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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 205, कुल 368 में से

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पृष्ठ 205

१८२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
ततश्शक्तित्रयं गत्वा आकाशे पतति स्वयम् ।
पश्चाद् वातप्रवाहे संम्मिलित्वा नाशमेधते ॥ ६७ ॥
तस्माद् विमानसञ्चारो अनायासेन सिध्यति ।
—तीनों शक्तियों के अवशिष्ट समग्र अंश को अतिवेग से कहे हुए आठ नालों के छिद्रों में कील
पच चला कर लगा दे फिर तीनो शक्तियां आकाश में पहुंच कर गिर जाती हैं—स्वयं नष्ट हो जाती हैं
पश्चात वायुप्रवाह में मिल कर नाश को प्राप्त हो जाती हैं अत विमानसञ्चार अनायास सिद्ध होता
है ॥ ६६-६७ ॥
अथ शक्त्युद्गमयन्त्रनिर्णय — अथ शक्त्युद्गम यन्त्र का निर्णय देते हैं—
एवमुक्त्वा प्राणकुण्डलिनोयन्त्रमत परम् ।
अथ शक्त्युद्गमयन्त्रस्सङ्ग्रहेण निरूप्यते ॥ ६८ ॥
इस प्रकार प्राणकुण्डलिनी यन्त्र कहकर उससे आगे शक्त्युद्गम यन्त्र संग्रह से निरूपित
किया जाता है ॥ ६८ ॥
उक्तं हि खेटविलासे—खेटविलास में कहा है—
ग्रहभानामष्टशक्तीर्महावारुणीशक्ति ।
आकृष्यन्ते पौर्णमायां कार्त्तिके मासि वेगत ॥ ६९ ॥
आकाशकक्ष्यपरिधिकेन्द्रेष्वथ यथाक्रमम् ।
सप्तत्रिंशोत्तरशतकेन्द्ररेखापथि क्रमात् ॥ ७० ॥
जलपिञ्जूलिकाशक्त्याकर्षणादतिवेगत ।
तच्छक्तयोऽष्टौ सर्वत्र व्याप्नुवन्ति विशेषत ॥ ७१ ॥
अन्योन्यशक्तिसंसर्गाद्धिमोद्रेको भयङ्कर ।
भवेत् पश्चात् त्रिधा तद्विभागस्स्याच्छक्तिभेदत ॥ ७२ ॥
तेष्वेकांशो शीतरसरूपवातो भवेत् तत ।
अपरो जलशो (सी ?) तस्य सीकराकारमेघते ॥ ७३ ॥
अन्यो भवेद् वातशीतरसप्रवाहिक क्रमात् ।
यदा यानस्समायाति केन्द्ररेखापथि क्रमात् ॥ ७४ ॥
वातशीतरसप्रवाहिकशक्तिस्स्ववेगत ।
विमानशक्तिसर्वस्वमपकर्षति तत्क्षणात् ॥ ७५ ॥
ग्रह नक्षत्रों की आठ शक्तियां महावारुणी शक्ति से कार्तिक मास में पौर्णमासी में वेग से
खींची जाती है, आकाशकक्षा सम्बन्धी परिधि केन्द्रों में यथाक्रम १३७ वें केन्द्ररेखामार्ग में जल
की पिनी रुई जैसी भाप शक्ति—अभ्रशक्ति के आकर्षण से अतिवेग से वे आठ शक्ति सर्वत्र
विशेष व्याप जाती हैं, एक दूसरे के शक्तिसंसर्ग से भयंकर हिम का उत्थान हो जावे पश्चात् शक्तिभेद
से उसका विभाग तीन प्रकार हो जावे, उनमें एक अंश शीतरसरूप वायु—ठण्डी भापमय वायु हो