बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
हस्तलेख कारी संख्या १२—
अथ विद्युद्द्वादशकयन्त्र —अब विद्युद्द्वादशकयन्त्र कहते हैं —
एवमुक्त्वा शब्दकेन्द्रमुख्ययन्त्रं यथाविधि ।
विद्युद्द्वादशकयन्त्रमिदानीं सम्प्रचक्षते ॥१॥
इस प्रकार शब्दकेन्द्रमुख्ययन्त्र यथाविधि कहकर विद्युद्द्वादशकयन्त्र अब कहते हैं ॥१॥
तदुक्तं क्रियासारे—यह कहा है क्रियासार ग्रन्थ में—
वाणस्थधूमकेतूनां मण्डलस्याष्टमेन्तरे ।
त्रिकोटिसप्तलक्षत्रिसहस्रद्विशतोपरि ॥२॥
एकविंशतिसंख्याका वर्तन्ते धूमकेतव ।
विद्युद्गर्भास्तेषु धूमकेतूष्टसहस्रका ॥३॥
महाकालादयो रौद्रा विद्युद्द्वादशलोचनाः ।
तेषु द्वादशसंख्याका प्रशस्ता धूमकेतवः ॥४॥
वाण ? में स्थित धूमकेतुओं के अष्टम मण्डल के अन्दर धूमकेतुओं या पुच्छलतारों के मण्डल
के आठवें अन्तर—सिरे पर ३०७०३२२१ इतनी संख्या वाले धूमकेतु रहते हैं, उनमें विद्युद्गर्भ
८००० महाकाल आदि हैं उनमें रौद्र विद्युद्द्वादश लोचन हैं, १२ संख्यावाले धूमकेतु अच्छे हैं ॥२-४॥
विद्युद्द्वादशकमुक्तं शक्तितन्त्रे —विद्युद्द्वादशकयन्त्र शक्तितन्त्र ग्रन्थ में कहा है—
रोचिषी दाहका सिंही पतङ्गा कालनेमिका ।
लता वृन्दा रटा चण्डी महोर्मि पार्वारिण मृडा ॥५॥
उल्कानेत्रस्थिता ह्येते विद्युतो द्वादश क्रमात् । इति ॥
रोचिषी, दाहका, सिंही, पतङ्गा, कालनेमिका, लता, वृन्दा, रटा, चण्डी, महोर्मि, पार्वारिण, मृडा
ये १२ विद्युत् उल्कानेत्र-उल्काएं जिनकी नायक हैं अर्थात् उल्कारूप हैं ॥५॥
धूमकेतव (वो?) उक्ताः खेटसर्वस्वे—धूमकेतु कहे हैं खेटसर्वस्व ग्रन्थ में—
महाकाली महाग्रामो महाज्वालामुखस्तथा ।
विस्फुलिङ्गमुखो दीर्घवातो लङ्को महोर्मिकः ॥६॥
An exact line-by-line transcription of the document:
विद्युद्द्वादशकयन्त्र ] [ १७५
\ स्फुलिङ्गवमनो गण्डो दीर्घजिह्वो दुरोणक ।
सर्पास्यश्चेति विद्युन्नेत्रोल्का द्वादशधा स्मृता ॥७॥ इत्यादि ॥
महाकाल, महाभास, महाज्वालामुख, विस्फुलिङ्मुख, दीर्घवाल, खब्ज, महोर्मि, स्फुलिङ्गवमन,
गण्ड, दीर्घजिह्व, दुरोणक, सर्पास्य ये १२ प्रकार के विद्युन्नेत्र उल्काएं कही हैं ॥६-७॥
तेषा विद्युत्सम्मोहास्तु शरद्वासन्तयो क्रमात् ।
भवन्त्यादित्यकिरणेष्वन्तर्भू तास्स्वभावत ॥८॥
किरणोल्कस्थशक्तीना परस्परविमेलनात् ।
भवेदज (जि?) गरानाम काचिच्छक्ति र्भयङ्करा ॥९॥
खस्थद्वाविंशतिमकेन्द्रमुखमध्ये यदा क्रमात् ।
व्योमयान समायाति तदाज (जि?) गरसञ्ज्ञिका ॥१०॥
शक्तिर्यान्स्तम्भन स्ववेगात् तत्र
१७६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
विमानावरणान्तर्गुहाशये स्थापयेत् सुधी ।
विद्युद्वेगोपसंहारदर्पणेन यथाविधि ॥ १६ ॥
शलाकान् षट् बाहुमात्रानष्टौ कुर्याद् दृढ यथा ।
अष्टदिक्षु स्थापयेत् तद्विमानावरकोपरि ॥ १७ ॥
विधिवत् स्थापयेत् पश्चाद् दम्भोलिलोहनिर्मितान् ।
कीलीचकान् पञ्चमुखानन्योन्याश्रयसंयुक्तान् ॥१८॥
विमानावरकस्यादौ मध्येचान्ते यथाक्रमम् ।
बध्नीयादावर्तसूक्ष्मशङ्कुभिस्सुदृढ यथा ॥१९॥
पौण्ड्रकादिमणीना तु पञ्जर सूक्ष्मतन्त्रिभि ।
पृथक् पृथक् कल्पयित्वा तन्त्रद्यग्राणि यथाक्रमम् ॥२०॥
विद्युत् के वेग का उपसंहार करनेवाले दर्पण के साथ यथाविधि विमानावरण के अन्तर्गत
गुहाशय—गुहा में रहने वाले यन्त्र को बुद्धिमान् स्थापित करे ६ भुज माप में ८ शलाकाओं को भी ८
दिशाओं में दृढ स्थापित करे उस विमानावरण के ऊपर विधिवत् दम्भोलि लोहे—वज्रलोहे से बने एक
दूसरे से आश्रित मिले हुए पांच मुखवाले कीलबक स्थापित करे, विमानावरण विमान को ढकनेवाले
साधन के आदि में मध्य में और अन्त में यथाक्रम घूमनेवाले सूक्ष्म शङ्कुओं से बान्ध दे, पौण्ड्रक
आदि मणियों का पिञ्जरा सूक्ष्म तारों से पृथक् पृथक् बनाकर तारों के अग्रभागों को यथाक्रम-॥१६-२०॥
एकैककीलमूलाग्रे सम्यक् सन्धारयेत् क्रमात् ।
भवेत् पञ्जरतन्त्रीणा चतुर्णामेककीलक ॥ २१ ॥
पश्चात्सम्भ्रामयेन्मूलकीली वेगाद् यथाविधि ।
पञ्जरैस्सह भ्राम्यन्ति मणयो द्वादश क्रमात् ॥ २२ ॥
तेनावरणकोशाना विकासो भवति ध्रुवम् ।
तेभ्य (१?)पटघनान्तस्थविद्युद्वेगोपहारिणी ॥ २३ ॥
शक्तिर्विजृम्भते सम्यक् प्रतिकोशे विशेषत ।
पूर्वोक्त विद्युत्किरणसञ्जाताज(जि?) गराभिधम् ॥२४॥
शक्ति तन्मणय पश्चात् समाकृष्यातपान्तरात् ।
किरणेभ्य पृथक् कृत्वा तद्वेग सन्निरुध्य च ॥ २५ ॥
एक एक कीली के मूल के आगे लगावे। पिञ्जरे के चार तारों का एक कील—पेंच हो पश्चात्
वेग से मूलकीली को घुमावे तो पिञ्जरों के साथ १२ मणिया घूमती हैं उस से निश्चय आवरण कोशों का
विकास होता है, उन कोशों से पटघन के अन्दर स्थित विद्युत् के वेग को लेने वाली शक्ति प्रत्येक कोश
में सम्यक् विकसित होती है—फैलती है। पूर्वोक्त विद्युत् किरण से उत्पन्न अजिगरा शक्ति को वे मणियां
आतप के अन्दर से खींचकर किरणों से पृथक् करके उसके वेग को रोक कर—॥ २१—२५ ॥
विद्युद्द्वावशक्यन्त्र ] [ १७७
तत्रत्याष्टशलाकेषु योजयन्ति स्वशक्तितः ।
