बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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यन्त्रस्वरूपमुक्तं यन्त्रसर्वस्वे— यन्त्रस्वरूप यन्त्रसर्वस्व में कहा है—
यदपायो विमानस्य भवेदशनिपातत ।
तदपायनिवृत्त्यर्थं शिर कीलकयन्त्रकम् ॥६१॥
सङ्ग्रहेण प्रवक्ष्यामि शास्त्रोक्तेनैव वर्त्मना ।
यावत्प्रमाण यानस्य शिरस्तस्तावदेव हि । ६२॥
कुर्याच्छत्रिं शलाकाद्यैर्लोहावरणात् क्रमात् ।
विषकण्ठाख्यलोहेनैवान्यथा निष्फल भवेत् ॥६३॥
तेनैव बाहुमात्रेण तद्दण्डं पीठमेव च ।
कुर्याच्चक्राकृतिं पश्चाद् वकतुण्डलोहत ॥६४॥
त्रिचक्रकीलकान् कृत्वा त्रीन् विमानस्य शास्त्रत ।
आदौ मध्ये तथा चान्ते स्थापयित्वा तत परम् ॥६५॥
विद्युत् के गिरने से जिससे कि विमान का विनाश हो जाता है उस विनाश या बिगाड़ की
निवृत्ति के अर्थ शिर कीलकयन्त्र संक्षेप से शास्त्र मार्ग से कहूंगा, जितना माप विमान के शिर का हो
उतने माप की छत्री शलाका आदि से लोहे के आवरण से करे विषकण्ठ नामक लोहे से करे अन्यथा
निष्फलता होजावे । उसी लोहे से बाहुमाप से उसके दण्डे और चक्राकार पीठ को बनावे पश्चात् वकतुण्ड
लोहे से तीन चक्रवाली तीन कीलों को करके विमान के आदि में मध्य में और अन्त में स्थापित
करके फिर—॥६१-६५॥
सदण्डं स्थापयेच्छत्रिं कीलद्वयमध्यत ।
मणिमग्निकुठाराख्य लोहपञ्जरसयुतम् ॥६६॥
किरीटवत्तच्छिरसि स्थापयेत् सरल यथा ।
त्रिचक्रकीलभ्रमरकीलकं यन्त्रपार्श्वत ॥६७॥
स्थापयित्वा यथाशास्त्र कुलिशध्वंसलोहत ।
कृत्वा तन्त्रीन् मणिस्थाननालरन्ध्राद् यथाविधि ॥६८॥
त्रिचक्रभ्रामणी कीलस्थानामूलावधि क्रमात् ।
समाहृत्याथ तत्स्थानमध्ये सन्धारयेत् तत ॥६९॥
तन्मुखे शब्दनालं च सकीलं स्थापयेद् दृढम् ।
गुरञ्जिकादर्पणेन तद्यन्त्रावरणं सुधी ॥१००॥
दो कीलों के मध्य में दण्डसहित छत्री स्थापित करे, अग्निकुठारनामक मणि लोहपञ्जर से युक्त
मुकुट की भांति शिर में—विमान के शिरोभाग में सरल स्थापित करे। तीन चक्रोंवाली—पेचों को घुमाने
वाली कील चालक के पास यथाशास्त्र स्थापित करके कुलिश ध्वंस (वज्रध्वंसक—विद्युत् का नाश करने
वाले) लोहे से तारों को मणिस्थान नाल के छिद्र से यथाविधि त्रिचक्रभ्रामणीकीलस्थ मूल
तक यथाविधि लाकर उनमें स्थान के मध्य में जोड़ दे, फिर उनके मुख में कीलसहित शब्दनाल स्थापित
करे, सुरञ्जिकादर्पण से यन्त्र का आवरण बुद्धिमान् —॥६६-१००॥