बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशक्त्युद्गमयन्त्र ] [ १८४
तथा श्रवणामण्डलयोश्शक्तिसङ्घर्षणक्रमात् ।
जायते स्फोरणी नाम शक्तिश्शीतप्रवाहिका ॥६॥
कृत्तिका नक्षत्र और मङ्गलग्रह की शक्तियों के संघर्षवश स्वतः शक्त्युद्मा नामक कोई शक्ति
प्रकट हो जाती है वैसे ही शतभिषक् नक्षत्र और सूर्य की शक्तियों के संघर्ष से शीतज्वालामुखी नाम
की कोई शक्ति प्रकट हो जाती है वैसे ही मघा नक्षत्र और शनि ग्रह की शक्तियों के संघर्ष से शैत्यदंष्ट्रा
नामक शक्ति सर्वतोमुख उत्पन्न हो जाती है । तथा मृगशिरा नक्षत्र और ब्रम्भारि-प्रजापति या बृहस्पति ?
की शक्तियों के संघर्ष से शीतरसवातशक्ति महोज्ज्वला उत्पन्न हो जाती है । वैसे ही चित्रा नक्षत्र और
बुध ग्रह की शक्तियों के संघर्ष से शैत्यहेमा नामक कोई उज्ज्वल शक्ति उत्पन्न हो जाती है । तथा
श्रवण नक्षत्र और मण्डल-मण्डलवृत्तवाले चन्द्र ? की शक्तियों के संघर्ष से स्फोरणी नामक शीतप्रवाहिका
शक्ति उत्पन्न हो जाती है ॥४-६॥
पूषारुरुकयोश्शक्तिसङ्घर्षणवशात् तथा ।
सजायते शीतघनरसशक्तिर्महोर्मिला ॥१०॥
विश्वप्रकाशाश्विन्योश्च शक्तिसङ्घर्षणवशात् स्वतः ।
शैत्यमण्डकिनी नाम काचिच्छक्ति प्रजायते ॥११॥
शैत्योद्गमनाभिधा शक्तिश्शीतज्वालामुखी तथा ।
शैत्यदंष्ट्रा शीतरसज्वालाशक्तिस्तथैव च ॥१२॥
शैत्यहेमा स्फोरणी च शीतघनरसात्मिका ।
शैत्यमण्डकिनी चेति शक्तयोष्टौ प्रकीर्तिता ॥१३॥
तास्वान्योन्ययोगेन ऋतुकालानुसारत ।
भिद्यन्ते षट् प्रकारेण शक्तिभेदस्ततोभवेत् ॥१४॥
पूषा-रेवती नक्षत्र और रुरुक ? की शक्तियों के संघर्षवश शीतघनरसशक्ति महोर्मिला-
नदीतरङ्गोंवाली उत्पन्न हो जाती है, विश्वप्रकाश ? और अश्विनियों की शक्ति के संघर्षवश शैत्यमण्डू-
किनी नामक कोई शक्ति प्रकट हो जाती है । शैत्योद्गमनामक शक्ति, शीतज्वालामुखी, शैत्यदंष्ट्रा,
शीतरसज्वालाशक्ति, शैत्यहेमा, स्फोरणी, शीतघनरसात्मिका, शैत्यमण्डूकिनी ये आठ शक्तिया
कही हैं वे अन्योन्य के सम्बन्ध से ऋतुकालानुसार भिन्न भिन्न होती है शक्तिभेद तो छ प्रकार
का है ॥१०-१४॥
तदुक्तमृतुकल्पे—वह ऋतुकल्प ग्रन्थ में कही है—
वसन्ते पञ्चधा ग्रीष्म ऋतो सप्तप्रकारत ।
अष्टधा वार्षिके तद्वत् त्रिधा शरदि वर्णित ॥१५॥
हे (है?) मन्ते दशधा प्रोक्तो द्विधा शिशिरतौ ❄ क्रमात् ।
एव क्रमेण भिद्यन्ते शक्तयष्षट् प्रकारत ॥१६॥
❄ शिश्रऋतौ सस्तेलेले ।