परिगृह्य शलाकास्तच्छक्तिं पश्चात् स्वतेजसा ॥ २६ ॥
पूर्वोत्क्तावरणान्तस्स्थप्रतिकोशमुखान्तरे ।
सयोजयन्ति वेगेन तत्कोशास्तदनन्तरम् ॥ २७ ॥
तच्छक्तिं प्रेषयेद् वेगाद् द्रावकाभिमुखं यथा ।
ततस्सञ्चालयेन्मध्यकीलीमावरणास्थिताम् ॥ २८ ॥
विमानावरकान्तस्स्थद्रवात् तेनातिवेगतः ।
विद्युत्कुठारिका नाम शक्तिरुर्ध्वमुखीस्वत । ॥ २६ ॥
समुत्थाय स्वभावेन कोशस्थाजिगराभिधाम् ।
समाहृत्य स्वशक्त्याथ द्रावणे सन्निरुन्ध्यति ॥ ३० ॥
वहा की आठ शलाकाओं में स्वशक्ति से जोड देती है, पश्चात् शलाकाएं स्वबल से इस शक्ति
को पकड कर पूर्व कहे आवरण के अन्दर स्थित प्रत्येक कोशमुख के अन्दर वेग से संयुक्त कर देते हैं,
उसके अनन्तर वह कोश वेग से उस शक्ति को द्रावक की ओर प्रेरित कर देती है फिर आवरणस्थित
मध्य कीली को चलावे तो विमान के आवरण के अन्दर स्थित द्रावक से अतिवेग से विद्युत्कुठारिका
ऊर्ध्वमुखी शक्ति स्वतः उठकर स्वभाव से कोशस्थ अजगरा नामक शक्ति को अपनी शक्ति से लेकर —
समेटकर द्रावक में रोक लेती है ॥ २६—३० ॥
पश्चादावरणान्तस्स्थान्त्यकीलीप्रचालनात् ।
द्रवस्थाजिगरा शक्ति स्वय पटघनान्तरे ॥ ३१ ॥
भवेद् विलीन सर्वत्र ततो वायुस्स्ववेगतः ।
तत्रस्थाजिगराशक्तिं समाहृत्य पिबेत् क्रमात् ॥ ३२ ॥
तस्मात् तत्क्षणातो व्योमयानबन्धविमोचनम् ।
भवेत् ततो विमानस्थयन्तॄणां सुखद भवेत् ॥ ३३ ॥
पश्चात् आवरण के अन्दर स्थित अन्तिम कीली के चलाने से द्रव में स्थित अजगरा शक्ति
स्वयं पटघन के अन्दर सर्वत्र विलीन हो जावे, फिर वायु अपने वेग से वहा की अजगरा शक्ति को समेट
कर पीले—पीलेता है, इससे तुरन्त विमान के बन्धन का विमोचन-छुटकारा हो जाता है फिर विमानस्थ
यात्रियों को सुख होता है ॥ ३१—३३ ॥
विद्युद्वेगोपसंहारदर्पणमुक्तं दर्पणप्रकरणे—विद्युद्वेगोपसंहार यन्त्र दर्पणप्रकरण में कहा है—
शुण्डालकमुडकान्तकसुघनोदरसत्त्वान् ।
बुडिलाकरविषपङ्कजकुटिलोरगनागान् ॥
सिकतावरगरदाघनगरलामुखभृङ्गान् ।
स्फटिकावरमुक्ताफलवरकान्तकुञ्जरान् ॥ ३४ ॥
क्षारत्रयरविकञ्चुकचुलकोडुपबन्ध्यान् ।
[ १७८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र ]
गरुडारिसुजम्बालिककुशकुड्मलरुक्मान् ॥
शुद्धान् वरषड्विंशतिवस्तूनि परिगृह्य ।
सम्पूर्य विराजमानमूषामुखमध्ये ॥ ३५ ॥
पद्माकरकुण्डान्तरमध्ये वरमूषाम् ।
संस्थाप्य मृगेन्द्राकृतिभस्त्रामुखरन्ध्रै ॥
अतिवेगान् सगल्योष्णैककथ्यत्रिशताशाद् ।
यन्त्रास्येथ निसिञ्चेद्रसमाहृत्य विधानात् ॥ ३६ ॥
अतिमृदुल सुदृढस्फटिकशुद्धतरञ्च
तद्विद्युद्गेहर वरमुकुर प्रभवेद्वि ॥ इत्यादि ॥
शुण्डालक-शुण्डाल कृत्रिम लोहविशेष ? या शुण्डालक-शुण्डी-हाथी शुण्डी वृत्त ?, मण्डूक ?,
अन्तक-कचनार, घनोदर ? इनके सत्त्व । बुण्डिल ?, अकर-अकरा-अमली ?, विष-वत्सनाभ, भृङ्ग-भृङ्ग-
राज-भृङ्गराज बूटा या भृङ्ग-कमल ?, कुटिलशङ्ख ?, उरग-नागकेसर, नाग-सीसा धातु या हाथी दान्त
या नागवल्ली ?, सिकता- शुद्ध रेत ?, वर-सैन्धव नमक, गरद-संख्याविष ?, घन-अभ्रक, गरला-मधु-
मक्खी, मुख-कठल बदल, शृङ्ग-शृङ्गोदर ? या अगरकाष्ठ, स्फटिक-स्फटिक मणि ? या फिटकरी,
अवर-अवरदारुक-पत्र विष ? मुक्ताफल-कपूर ? या मोती या वरमुक्ताफल-बडा मोती, वर-गूगल,
कान्त-अयस्कान्त या वरकान्त-श्रेष्ठ अयस्कान्त, कुरङ्ग ?-करञ्ज-करञ्जवा, क्षारत्रय-सज्जीक्षार यवक्षार
सुहागा, राँय-चाम्बा, कञ्चुक-सर्प की केंचुली, चुलक ?, उदुर ?, बन्ध्या-बांझककोडा या ह्रीवेर,
गरुड-पोनामाखो, अरि-खदिरपत्रिका, सुजाम्बलिक-अकळो जाम्बालिक-जम्बाल-गन्धतृण या
केतकी-केवडा, कुश-कुशातृण, कुड्मल-पुष्पकोरक, रुक्म-तीक्ष्ण लोह । शुद्ध की हुई २६ वस्तुओं को
लेकर विराजमान मूषामुख मध्य में भर कर पद्माकर कुण्ड के अन्दर बीच में बडी मूषा-बोतल को रख
कर सिंहाकृति वाले भस्त्रिकामुख छिद्रों से अतिवेग से गला कर ३०० दर्जे की उष्णता से गला कर यन्त्र
के मुख में पिघले रस को सीञ्च दे, अति मृदुल दृढ स्फटिक अति शुद्ध विद्युद्गेग को हरने वाला श्रेष्ठ
दर्पण हो जावे ॥ ३४-३६ ॥
दम्भोलीलोहमुक्तं लोहतन्त्रप्रकरणे-दम्भोली लोहा कहा है लोहतन्त्रप्रकरण में -
उर्वारक कारविक कुरङ्ग शुण्डालक चन्द्रमुख विरिश्चिम् ।
क्रान्तोदर जा(या ?) लिकसिंहवक्त्री ज्योत्स्नाकर द्विरुडपद्ममौक्तिकी ।
एतान् समाहृत्य विशुद्धलोहान् सन्तोल्य पश्चात् समभागत क्रमात् ॥ ३७ ॥
मण्डूकमूषोदरमध्यास्ये सम्पूर्य चञ्चुमुखकुण्डमध्ये ।
संस्थाप्य पञ्चाननभस्त्रिकामुखात् सञ्जालयेत् पञ्चशतोष्णैककथ्यत ॥ ३८ ॥
दम्भोलीलोह प्रभवेद् विशुद्धमेव कृते शास्त्रविधानत क्रमात् ॥ इत्यादि ॥
उर्वारक, कारविक, कुरङ्ग, शुण्डालक, चन्द्रमुख, विरिञ्च, कान्तोदर, जालिक, सिंहवक्त्र, ज्योत्स्ना-
कर, द्विरुङ्गि, पद्ममौक्तिक । इन विशुद्ध लोहों को लेकर समानभाग तोल कर मण्डूक मूषोदर मध्यम के
मुख में भर कर पञ्चमुख कुण्ड के मध्य में संस्थापित करके पांचमुख वाली भस्त्रिका से ५०० दर्जे की
...`
Wait, what are the traditional 12 gems in Vaimanika Shastra (Mani Prakarana)?
