बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशक्तिपञ्जरकील्यन्त्र ] [ १६१
सार्पतियंग्दण्डवक्रगतिभेदादिभि क्रमात् ।
विमानं चोदयेद् बुद्ध्या पुरोभागस्थचक्रतः ॥ ६४ ॥
तथैवान्ये कीलकादिसहायैरपि शास्त्रतः ।
एतद्यन्त्रसहायेन भवेद् वक्रगति क्रमात् ॥ ६५ ॥
विमानस्यातिवेगेन तेन दम्भोलिकादिभि ।
सम्भवापायनाशस्तु तत्क्षणादेव जायते ॥ ६६ ॥
विमानरक्षणं तस्माद् यन्त्रेणा च विशेषतः ।
भवेत् तस्मात् सग्रहेण यथावच्छास्त्रत क्रमात् ॥ ६७ ॥
वक्रप्रसारण नामयन्त्रमुक्तं मनोहरम् ॥ इत्यादि ॥
सन्धि तन्त्री चक्रवर्गों से उस उस मार्ग के अनुसार परस्पर सन्धि संयोजन कीलों का निबन्धन
उस उस स्थान के प्रमाण से सरलरूप में करे बाहुपरिमाण लम्बे के पीठ में यह सब यथाविधि रच कर
विमान के आधार पार्श्व में दृढ यथेष्ट स्थापित करे । पश्चात् समयानुसार सर्प की भांति तिरछे दण्ड
जैसी वक्रगति भेद आदि से विमान को बुद्धि से सामने के भाग वाले चक्र से प्रेरित करे तथा अन्य
कील आदि सहायक से भी शास्त्रानुसार इस यन्त्र की सहायता से वक्रगति विमान की अतिवेग से
दम्भोलि-(तारपीडो) जैसी वस्तुओं से होने वाले अनिष्ट का नाश तत्क्षण हो जाता है विमान की
तथा विशेषतः चालक और यात्रियों की रक्षा होजावे अतः शास्त्रानुसार संक्षेपसे मनोहर चक्रप्रसारण यन्त्र
कहा है ॥ ६१-६७ ॥
अथ शक्तिपञ्जरकील यन्त्रनिर्णय - अब शक्तिपञ्जरकील यन्त्र का निर्णय देते हैं-
एवमुक्त्वा वक्रप्रसारणयन्त्रमतं परम् ।
शक्तिपञ्जरकील यन्त्रमथ प्रवक्षते ॥ ६८ ॥
इस प्रकार वक्रप्रसारण यन्त्र कहकर इससे आगे शक्तिपञ्जरकील यन्त्र अब कहते हैं ।
तदुक्तं क्रियासारे- यह वह क्रियासार ग्रन्थ में कहा-
विमानसर्वाङ्गसन्धिस्थानभेदेषु शास्त्रतः ।
विमानाङ्गेषु सर्वत्र आमूलाग्रं यथाविधि ॥ ६६ ॥
विद्युत्सञ्चोदनार्थाय तत्कालानुसारत ।
शक्तिपञ्जरकीलकयन्त्रसस्थापन क्रमात् ॥ ७० ॥
विमानमध्यकेन्द्रे च कुर्याच्छास्त्रविधानतः ॥ इति
विमान के सब अङ्गों के भिन्न भिन्न सन्धिस्थानों में शास्त्र से विमान के अङ्गों में सर्वत्र मूल
से अग्रभाग तक यथाविधि विद्युत् को प्रेरित करने के अर्थ उस उस समय के अनुसार क्रम से शक्ति-
पञ्जर कीलक यन्त्र का संस्थापन विमान के मध्यकेन्द्र में विधान से करे ॥ ६६-७० ॥
तदुक्तं यन्त्रसर्वस्वे- यह वह यन्त्रसर्वस्व ग्रन्थ में कहा है-
विद्युत्सञ्चोदनार्थाय यानसर्वाङ्गसन्धिषु ॥ ७१ ॥