बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ १८८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
उस शक्तिवेग को निःशेष शीघ्र निवृत्त करे। विकसनकीली को यथाविधि वेग से सञ्चारित
करे, आदि में यन्त्राक्षों का आवरण स्वत हो जावे । फिर समग्र विमानावरक निश्चित हो जाता है।
फिर विमान यान के आश्रयक के ऊपर तीनों शक्तियां मूल से अग्रभाग तक व्याप्त करके वेग से उसका
उद्वेग करेंगी पश्चात् वेग से अंगुल भ्रामणी कील को घुमावे । चक्रवेग शक्तिवेग को धीरे धीरे इकट्ठे
करके शीतशतायनी नालतारों के सम्मुख प्रेरित करदे तारों के मूल कीलें-पेंच घुमावे उन तीनों शक्तियों
का वेग तो पश्चात् तीन नालों के अन्दर प्रविष्ट होकर बाहिरी आकाश में उस मुख से लय को प्राप्त हो
जाता है । चालक यात्रियों का त्राण तथा यानरक्षण अदृश्यत्व होने वाले संकट की निवृत्ति हो जावे एक
काल में उससे शक्त्युद्गम यन्त्र यथाविधि कहा है ॥ ३१-३७ ॥
शैत्यग्राहक्लोहमुक्तं लोहतन्त्रे — शैत्यग्राहक लोहा लोहतन्त्र में कहा है—
चन्द्रोपल क्रोडिकसोमकन्दे विश्वावसु कौशिकचन्द्रमास्ये ;
वार्ध्र्यश्वक वारुणपञ्चकुड्मले सिंहास्यक शङ्खुलवाक्षुपाले(णे?) ॥ ३८ ॥
एतान् समांशान् परिशोधितान् क्रमात् संगृह्य शुण्डालकमूषमध्ये ।
सम्पूर्य चञ्चुमुखकुण्डगर्भे संस्थाप्य पञ्चाननभस्त्रिकामुखात् ॥ ३६ ॥
वेगेन सङ्गाल्य च तद्रस शनैर्यन्त्रास्यमध्ये परिपूरयेत् क्रमात् ।
एव कृते शुद्धमतीवसूक्ष्म भवेत् सुशैत्यग्राहक्लोहमद्भुतम् ॥ ४० ॥ इत्यादि ॥
चन्द्रोपल—नीलोत्पल—नीलोफर, क्रोडिक—वाराही कन्द या गेण्डे का सींग, सोमकन्द ?,
विश्वावसु ? धातुविशेष ?, कौशिक—कृत्रिम लोहा, चन्द्रमास्य—चन्द्रकान्त पत्थर ?, वार्ध्र्यश्वक
वाध्रयश्वक—तीक्ष्ण लोहा ?, वरुण—वरना वृक्ष या थूहर, पञ्चकुड्मल—पञ्चरत्नो ? सिंहास्य—वासा,
शङ्खुलवा—शङ्खखास—भीमसेनी कपूर, अक्षुपाल—अक्षुगाला, धात्री—आंवला। इन्हें शोधित समानांश
में लेकर शुण्डालकमूषा के मध्य भर कर चञ्चुमुख कुण्ड के मध्य में रख कर पञ्चमुखवाली
भस्त्रिकामूल से वेग से गला कर उसके रस को धीरे से यन्त्र के मुख में भरदे तो शुद्ध अतीवसूक्ष्म सुशैत्य
ग्राहक लोहा हो जावेगा ॥ ३८-४० ॥
शीतघ्नदर्पणमुक्तं दर्पणप्रकरणे—शीतनाशक दर्पण कहा है दर्पणप्रकरण में--
सीस कपालि वरचन्द्रमास्य पञ्चाङ्गुलि शैशिरिक वृणाङ्कम् ।
क्षारत्रय शुद्ध(र ?) सुवर्चल सिञ्चारुण सूक्ष्मतर च वालुकम् ॥ ४१ ॥
बम्भारिक चाञ्जनिक कुरङ्ग पञ्चोर्मिक चन्द्ररस शिवारिकम् ।
एतान् समाहृत्य समाशत क्रमात् विशोधितान् सेहिकमूषमध्ये ॥ ४२ ॥
सम्पूर्य पद्माकरकुण्डगर्भे संस्थाप्य शूर्पोदरभस्त्रिकामुखात् ।
सङ्गाल्य कक्ष्यत्रिशतोष्णात. क्रमाद् रस समाहृत्य शनैर्यथाविधि ॥४३॥
सम्पूरयेद् यन्त्रमुखान्तरे क्रमादेव कृते शुभ्रमतिदृढ लघु ।
भवेत् सुशीतघ्नकदर्पण ततश्शुभ्र सुसूक्ष्म सुमनोहर च ॥ ४४ ॥ इत्यादि ॥
सीसा, कपालि ? कपाली—विडङ्ग या कपाल—तालमखाना, चन्द्रमास्य—चन्द्रकान्त मणि ?,
पञ्चाङ्गुलि—पञ्चांगुल—एरण्ड, शैशारिक—शैशोरिक—निम्बबीज, वृणाङ्क—वृणमूल—गन्धतृण ?,