Let's recall Vaimanika Shastra:
The 12 manees for Agnigara / Ajjiga shanti:
- Paundraka
- Jrumbhaka
- Shivira
- Apalochana
- Chapalaghna
- Ashupamani (or Amshupa)
- Veeraha (Veeragho)
- Gajatundika
- Taaraamukha
- Maandalika
- Vajraasya or Panchaasya?
In Vaimanika Shastra: "पञ्चास्यो" or "वज्रास्यो"?
Wait, "वज्रास्य" is diamond-faced/adamantine-faced!
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Is thatवज्रास्यो?
Wait! Look at the letter:वwith aज्रconjunct!
Wait, look at the glyph:
It has a top bar, thenव, but wait, is itव?
Look at the character: it hasवand thenज्र? No, it looks likeवwith something, orपwithञ्च?
Wait, let's zoom in to line 5:
त ा रा मु खो
म ा ण्ड लि को
`
१८० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
क्रियासारेपि--क्रियासार में भी-
क्रमाद् विद्युद्वातधूमशक्तीना सप्रमाणत ।
तत्कालानुसारेण चोदनादिक्रियादिषु ॥४७॥
नियामक़ार्थं तन्नानप्राणकुण्डलीकेन्द्रे ।
मूलस्थाने स्थाप्यते यद् यन्त्रशास्त्रविशारदै ॥४८॥
प्राणकुण्डलिनोयन्त्रमिति तत्सम्प्रचक्षते ।
क्रम से विद्यु त् वायु धूमशक्तियों का प्रमाणसहित उस उसके अनुसार प्रेरणा आदि क्रियाओं
में नियमकार्थ—नियन्त्रण के लिये विमान के प्राणकुण्डलीकेन्द्र वाले मूलस्थान मे जो यन्त्रशास्त्रज्ञ
विद्वानों द्वारा स्थापिन किया जाता है उसे प्राणकुण्डलिनी यन्त्र कहते है ॥४७-४८॥
यन्त्रसर्वस्वेपि—यन्त्रसर्वस्व में भी कहा है—
विमाने धूमविद्युद्वातशक्तीना यथाविधि ।
प्रसारणे चालने च चोदने स्तम्भनेपि च ॥४६॥
विचित्रगमने तद्वत् तिर्यग्गमनकर्मणि ।
नियम्य सप्रमाणेन तत्तन्नालमुखान्तरात् ॥५०॥
प्रेरणार्थ सग़्रहेण यथाशास्त्र यथामति ।
प्राणकुण्डलिनोयन्त्र शास्त्रे स्मिनूसम्प्रकीर्त्यते ॥५१॥
चतुरश्र र्वर्तुल वा केन्द्राष्टकविराजितम् ।
वितस्तित्रयमायाम वितस्तित्रयमुन्नतम् ॥५२॥
कुर्याद् वृपललोहेन पीठमादौ यथाविधि ।
एकैककेन्द्रस्थानेथ चक्रद्वयविराजितम् ॥५३॥
प्रदक्षिणावर्तकीलस्थापनार्थं यथाविधि ।
रन्ध्रत्रयसमायुक्तान् चतुर्दन्तविराजितान् ॥५४।
शङ्कुत्रयसमाविष्टान् सूक्ष्मपीठान् दृढ यथा ।
सन्धारयेत् ततस्तेषा मध्ये शङ्कुमपि क्रमात् ॥५५॥
विमान में धूम विद्युत् वायु शक्तियो के यथाविधि प्रसारण चालन प्रेरणा स्तम्भन में विचित्र-
गमन तथा तिर्यग्गमनकर्म में सप्रमाण नियन्त्रित करके उस उस नालके मुखके अन्दरसे प्रेरणार्थ संक्षेपसे
यथाशास्त्र यथामति प्राणकुण्डलिनी यन्त्र इस शास्त्र में कहा जाता है । प्रथम चौकोन या गोल आठकेन्द्रों
में विराजित ३ बालिस्त लम्बा ३ बालिख्त ऊं'चा वृपल लोहे से पीठ करे । एक एक केन्द्रस्थान में दो
चक्रविराजित हों घूमनेवाली कील के स्थापनार्थ यथाविधि तीन छिद्रों से युक्त चार दान्तों के सहित तीन
शंकुओं से सम्बन्धित—घिरे हुए सूक्ष्मपीठों को लगावे उनके मध्य में शंकु भी लगावे ॥४६—५५॥
उक्तविद्युद्घूमवातपयनालमुलावधि ।
प्रकाशनतिरोधानहस्तचकैर्विराजितम् ॥५६॥
प्राणकुण्डलिनीतन्त्र ] [ १८१
सव्यासपसवचलनकीलकद्वयशोभितम् ।
साङ्केतार्थं तन्मध्ये शब्दनालेन सयुतम् ॥५७॥
पक्षाघातकचक्राद्यैस्सकीलैस्सशलाककै ।
संशोभित रक्तवर्णं नालत्रयमत परम् ॥५८॥
पीठस्थशकुन पूर्वं ईशाग्न्याग्नेयकेन्द्रत' ।
तथैव पश्चिमदिशि मध्यकेन्द्राद् यथाक्रमम् ॥५९॥
यानकुण्डलिनीमध्यमार्गस्थानावधिकमात् ।
सन्धायवृत्तादिकीलेशङ्कुभिस्सुदृढ यथा ॥३०॥
उक्त विद्युत् धूमवात के मार्ग सम्धीनाल मुख अवधि तक प्रकाशक्रिया प्रकट करने और
तिरोभावक्रिया बन्द करने के साधनरूप हस्तचक्रों से विराजित सीधी उल्टी गति देने वाली दो
कीलों—पेंचों से शोभित उनके मध्य में संकेत देने वाले शब्दनाल से युक्त पक्षाघात—एक पक्ष में
गति प्रेरणा देने वाले कीलसहित और शलाकाओंसहित चक्र आदि से युक्त लाल रंग की तीन नालें
पीठस्थ शंकु के पूर्व में ईशान्य आग्नेय केन्द्र से पश्चिम दिशा में मध्य मार्ग के स्थान तक क्रम से लगा
कर जोड कर घूमने वाली कीलों के शंकुओं से जैसे सुदृढ—॥ ५६-६० ॥
संस्थाप्य विधिवत् केन्द्रत्रयमूलावधि दृढम् ।
चालनादिक्रियास्सर्वेहस्तचक्रैर्यथाक्रमम् ॥ ६१ ॥
तत्तत्कीलचलनेन तत्तन्नालमुखान्तरात् ।
भवेत् तेन व्योमयानसञ्चार प्रभवेत् तत् ॥ ६२ ॥
उक्तकेन्द्राष्टस्थानमध्यपीठाद् यथाविधि ।
एकेकनालतन्त्री सरन्ध्रा दृढतरा क्रमात् ॥ ६३ ॥
सन्धायं शङ्कुन पूर्वकेन्द्रपीठान्तरादित ।
पूर्वोक्तनालत्रयोर्ध्वभागे वातायनान्तरे ॥ ६४ ॥
सन्धारयेत् तदग्राणि कीलकैस्सुदृढ यथा ।
यानसञ्चारोपयोग कृत्वा शक्तित्रय तथा ॥ ६५ ॥
—हो ऐसे विधिवत् तीन केन्द्र के मूल तक संस्थापित करके चालन आदि क्रियाएं सब हस्त-
चक्रों से यथाक्रम उनकी कीली चलाने से उस उस नालमुख के अन्दर से हो सके फिर उससे विमान-
सञ्चार बन सके । उक्त केन्द्र के आठ स्थान के मध्य पीठ से यथाविधि छिद्रसहित दृढ एक एक नालतार
को शंकु से पूर्व केन्द्र के पीठ के अन्दर से जोड कर पूर्वोक्त तीन नालों के ऊपरि भाग में वातायनयन्त्र
