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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 213, कुल 368 में से

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पृष्ठ 213

[ १६० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
वर्तुलं कारयेच्चक्रं नालदण्डेन योजितम् ।
यानस्यैषादण्डमूलगुहावर्ते यथाविधि ॥ ५४ ॥
चतुरङ्गलमायामं बाहुमात्रं मनोहरम् ।
क्रकचाङ्गलचक्रेभ्यो'षोडशेभ्यो यथाविधि ॥ ५५ ॥
विमान यान के नाशार्थ शत्रुओं द्वारा डाले हुए दम्भोली आदि आठ यन्त्रों से नाश सम्भव
है उस नाश की निवृत्ति के अर्थ विमान का वक्रप्रसारण कील यन्त्र यहां कहते हैं। लोमश—कसीस,
अश्वत्थ सञ्जात-पीपल की लाख या गोन्द, शुल्व – ताम्बा १६ भाग, लघु-काला अगर ३ भाग, छ्विङ्का-लोह
विशेष या जस्ता ?, ५, आञ्जनक—सुरमा १ भाग मिला कर १०० दर्जे की उष्णता से गलावे, फिर यह
आरावाला ताम्र स्वर्ण के आकार का हल्का दृढ हो जाए, ३ बालिश्त लम्बा ३ बालिश्त ऊंचा गोल
चक्र करावे नालदण्ड से युक्त करे यान के ईषादण्ड मूल गहरे घेरे में यथाविधि ४ अंगुल मोटा बाहु-
मात्र लम्बा मनोहर १६ क्रकचांगुलचक्र—आरांगुल वाले चक्रों से यथाविधि—॥ ४६-५५ ॥
प्रतिष्ठितं तैलशुद्धं दण्डद्वयमुखान्तरे ।
चक्रमूलं समारभ्य यद्दण्डान्तरतं क्रमात् ॥ ५६ ॥
यानस्यैषादण्डमूलगुहावर्तस्थनालयो ।
अष्टाङ्गलचक्रेभ्य कृतमार्गानुसारत. ॥ ५७ ॥
त्रिपर्वसन्धिसंयुक्तशलाकान् तैलसंस्कृतान् ।
सन्धायं विधिवत् पश्चात्तदन्ते शाखन. क्रमात् ॥ ५८ ॥
चक्रसन्धिं प्रकल्प्याधारारचक्रमुखान्तरे ।
कीली सन्धारयेत् सम्यगुभयो पार्श्वयो क्रमात् ॥५९॥
मध्ये धूमप्रसारणकीलको पार्श्वयोस्तथा ।
सन्धारयेत् तथा धूमबन्धने कीलद्वयम् ॥ ६० ॥
प्रतिष्ठित तैल से शुद्ध दो दण्डों के मुख के अन्दर चक्रमूल को आरम्भ कर दण्डों के अन्दर
से विमान के ईषादण्ड—धुरा दण्ड मूल के गुहावर्तस्थ दो नालों में आठ अंगुल वाले चक्रों से मार्ग के
अनुसार बनाए तीन पर्वसन्धिसंयुक्त तैल से संस्कृत शलाकाओं को लगा कर फिर उनके अन्त में चक्र-
सन्धि बना कर आरावाले चक्रमुख में दोनों पार्श्वों में कीली लगावे; बीच में धूमप्रसारण दो कीलें
दोनों पार्श्वों में लगावे तथा धूम को रोकने की दो कीलें भी लगावे ॥ ५६-६० ॥
सन्धितन्त्रीचक्रवर्गैस्तत्तन्मार्गानुसारतः ।
परस्परं सन्धिसंयोजनकीलीनिबन्धनम् ॥ ६१ ॥
कारयेत् सरलेनैव तत्तत्स्थानप्रमाणतः ।
बाहुमात्रे ताम्रपीठे एतत्सर्वं यथाविधि ॥ ६२ ॥
प्रकल्प्याधारपार्श्वेथ विमानस्य दृढं यथा ।
संस्थापयेद् यथाकामं पश्चात् कालानुसारतः ॥ ६३ ॥