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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 219, कुल 368 में से

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पृष्ठ 219

१६६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
सन्ताडनभ्रामणाद्यैर्मनुष्यैरष्टयन्त्रकैः ।
गूढेन वा प्रकाशेन ये शब्दास्सम्भवन्ति हि ॥ ११० ॥
तेषां सङ्ग्रहणार्थाय शब्दाकर्षणयन्त्रकम् ।
व्योमायनभुजे सम्यक् स्थापयेद् विधिवत्सुधीः ॥ १११ ॥ इत्यादि ॥
विमान की आठों दिशाओं में १२ कोश से ऊपर तारसहित ताररहित मार्ग से तथा मृगपक्षी
आदि के द्वारा सन्ताडन भ्रमण आदि से मनुष्यों से आठयन्त्रों से गूढ या प्रकट जो शब्द उत्पन्न होते हैं
उनके पकड़ने के अर्थ शब्दाकर्षण यन्त्र विमान की भुजा में सम्यक् विधिवत् बुद्धिमान् स्थापित
करे ॥१०६—१११॥
यन्त्रस्वरूपमुक्तं यन्त्रसर्वस्वे—यन्त्रस्वरूप यन्त्रसर्वस्व में कहा है—
चतुरस्रं वर्त्तुलं वा शुद्धवैडाललोहतः ।
पीठं कृत्वाथ तन्मध्ये शङ्कु संस्थाप्य पार्श्वयोः ॥ ११२॥
सङ्कल्पस्वरवादित्रशब्दभाषापकर्षकम् ।
रोरुवापक्षिणो नोचेद् गृञ्जनीपक्षिणोपि वा ॥ ११३॥
शुद्धीकृतेन देहस्थचर्मणा मृदुलेन च ।
कृत्वा कन्दु(तु?)कवद् गोलद्वयं सूक्ष्म लघु दृढम् ॥११४॥
स्थापयेद् विधिवत् पश्चात् तन्मध्ये कटनद्रवम् ।
सम्पूर्य सुरघादर्शापात्रे संस्थापयेत् क्रमात् ॥११५॥
चौकोर या गोल शुद्धवैडाल लोहे से पीठ-भूमिका बनाकर उसके मध्य में शंकु संस्थापित करे
दोनों पार्श्वों में सङ्कल्प स्वर वादित्र—बाजे शब्द भाषा—भाषण के खींच लेनेवाले यन्त्र को लगावे,
रोरुवा ? पक्षी के नही तो गृञ्जनी ? पक्षी के भी शुद्ध किए देहस्थ मृदुल चमड़े से गेंद के समान सूक्ष्म
छोटे दृढ दो गोल विधिवत् स्थापित करे पश्चात् उनके मध्य में कटनद्रव ? भरकर सुरघादर्श ? पात्र में
क्रम से संस्थापित कर दे ॥११२—११५॥
ध्वन्याकर्षणघण्टारलोहनिर्मितमद्भुतम् ।
तन्त्रीगुच्छसमायुक्त शब्दोन्मुखशलाककम् ॥ ११६ ॥
दृढ पिण्डद्वयोर्मध्ये द्रावकोपर्यथाक्रमम् ।
प्रतिष्ठाप्याथ कवचाकदर्पणावरण क्रमात् ॥ ११७ ॥
कृत्वा मूलेऽङ्गुष्ठमात्रचक्रग्रन्थित्रयं तत ।
सन्धारयेत् तदारभ्य शलाकान्तं यथाविधि ॥ ११८ ॥
अत्यन्तसूक्ष्मान्मृदुलान् संयोजयेत् क्रमात् ।
एतत्तन्त्रीन् समावृत्य म्यग्बिलं सूक्ष्मरन्ध्रकम् ॥ ११९ ॥
क्वणादर्शेन रक्षित करण्डमुपरि न्यसेत् ।
द्रोणास्यपात्रं तेनैव कृतं तस्योपरि क्रमात् ॥ १२० ॥