के अन्दर लगावे उनके अग्रभाग कीलों से दृढ विमानचालन में उपयोग करके तोनों शक्तियों—॥६८-६५॥
शक्तित्रयावशिष्टाश समप्रमतिवेगत ।
उक्ताष्टनालरन्ध्रेषु योजयेत् कोलचालनात् ॥ ६६ ॥
१८२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
ततश्शक्तित्रयं गत्वा आकाशे पतति स्वयम् ।
पश्चाद् वातप्रवाहे संम्मिलित्वा नाशमेधते ॥ ६७ ॥
तस्माद् विमानसञ्चारो अनायासेन सिध्यति ।
—तीनों शक्तियों के अवशिष्ट समग्र अंश को अतिवेग से कहे हुए आठ नालों के छिद्रों में कील
पच चला कर लगा दे फिर तीनो शक्तियां आकाश में पहुंच कर गिर जाती हैं—स्वयं नष्ट हो जाती हैं
पश्चात वायुप्रवाह में मिल कर नाश को प्राप्त हो जाती हैं अत विमानसञ्चार अनायास सिद्ध होता
है ॥ ६६-६७ ॥
अथ शक्त्युद्गमयन्त्रनिर्णय — अथ शक्त्युद्गम यन्त्र का निर्णय देते हैं—
एवमुक्त्वा प्राणकुण्डलिनोयन्त्रमत परम् ।
अथ शक्त्युद्गमयन्त्रस्सङ्ग्रहेण निरूप्यते ॥ ६८ ॥
इस प्रकार प्राणकुण्डलिनी यन्त्र कहकर उससे आगे शक्त्युद्गम यन्त्र संग्रह से निरूपित
किया जाता है ॥ ६८ ॥
उक्तं हि खेटविलासे—खेटविलास में कहा है—
ग्रहभानामष्टशक्तीर्महावारुणीशक्ति ।
आकृष्यन्ते पौर्णमायां कार्त्तिके मासि वेगत ॥ ६९ ॥
आकाशकक्ष्यपरिधिकेन्द्रेष्वथ यथाक्रमम् ।
सप्तत्रिंशोत्तरशतकेन्द्ररेखापथि क्रमात् ॥ ७० ॥
जलपिञ्जूलिकाशक्त्याकर्षणादतिवेगत ।
तच्छक्तयोऽष्टौ सर्वत्र व्याप्नुवन्ति विशेषत ॥ ७१ ॥
अन्योन्यशक्तिसंसर्गाद्धिमोद्रेको भयङ्कर ।
भवेत् पश्चात् त्रिधा तद्विभागस्स्याच्छक्तिभेदत ॥ ७२ ॥
तेष्वेकांशो शीतरसरूपवातो भवेत् तत ।
अपरो जलशो (सी ?) तस्य सीकराकारमेघते ॥ ७३ ॥
अन्यो भवेद् वातशीतरसप्रवाहिक क्रमात् ।
यदा यानस्समायाति केन्द्ररेखापथि क्रमात् ॥ ७४ ॥
वातशीतरसप्रवाहिकशक्तिस्स्ववेगत ।
विमानशक्तिसर्वस्वमपकर्षति तत्क्षणात् ॥ ७५ ॥
ग्रह नक्षत्रों की आठ शक्तियां महावारुणी शक्ति से कार्तिक मास में पौर्णमासी में वेग से
खींची जाती है, आकाशकक्षा सम्बन्धी परिधि केन्द्रों में यथाक्रम १३७ वें केन्द्ररेखामार्ग में जल
की पिनी रुई जैसी भाप शक्ति—अभ्रशक्ति के आकर्षण से अतिवेग से वे आठ शक्ति सर्वत्र
विशेष व्याप जाती हैं, एक दूसरे के शक्तिसंसर्ग से भयंकर हिम का उत्थान हो जावे पश्चात् शक्तिभेद
से उसका विभाग तीन प्रकार हो जावे, उनमें एक अंश शीतरसरूप वायु—ठण्डी भापमय वायु हो
तृतीय अध्याय: दर्पण, मणियाँ एवं विद्युत्-शक्ति सञ्चालन
शक्त्युद्गमयन्त्र ] [ १८३
फिर दूसरी शीत जल की फुशार रूप को प्राप्त हो जाती है, तीसरी शीत वायुधारा को प्रवाहित करने
वाली शक्ति । जब विमान केन्द्ररेखा के नीचे के मार्ग में आता है तो शीतवायुधारा को प्रवाहित करने
वाली शक्ति स्ववेग से विमानशक्ति के सर्वस्व-सामर्थ्य को तुरन्त खींच लेती है ॥ ६६-७५ ॥
तथा शीतरसरूपवातशक्तिस्स्वभावत ।
यानस्थसर्वयन्तॄणा बलमाकर्षति क्रमात् ॥ ७६ ॥
जलस्य सीत्कराकारशक्ति पश्चात् स्ववेगत ।
यानमावृत्य सर्वत्रादृश्य कुर्वीत नान्यथा ॥ ७७ ॥
बलापकर्षणाद् यानपतन तद्गदेव हि ।
यन्तॄणा प्राणहानिश्च यानागोचरमेव च ॥ ७८ ॥
प्रभवेदेककालेन कष्टात्कष्टतर तत ।
तस्मात् तत्परिहाराय यन्त्र शक्त्युद्गमाभिधम् ॥७९॥
विमाननाभिकेन्द्रस्य मध्ये संस्थापयेद् दृढम् ॥ इत्यादि ॥
और दूसरी शीतरसरूप वायु-ठण्डी भापमय शक्ति अपने स्वभाव से विमान में स्थित यात्रियों
के बल को खींच लेती है, तीसरी जल की फुवारा के आकार वाली शक्ति विमान को घेरकर सब ओर उसे
अदृश्य कर देती है । 'इस प्रकार तीनों शक्तियों के द्वारा' बल को खींचलेने से विमान गिर जाता है
यात्रियों की प्राणहानि और विमान का अदृश्य-लापता हो जाना एक साथ कष्ट से अधिक कष्ट हो जावे ।
अत उसके परिहार के लिये शक्त्युद्गमनामकयन्त्र विमाननाभि के केन्द्र मध्य में दृढ़रूप से संस्थापित
करे ॥ ७६-७९ ॥
उक्त हि खेटसंग्रहे—कहा है खेटसंग्रह ग्रन्थ में -
कुजार्कशनिजाम्भारिबुधमाण्डलिको रुरु ।
विश्वप्रकाशकश्चेति ग्रहाश्चाष्टावितीरिता ॥ ८० ॥
कृत्तिका शततारश्च मखामृगशिरास्तथा ।
चित्राश्रवणपुषाश्वीत्यष्टभा इति निर्णता ॥ ८१ ॥
स्वस्वसञ्चारपरिधिमण्डलकेन्द्ररेखामु चारत ।
एते ग्रहाश्च नक्षत्रास्सामीप्य शरदिक्रमात् ॥ ८२ ॥
कुज-मङ्गल, अर्क-सूर्य, शनि, जाम्भारि ?, -शुक्र?, बुध, माण्डलिक-चन्द्रमा, रुरु ?, विश्वप्रका-
शक-बृहस्पति ये आठ ग्रह कहे गए हैं। कृत्तिका, शतवार-शतभिषक्, मखा-मघा, मृगशिरा-मृगशीर्ष
चित्रा, श्रवण, पूषा, अश्विनौ ये आठ दीप्त नक्षत्र निर्णय किए हैं। ये ग्रह नक्षत्र अपने अपने सञ्चार-
गतिमार्ग के परिधिमण्डल की केन्द्ररेखाओं में गतिक्रम से क्रमश शरद् ऋतु में समीपता को प्राप्त
हुआ करते हैं ॥ ८०-८२ ॥
हस्तलेख कापी संख्या १३—
प्राप्यन्ते चारक्रमेण तेन शक्त्यष्टक भवेत् ॥ इत्यादि ॥
प्राप्त होते हैं चार-सञ्चारक्रम से उससे शक्त्यष्टक होवे ।
चारनिबन्धनेपि—चारनिबन्धनग्रन्थ में भी कहा है—
गणितोक्तप्रकारेण ग्रहभानां यथाक्रमम् ।
स्वस्वपरिधिमण्डलकेन्द्रे रेखानुसारत ॥१॥
