ विमानयान के सर्वाङ्ग की सन्धियों में शक्तिपञ्जर कीलकयन्त्र
का निर्णय कहा जाता है । कान्त—अयस्कान्त, क्रौञ्चिक—कृत्रिम लोह विशेष, लोह—साधारण लोहा इन
तीनों को १०, ८, ६ भागों से मूषिका आकार की मूषा—बोतल के मुख में भरकर पश्चात् यथाविधि
आतपकुण्ड में रखकर १०० दर्जे की उष्णता से क्रम से गलाकर उसके मुख में विद्यु त् शक्ति १० संख्या
में युक्त करे फिर यन्त्रमुख में वेग से एक वार भर दे, अत्यन्त मृदुल शुद्ध शक्तिगर्भ नामक लोहा वह
हो जावे उस से यन्त्र बनावे उसकी विधि कही जाती है—विधि कहते हैं ॥ ७१-७५ ॥
बाहुमात्रमुन्नत तावदायाम द्रोणिवत् सुधी ।
पीठ कुर्याच्छक्तिगर्भोलोहेनैव यथाविधि ॥ ७६ ॥
पीठमूले तथामध्ये तदन्ते च यथाक्रमम् ।
अर्धचन्द्राकारमुखकीलस्तम्भान् दृढ यथा ॥ ७७ ॥
आदौ संस्थापयेत् पट्टिका ताम्रनिर्मिताम् ।
संयोजयेत् तत् कीलशङ्कुभिर्बन्धयेद् दृढम् ॥ ७८ ॥
तन्त्रीनु शलाकान् तच्छक्तिगर्भोलोहेन शास्त्रतः ।
सच्छिद्रदण्डनालान् त्रीन् (त्री ?) कृत्वा पश्चाद् यथाविधि ॥७९॥
दण्डच्छिदेषु सर्वत्र शलाकान् योजयेत् ततः ।
सप्रमाण लोहतन्त्री शलाकोपरि वेष्टयेत् ॥ ८० ॥
बाहुमाप में ऊंचा बाहुमाप लम्बा द्रोणी हाण्डी की भाति पीठ—विमानस्थली बुद्धिमान् उस
शक्तिगर्भ लोहे से ही यथाविधि बनावे । पीठ के मूल में मध्य में और अन्त में यथाक्रम अर्धचन्द्राकार
मुखवाली कीलों के स्तम्भों को दृढ़रूप में आदि में संस्थापित करे पश्चात् ताम्बे से बनी पट्टिका को लगावे
फिर कील शङ्कुओं से बान्ध दे, तारों को शलाकाओं को उस शक्तिगर्भ लोहे से शास्त्रानुसार छिद्रसहित
दण्डरूप नालों को तारों को बनाकर पश्चात् यथाविधि दण्डों के छिद्रों में सर्वत्र शलाकाओं को जोड़ दे
फिर माप से लोहे के तारों को शलाकाओं के ऊपर लपेट दे ॥ ७६–८० ॥
वर्तुलं पञ्जर तेन भवेत् सुदृढमद्भुतम् ।
तत्पञ्जर ताम्रपट्टिकोपरि स्थापयेत् ततः ॥ ८१ ॥