चारातिचारादिवशात् सामीप्य केवलं भवेत् ।
शक्ति-सङ्घर्षणं तेन भवेदन्योन्यमद्भुतम् ॥२॥
एवमेकैकनक्षत्रग्रहायोश्शक्तिसङ्घर्षणात् ।
शक्तयोष्टौ प्रजायन्तेत्यन्तशीतघनात्मिका ॥३॥ इत्यादि ॥
गणित-गणित ज्योतिष में कहे प्रकार से ग्रह नक्षत्रों का यथाक्रम अपने अपने परिधिमण्डल
केन्द्र में रेखा के अनुसार चार अतिचार-गति सञ्चार आदि के बश केवल-अधिक समीपता हो जावे
तो उससे परस्पर अद्भुत शक्तिसंघर्ष हो जावे, इस प्रकार एक एक ग्रह और नक्षत्र के शक्तिसंघर्ष से
अत्यन्त शीतमूर्तिरूप आठ शक्तियां उत्पन्न हो जाती हैं ॥१ - ३॥
उक्तं हि शक्तिसर्वस्वे—शक्तिसर्वस्व में कहा है—
कृत्तिकाकुजयोश्शक्तिसङ्घर्षणवशात् स्वत ।
काचिच्छक्तद्युद्गमा नाम शक्तिस्सञ्जायते क्रमात् ॥४॥
तथैव शततारार्कशक्तिसङ्घर्षणेन च ।
शीतज्वालामुखी नाम काचिच्छक्ति प्रजायते ॥५॥
मघा (खा ?) शन्योश्शक्तिसङ्घर्षणवेगात् तथैव हि ।
शैत्यदष्ट्राभिधा (दा?) शक्ति र्जायते सर्वतोमुखा ॥६॥
तथा मृगशिरादम्भारिशक्त्योर्घर्षणेन च ।
सञ्जायते शीतरसवातशक्तिर्महोज्वला ॥७॥
तथैव चित्रा (त्त ?) बुधयोश्शक्तिसङ्घर्षणक्रमात् ।
शैत्यहेमाभिधा (दा?) काचिज्जायते शक्तिरुज्ज्वला ॥८॥
शक्त्युद्गमयन्त्र ] [ १८४
तथा श्रवणामण्डलयोश्शक्तिसङ्घर्षणक्रमात् ।
जायते स्फोरणी नाम शक्तिश्शीतप्रवाहिका ॥६॥
कृत्तिका नक्षत्र और मङ्गलग्रह की शक्तियों के संघर्षवश स्वतः शक्त्युद्मा नामक कोई शक्ति
प्रकट हो जाती है वैसे ही शतभिषक् नक्षत्र और सूर्य की शक्तियों के संघर्ष से शीतज्वालामुखी नाम
की कोई शक्ति प्रकट हो जाती है वैसे ही मघा नक्षत्र और शनि ग्रह की शक्तियों के संघर्ष से शैत्यदंष्ट्रा
नामक शक्ति सर्वतोमुख उत्पन्न हो जाती है । तथा मृगशिरा नक्षत्र और ब्रम्भारि-प्रजापति या बृहस्पति ?
की शक्तियों के संघर्ष से शीतरसवातशक्ति महोज्ज्वला उत्पन्न हो जाती है । वैसे ही चित्रा नक्षत्र और
बुध ग्रह की शक्तियों के संघर्ष से शैत्यहेमा नामक कोई उज्ज्वल शक्ति उत्पन्न हो जाती है । तथा
श्रवण नक्षत्र और मण्डल-मण्डलवृत्तवाले चन्द्र ? की शक्तियों के संघर्ष से स्फोरणी नामक शीतप्रवाहिका
शक्ति उत्पन्न हो जाती है ॥४-६॥
पूषारुरुकयोश्शक्तिसङ्घर्षणवशात् तथा ।
सजायते शीतघनरसशक्तिर्महोर्मिला ॥१०॥
विश्वप्रकाशाश्विन्योश्च शक्तिसङ्घर्षणवशात् स्वतः ।
शैत्यमण्डकिनी नाम काचिच्छक्ति प्रजायते ॥११॥
शैत्योद्गमनाभिधा शक्तिश्शीतज्वालामुखी तथा ।
शैत्यदंष्ट्रा शीतरसज्वालाशक्तिस्तथैव च ॥१२॥
शैत्यहेमा स्फोरणी च शीतघनरसात्मिका ।
शैत्यमण्डकिनी चेति शक्तयोष्टौ प्रकीर्तिता ॥१३॥
तास्वान्योन्ययोगेन ऋतुकालानुसारत ।
भिद्यन्ते षट् प्रकारेण शक्तिभेदस्ततोभवेत् ॥१४॥
पूषा-रेवती नक्षत्र और रुरुक ? की शक्तियों के संघर्षवश शीतघनरसशक्ति महोर्मिला-
नदीतरङ्गोंवाली उत्पन्न हो जाती है, विश्वप्रकाश ? और अश्विनियों की शक्ति के संघर्षवश शैत्यमण्डू-
किनी नामक कोई शक्ति प्रकट हो जाती है । शैत्योद्गमनामक शक्ति, शीतज्वालामुखी, शैत्यदंष्ट्रा,
शीतरसज्वालाशक्ति, शैत्यहेमा, स्फोरणी, शीतघनरसात्मिका, शैत्यमण्डूकिनी ये आठ शक्तिया
कही हैं वे अन्योन्य के सम्बन्ध से ऋतुकालानुसार भिन्न भिन्न होती है शक्तिभेद तो छ प्रकार
का है ॥१०-१४॥
तदुक्तमृतुकल्पे—वह ऋतुकल्प ग्रन्थ में कही है—
वसन्ते पञ्चधा ग्रीष्म ऋतो सप्तप्रकारत ।
अष्टधा वार्षिके तद्वत् त्रिधा शरदि वर्णित ॥१५॥
हे (है?) मन्ते दशधा प्रोक्तो द्विधा शिशिरतौ ❄ क्रमात् ।
एव क्रमेण भिद्यन्ते शक्तयष्षट् प्रकारत ॥१६॥
❄ शिश्रऋतौ सस्तेलेले ।
१८६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
त्रिधा यदुक्तं शरदि शक्तिभेदोत्र शास्त्रतः ।
तस्स्वरूप प्रसङ्गत्या सग्रहेण निरूप्यते ॥१७॥
पश्चादादित्यकिरणसम्पर्कात् ता यथाक्रमम् ।
विभज्यन्ते त्रिधा सम्यक् शक्तिसम्मेलनक्रमात् ॥१८॥
वसन्त में पांच प्रकार की ग्रीष्म ऋतु में सात प्रकार से वर्षा ऋतु में आठ प्रकार की शरद्ऋतु
में तीन प्रकार की कही हैं । हेमन्त ऋतु में दश प्रकार की कही शिशिर ऋतु में दो प्रकार की । इस क्रम
से शक्तियां छ प्रकार से विभक्त होती हैं । शरद् ऋतु में जो शक्तिभेद तीन प्रकार का है उसका स्वरूप
प्रसङ्ग से संक्षेप से निरूपित किया जाता है, पश्चात सूर्यकिरण के सम्पर्क से यथाक्रम तीन प्रकार से
विभक्त हो जाती हैं शक्तिसम्मेलन के क्रम से ॥ १७-१८ ॥
तासां नामानि शास्त्रोक्तप्रकारेणाभिवर्ण्यते ।
शीतज्वाला शैत्यदंष्ट्रा तथा शैत्योद्गमा क्रमात् ॥ १९ ॥
सम्मिलित्वा शीतरसवातशक्तिरभूत् स्वतः ।
शक्त्युद्गमयन्त्र ] [ १८७
शीतघ्नदर्पणात् पश्चात् कुर्यान्नालत्रय क्रमात् ।
यन्त्रस्थानादूर्ध्वमुखे पार्श्वयोरुभयोरपि ॥ २७ ॥
विमानयन्ता (स्वो ?) वरणावावृत्यैव यथाविधि ।
नालत्रय विमानेस्मिन् स्थापयेत् सुदृढ यथा ॥ २८ ॥
शीतवातायनीनालतन्त्रीन् नालत्रयान्तरे ।
सन्धायैतत्तथैवाग्रे भ्रामणीचक्रमप्यथ ॥ २६ ॥
यावच्छक्तित्रय व्योमयानमावृत्य वेगत ।
यानशक्ति हरेत् तावद् यानावरकत क्रमात् ॥ ३० ॥
उपर्युक्त घातक तीन शक्तियों के विनाशार्थ यन्त्रशक्ति-उद्गमानामक को सङ्क्षेप से यथाशास्त्र
यथामति निरूपित की जाती है । विमान के यात्रियों के सप्रमाण आदि में शैत्यग्राहक लोहे से दो आव-
रक-रक्षक करे । बन्द करने खोलने के साधनभूत दो कीलबन्धन भी विमानावरण के आगे और सामने
अन्तवाले भाग में शास्त्ररीति से दोनों के मध्यदण्ड के अग्रभाग में सन्धिकोली को बनावे । पश्चात् शीत-
नाशक दर्पण से क्रम से तीन नाल करे चालक के स्थान के ऊपर की ओर दोनों पार्श्वों में भी करे ।
विमानचालक दो आवरणों को डालकर यथाविधि इस विमान में तीन नाल स्थापित करे, शीतवाता-
यनीनाल तारों को तीनों नालों के अन्दर लगावे तथा आगे भ्रामणीचक्र भी लगावे । तीनों शक्तियों के
अनुरूप विमान को वेग से आवृत्त कर विमानयान की शक्ति को हरण करे । तब तक विमानयान के
आवरक से क्रमश —॥ २६-३० ॥
निवारयेत् तच्छक्तिवेग निश्शेष शीघ्रत क्रमात् ।
वेगात् सचालयेद् विकसनकीली यथाविधि ॥ ३१ ॥
आदावावरक तेन यन्तॄणा प्रभवेत् स्वत ।
पश्चाद् विमानावरक समग्र भवति ध्रुवम् ॥ ३२ ॥
ततश्शक्तित्रय व्योमयानस्यावरकोपरि ।
आमूलाग्र व्याप्य वेगात् तस्योद्वेग करिष्यति ॥ ३३ ॥
पश्चात् सम्भ्रामयेद् वेगाद् भ्रामणीचक्रमद्भुतम् ।
चक्रवेगस्समाहृत्य शक्तिवेग शनैश्शनै ॥ ३४ ॥
शीतवातायनीनालतन्त्रीणा सम्मुख यथा ।
प्रेषयेत् तन्त्रिमूलकीलकान् भ्रामयेत्तत ॥ ३५ ॥
तच्छक्तित्रयवेगस्तु पश्चान्नालत्रयान्तरे ।
प्रविश्य बाह्याकाशेथ तन्मुखाल्लयमेधते ॥ ३६ ॥
यन्तॄणा त्राणन तस्माद् यानरक्षण तथा ।
अहश्यत्वनिवृत्तिश्च प्रभवेदेककालत ॥ ३७ ॥
तस्माच्छक्त्युद्गमनाम यन्त्रमुक्त यथाविधि । इत्यादि ॥
[ १८८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
उस शक्तिवेग को निःशेष शीघ्र निवृत्त करे। विकसनकीली को यथाविधि वेग से सञ्चारित
करे, आदि में यन्त्राक्षों का आवरण स्वत हो जावे । फिर समग्र विमानावरक निश्चित हो जाता है।
फिर विमान यान के आश्रयक के ऊपर तीनों शक्तियां मूल से अग्रभाग तक व्याप्त करके वेग से उसका
उद्वेग करेंगी पश्चात् वेग से अंगुल भ्रामणी कील को घुमावे । चक्रवेग शक्तिवेग को धीरे धीरे इकट्ठे
करके शीतशतायनी नालतारों के सम्मुख प्रेरित करदे तारों के मूल कीलें-पेंच घुमावे उन तीनों शक्तियों
का वेग तो पश्चात् तीन नालों के अन्दर प्रविष्ट होकर बाहिरी आकाश में उस मुख से लय को प्राप्त हो
जाता है । चालक यात्रियों का त्राण तथा यानरक्षण अदृश्यत्व होने वाले संकट की निवृत्ति हो जावे एक
काल में उससे शक्त्युद्गम यन्त्र यथाविधि कहा है ॥ ३१-३७ ॥
शैत्यग्राहक्लोहमुक्तं लोहतन्त्रे — शैत्यग्राहक लोहा लोहतन्त्र में कहा है—
चन्द्रोपल क्रोडिकसोमकन्दे विश्वावसु कौशिकचन्द्रमास्ये ;
वार्ध्र्यश्वक वारुणपञ्चकुड्मले सिंहास्यक शङ्खुलवाक्षुपाले(णे?) ॥ ३८ ॥
एतान् समांशान् परिशोधितान् क्रमात् संगृह्य शुण्डालकमूषमध्ये ।
सम्पूर्य चञ्चुमुखकुण्डगर्भे संस्थाप्य पञ्चाननभस्त्रिकामुखात् ॥ ३६ ॥
वेगेन सङ्गाल्य च तद्रस शनैर्यन्त्रास्यमध्ये परिपूरयेत् क्रमात् ।
एव कृते शुद्धमतीवसूक्ष्म भवेत् सुशैत्यग्राहक्लोहमद्भुतम् ॥ ४० ॥ इत्यादि ॥
चन्द्रोपल—नीलोत्पल—नीलोफर, क्रोडिक—वाराही कन्द या गेण्डे का सींग, सोमकन्द ?,
विश्वावसु ? धातुविशेष ?, कौशिक—कृत्रिम लोहा, चन्द्रमास्य—चन्द्रकान्त पत्थर ?, वार्ध्र्यश्वक
वाध्रयश्वक—तीक्ष्ण लोहा ?, वरुण—वरना वृक्ष या थूहर, पञ्चकुड्मल—पञ्चरत्नो ? सिंहास्य—वासा,
शङ्खुलवा—शङ्खखास—भीमसेनी कपूर, अक्षुपाल—अक्षुगाला, धात्री—आंवला। इन्हें शोधित समानांश
में लेकर शुण्डालकमूषा के मध्य भर कर चञ्चुमुख कुण्ड के मध्य में रख कर पञ्चमुखवाली
भस्त्रिकामूल से वेग से गला कर उसके रस को धीरे से यन्त्र के मुख में भरदे तो शुद्ध अतीवसूक्ष्म सुशैत्य
ग्राहक लोहा हो जावेगा ॥ ३८-४० ॥
शीतघ्नदर्पणमुक्तं दर्पणप्रकरणे—शीतनाशक दर्पण कहा है दर्पणप्रकरण में--
सीस कपालि वरचन्द्रमास्य पञ्चाङ्गुलि शैशिरिक वृणाङ्कम् ।
क्षारत्रय शुद्ध(र ?) सुवर्चल सिञ्चारुण सूक्ष्मतर च वालुकम् ॥ ४१ ॥
बम्भारिक चाञ्जनिक कुरङ्ग पञ्चोर्मिक चन्द्ररस शिवारिकम् ।
एतान् समाहृत्य समाशत क्रमात् विशोधितान् सेहिकमूषमध्ये ॥ ४२ ॥
सम्पूर्य पद्माकरकुण्डगर्भे संस्थाप्य शूर्पोदरभस्त्रिकामुखात् ।
सङ्गाल्य कक्ष्यत्रिशतोष्णात. क्रमाद् रस समाहृत्य शनैर्यथाविधि ॥४३॥
सम्पूरयेद् यन्त्रमुखान्तरे क्रमादेव कृते शुभ्रमतिदृढ लघु ।
भवेत् सुशीतघ्नकदर्पण ततश्शुभ्र सुसूक्ष्म सुमनोहर च ॥ ४४ ॥ इत्यादि ॥
सीसा, कपालि ? कपाली—विडङ्ग या कपाल—तालमखाना, चन्द्रमास्य—चन्द्रकान्त मणि ?,
पञ्चाङ्गुलि—पञ्चांगुल—एरण्ड, शैशारिक—शैशोरिक—निम्बबीज, वृणाङ्क—वृणमूल—गन्धतृण ?,
वक्रप्रसारणयन्त्र ] [ १८६
नौदासर, यवक्षार सज्जीखार, शुद्ध सोञ्चलनमक, सिञ्चाणुक ?, अतिसूक्ष्म बालु । बम्भारिक ?, अञ्जनिक-
सुरमा, कुरङ्ग—अर्कफेरा, पञ्चोर्मिक ?, चन्द्ररस—काम्पिल्लक रस ?, शिवारिक ? इनको समान लेकर
क्रम से शोधकर सेंहिक मूषा बोतल मध्य में भर कर पद्माकर कुण्डगर्भ में रख कर शूर्पोदर भस्त्रिका मुख
से ३०० दर्जे की उष्णता से गला कर पिघला रस धीरे से लेकर यन्त्रमुख के अन्दर क्रम से भर दे ऐसा
करने पर शुद्ध अतिदृढ हल्का शीतघ्न दर्पण सूक्ष्म सुमनोहर हो जावे ॥ ४१-४४ ॥
अथ वक्रप्रसारणयन्त्र.—अब वक्रप्रसारण यन्त्र कहते हैं—
उक्त्वा शक्त्युद्गमयन्त्र सङ्ग्रहेण यथामति ।
वक्रप्रसारण नामयन्त्रमद्य प्रचक्षते ॥ ४५ ॥
शक्त्युद्गम यन्त्र संक्षेप से यथामति कह कर वक्रप्रसारण यन्त्र अब कहते हैं ॥ ४५ ॥
उक्तं हि क्रियासारे—क्रियासार में कहा ही है—
[ १६० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
वर्तुलं कारयेच्चक्रं नालदण्डेन योजितम् ।
यानस्यैषादण्डमूलगुहावर्ते यथाविधि ॥ ५४ ॥
चतुरङ्गलमायामं बाहुमात्रं मनोहरम् ।
क्रकचाङ्गलचक्रेभ्यो'षोडशेभ्यो यथाविधि ॥ ५५ ॥
विमान यान के नाशार्थ शत्रुओं द्वारा डाले हुए दम्भोली आदि आठ यन्त्रों से नाश सम्भव
है उस नाश की निवृत्ति के अर्थ विमान का वक्रप्रसारण कील यन्त्र यहां कहते हैं। लोमश—कसीस,
अश्वत्थ सञ्जात-पीपल की लाख या गोन्द, शुल्व – ताम्बा १६ भाग, लघु-काला अगर ३ भाग, छ्विङ्का-लोह
विशेष या जस्ता ?, ५, आञ्जनक—सुरमा १ भाग मिला कर १०० दर्जे की उष्णता से गलावे, फिर यह
आरावाला ताम्र स्वर्ण के आकार का हल्का दृढ हो जाए, ३ बालिश्त लम्बा ३ बालिश्त ऊंचा गोल
चक्र करावे नालदण्ड से युक्त करे यान के ईषादण्ड मूल गहरे घेरे में यथाविधि ४ अंगुल मोटा बाहु-
मात्र लम्बा मनोहर १६ क्रकचांगुलचक्र—आरांगुल वाले चक्रों से यथाविधि—॥ ४६-५५ ॥
प्रतिष्ठितं तैलशुद्धं दण्डद्वयमुखान्तरे ।
चक्रमूलं समारभ्य यद्दण्डान्तरतं क्रमात् ॥ ५६ ॥
यानस्यैषादण्डमूलगुहावर्तस्थनालयो ।
अष्टाङ्गलचक्रेभ्य कृतमार्गानुसारत. ॥ ५७ ॥
त्रिपर्वसन्धिसंयुक्तशलाकान् तैलसंस्कृतान् ।
सन्धायं विधिवत् पश्चात्तदन्ते शाखन. क्रमात् ॥ ५८ ॥
चक्रसन्धिं प्रकल्प्याधारारचक्रमुखान्तरे ।
कीली सन्धारयेत् सम्यगुभयो पार्श्वयो क्रमात् ॥५९॥
मध्ये धूमप्रसारणकीलको पार्श्वयोस्तथा ।
सन्धारयेत् तथा धूमबन्धने कीलद्वयम् ॥ ६० ॥
प्रतिष्ठित तैल से शुद्ध दो दण्डों के मुख के अन्दर चक्रमूल को आरम्भ कर दण्डों के अन्दर
से विमान के ईषादण्ड—धुरा दण्ड मूल के गुहावर्तस्थ दो नालों में आठ अंगुल वाले चक्रों से मार्ग के
अनुसार बनाए तीन पर्वसन्धिसंयुक्त तैल से संस्कृत शलाकाओं को लगा कर फिर उनके अन्त में चक्र-
सन्धि बना कर आरावाले चक्रमुख में दोनों पार्श्वों में कीली लगावे; बीच में धूमप्रसारण दो कीलें
दोनों पार्श्वों में लगावे तथा धूम को रोकने की दो कीलें भी लगावे ॥ ५६-६० ॥
सन्धितन्त्रीचक्रवर्गैस्तत्तन्मार्गानुसारतः ।
परस्परं सन्धिसंयोजनकीलीनिबन्धनम् ॥ ६१ ॥
कारयेत् सरलेनैव तत्तत्स्थानप्रमाणतः ।
बाहुमात्रे ताम्रपीठे एतत्सर्वं यथाविधि ॥ ६२ ॥
प्रकल्प्याधारपार्श्वेथ विमानस्य दृढं यथा ।
संस्थापयेद् यथाकामं पश्चात् कालानुसारतः ॥ ६३ ॥
शक्तिपञ्जरकील्यन्त्र ] [ १६१
सार्पतियंग्दण्डवक्रगतिभेदादिभि क्रमात् ।
विमानं चोदयेद् बुद्ध्या पुरोभागस्थचक्रतः ॥ ६४ ॥
तथैवान्ये कीलकादिसहायैरपि शास्त्रतः ।
एतद्यन्त्रसहायेन भवेद् वक्रगति क्रमात् ॥ ६५ ॥
विमानस्यातिवेगेन तेन दम्भोलिकादिभि ।
सम्भवापायनाशस्तु तत्क्षणादेव जायते ॥ ६६ ॥
विमानरक्षणं तस्माद् यन्त्रेणा च विशेषतः ।
भवेत् तस्मात् सग्रहेण यथावच्छास्त्रत क्रमात् ॥ ६७ ॥
वक्रप्रसारण नामयन्त्रमुक्तं मनोहरम् ॥ इत्यादि ॥
सन्धि तन्त्री चक्रवर्गों से उस उस मार्ग के अनुसार परस्पर सन्धि संयोजन कीलों का निबन्धन
उस उस स्थान के प्रमाण से सरलरूप में करे बाहुपरिमाण लम्बे के पीठ में यह सब यथाविधि रच कर
विमान के आधार पार्श्व में दृढ यथेष्ट स्थापित करे । पश्चात् समयानुसार सर्प की भांति तिरछे दण्ड
जैसी वक्रगति भेद आदि से विमान को बुद्धि से सामने के भाग वाले चक्र से प्रेरित करे तथा अन्य
कील आदि सहायक से भी शास्त्रानुसार इस यन्त्र की सहायता से वक्रगति विमान की अतिवेग से
दम्भोलि-(तारपीडो) जैसी वस्तुओं से होने वाले अनिष्ट का नाश तत्क्षण हो जाता है विमान की
तथा विशेषतः चालक और यात्रियों की रक्षा होजावे अतः शास्त्रानुसार संक्षेपसे मनोहर चक्रप्रसारण यन्त्र
कहा है ॥ ६१-६७ ॥
अथ शक्तिपञ्जरकील यन्त्रनिर्णय - अब शक्तिपञ्जरकील यन्त्र का निर्णय देते हैं-
एवमुक्त्वा वक्रप्रसारणयन्त्रमतं परम् ।
शक्तिपञ्जरकील यन्त्रमथ प्रवक्षते ॥ ६८ ॥
इस प्रकार वक्रप्रसारण यन्त्र कहकर इससे आगे शक्तिपञ्जरकील यन्त्र अब कहते हैं ।
तदुक्तं क्रियासारे- यह वह क्रियासार ग्रन्थ में कहा-
विमानसर्वाङ्गसन्धिस्थानभेदेषु शास्त्रतः ।
विमानाङ्गेषु सर्वत्र आमूलाग्रं यथाविधि ॥ ६६ ॥
विद्युत्सञ्चोदनार्थाय तत्कालानुसारत ।
शक्तिपञ्जरकीलकयन्त्रसस्थापन क्रमात् ॥ ७० ॥
विमानमध्यकेन्द्रे च कुर्याच्छास्त्रविधानतः ॥ इति
विमान के सब अङ्गों के भिन्न भिन्न सन्धिस्थानों में शास्त्र से विमान के अङ्गों में सर्वत्र मूल
से अग्रभाग तक यथाविधि विद्युत् को प्रेरित करने के अर्थ उस उस समय के अनुसार क्रम से शक्ति-
पञ्जर कीलक यन्त्र का संस्थापन विमान के मध्यकेन्द्र में विधान से करे ॥ ६६-७० ॥
तदुक्तं यन्त्रसर्वस्वे- यह वह यन्त्रसर्वस्व ग्रन्थ में कहा है-
विद्युत्सञ्चोदनार्थाय यानसर्वाङ्गसन्धिषु ॥ ७१ ॥
१६२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
शक्तिपञ्जरकीलकयन्त्रनिर्णयमुच्यते ।
कान्तक्रौञ्चिकलोहान् त्रीन् दशाष्टनवभागत ॥ ७२ ॥
सम्पूर्य मूषिकामूषामुखे पश्चाद् यथाविधि ।
निधायातपकुण्डेथ शतकक्ष्यमोष्णत क्रमात् ॥ ७३ ॥
सङ्गाल्य तन्मुखे विद्युच्छक्ति संयोजयेद् दश ।
ततो यन्त्रमुखे वेगात् पूरयेदेकत क्रमात् ॥ ७४ ॥
अत्यन्तमुदुल शुद्ध शक्तिगर्भाभिध (द ?) इदम् ।
भवेल्लोह तेन यन्त्र कुर्यात् तद्विधिरुच्यते ॥ ७५ ॥
विद्यु त को प्रेरित करने के अर्थ विमानयान के सर्वाङ्ग की सन्धियों में शक्तिपञ्जर कीलकयन्त्र
का निर्णय कहा जाता है । कान्त—अयस्कान्त, क्रौञ्चिक—कृत्रिम लोह विशेष, लोह—साधारण लोहा इन
तीनों को १०, ८, ६ भागों से मूषिका आकार की मूषा—बोतल के मुख में भरकर पश्चात् यथाविधि
आतपकुण्ड में रखकर १०० दर्जे की उष्णता से क्रम से गलाकर उसके मुख में विद्यु त् शक्ति १० संख्या
में युक्त करे फिर यन्त्रमुख में वेग से एक वार भर दे, अत्यन्त मृदुल शुद्ध शक्तिगर्भ नामक लोहा वह
हो जावे उस से यन्त्र बनावे उसकी विधि कही जाती है—विधि कहते हैं ॥ ७१-७५ ॥
बाहुमात्रमुन्नत तावदायाम द्रोणिवत् सुधी ।
पीठ कुर्याच्छक्तिगर्भोलोहेनैव यथाविधि ॥ ७६ ॥
पीठमूले तथामध्ये तदन्ते च यथाक्रमम् ।
अर्धचन्द्राकारमुखकीलस्तम्भान् दृढ यथा ॥ ७७ ॥
आदौ संस्थापयेत् पट्टिका ताम्रनिर्मिताम् ।
संयोजयेत् तत् कीलशङ्कुभिर्बन्धयेद् दृढम् ॥ ७८ ॥
तन्त्रीनु शलाकान् तच्छक्तिगर्भोलोहेन शास्त्रतः ।
सच्छिद्रदण्डनालान् त्रीन् (त्री ?) कृत्वा पश्चाद् यथाविधि ॥७९॥
दण्डच्छिदेषु सर्वत्र शलाकान् योजयेत् ततः ।
सप्रमाण लोहतन्त्री शलाकोपरि वेष्टयेत् ॥ ८० ॥
बाहुमाप में ऊंचा बाहुमाप लम्बा द्रोणी हाण्डी की भाति पीठ—विमानस्थली बुद्धिमान् उस
शक्तिगर्भ लोहे से ही यथाविधि बनावे । पीठ के मूल में मध्य में और अन्त में यथाक्रम अर्धचन्द्राकार
मुखवाली कीलों के स्तम्भों को दृढ़रूप में आदि में संस्थापित करे पश्चात् ताम्बे से बनी पट्टिका को लगावे
फिर कील शङ्कुओं से बान्ध दे, तारों को शलाकाओं को उस शक्तिगर्भ लोहे से शास्त्रानुसार छिद्रसहित
दण्डरूप नालों को तारों को बनाकर पश्चात् यथाविधि दण्डों के छिद्रों में सर्वत्र शलाकाओं को जोड़ दे
फिर माप से लोहे के तारों को शलाकाओं के ऊपर लपेट दे ॥ ७६–८० ॥
वर्तुलं पञ्जर तेन भवेत् सुदृढमद्भुतम् ।
तत्पञ्जर ताम्रपट्टिकोपरि स्थापयेत् ततः ॥ ८१ ॥
शिरःकीलकयन्त्र ] [ १६३
विद्युच्छक्तिं पञ्जरस्याधोभागे न्यसेत् क्रमात् ।
पञ्जरस्थशलाकानां तन्त्रीणामपि शास्त्रत ॥ ८२ ॥'
विद्युत्सञ्चोदनार्थाय कीलकं स्थापयेत् तथा ।
विमानस्याऽङ्गयन्त्राणां द्वात्रिंशत्यंघ्रिषु (घिषु ?) क्रमात् ॥८३॥
विद्युत्संचोदनार्थायोपसंहाराथमेव च ।
अनुलोमविलोमाभ्यां द्वात्रिंशत्कीलकान् क्रमात् ॥ ८४ ॥
सन्धाययेत् सूक्ष्मकीली शङ्कुभिस्सुदृढं यथा ।
विद्युत्प्रयोगं सर्वत्र कर्तुं तेन यथोचितम् ॥८५॥
भवेद् विमाने शास्त्रोक्तरीत्या स्वेष्टप्रकारतः ।
दिक्प्रभेदेन सर्वत्र गतिवैचित्र्यतः क्रमात् ॥८६॥
भवेच्चोदयितुं व्योमयानं तस्माद् यथाविधि ।
तस्मादुक्तं समासेन विद्युत्पञ्जरयन्त्रकम् ॥८७॥
इससे पञ्जरगोल सुदृढ़ अद्भुत हो जावेगा उस पञ्जर को ताम्बे की पट्टिका के ऊपर स्थापित करदे
पुनः पञ्जर के नीचले भाग में विद्युत्शक्ति को रक्खे क्रमशः पञ्जरस्थ शलाकाओं तारों के भी (अन्दर)
शास्त्र से विद्युत् को प्रेरित करने के अर्थ कील-पेंच स्थापित करे—लगावे । विमान में स्थित अङ्गयन्त्रों
के ३२ पैरों में—नीचलेभागों में क्रम से विद्युत् को प्रेरित करने के अर्थ और उपसंहार-सङ्कोचकरने खींच
लेने के अर्थ भी अनुलोम-सीधे विलोम-उल्टे प्रकार से ३२ कीलों-पेंचों को क्रम से सूक्ष्मकील शङ्कुओं
से दृढ़ लगादे इससे शास्त्रोक्त रीतिसे विमान में विद्युत्का यथोचित और स्वेच्छानुसार प्रयोग करना हो
सकता है । दिशा के भेद से सर्वत्र विचित्र गति से विमान यान का प्रेरित करना हो सके अतः यथा-
विधि संक्षेप से विद्युत्पञ्जर कहा गया है ॥८१-८७॥
अथ शिर कीलकयन्त्रनिर्णय —अब शिर.कीलकयन्त्रनिर्णय करते हैं—
इत्युक्तवा शक्तिपञ्जरयन्त्रमथ यथाविधि ।
सङ्ग्रहेण शिर कीलकयन्त्रं सम्प्रचक्षते ॥८८॥
शक्तिपञ्जर यन्त्र कहकर अब यथाविधि संक्षेप से शिर कीलकयन्त्र को कहते हैं ॥८८॥
तदुक्तं क्रियासारे—वह क्रियासारग्रन्थ में कहा है—
विमानोपर्यशनिपातं मेघवृन्दाद् भवेद् यदा ।
तदा विनाशमायाति व्योमयानोतिशीघ्रत ॥८६॥
तस्मात् तत्परिहाराय शिर कीलकयन्त्रकम् ।
शिरोभागे विमानस्य स्थापयेच्छास्त्रतं क्रमात् ॥६०॥ इत्यादि ॥
विमान के ऊपर मेघराशि से विद्युत् का गिरना जब हो तब विमान अति शीघ्र नाश को प्राप्त
हो जाता है अतः उसके परिहार के लिये शिर.कीलकयन्त्र विमान के शिरोभाग में शास्त्र से स्थापित
करे ॥८६-६०॥